पत्रकार रवीश कुमार के भाई ब्रजेश पाण्‍डेय पर यौन शोषण का आरोप लगने के बाद से पत्रकार दो धड़ों में बंट गए हैं। एक धड़ा यह कह रहा है कि साजिश रचकर ब्रजेश को फंसाया गया है ताकि रवीश की छवि खराब की जा सके, वहीं दूसरा कहता है कि पूरे मामले में रवीश की चुप्‍पी अखरती है। कई पत्रकारों ने सोशल मीडिया पर इस संबंध में अपने विचार रखे हैं और सभी की अलग-अलग राय है। इसी बहाने कुछ ने पत्रकारिता जगत के गड़े मुर्दे उखाड़ने शुरू किए हैं, जिसमें वरिष्‍ठ पत्रकार खुर्शीद अनवर पर बलात्‍कार के आरोप वाला मामला भी उछला है। खुर्शीद ने आरोप सामने आने के बाद खुदकुशी कर ली थी। जिसके बाद कई पत्रकारों ने खुलकर उनकी तरफदारी करते हुए आत्‍महत्‍या के लिए मजबूर किए जाने का आरोप लगा दिया था। रवीश के समर्थन और विरोध में पत्रकारों ने अपने-अपने तर्क रखे हैं, मगर उनकी चुप्‍पी पर सवाल उठाने वाले भी कम नहीं हैं।

वरिष्‍ठ पत्रकार अभिषेक उपाध्‍याय ने अपनी टाइमलाइन पर विस्‍तृत लेख लिखकर दूसरे पक्ष को जवाब दिया है। उन्‍होंने लिखा है, ”लो आज सीधा सीधा लिख मारते हैं। सुनो वामपंथ की लंपट औलादों। एनडीटीवी वाले रवीश पांडेय का भाई ब्रजेश पांडे बलात्कार और सेक्स रैकेट में फंसा है। तो लड़की का चरित्र बताए रहे हो। ये समझा रहे हो कि ओरिजिनल एफआईआर में उसका नाम नही था। बाद में सामने आया। तुमने आसाराम के बेटे नारायण साई का नाम सुना है। वो जिस मामले में साल 2013 में गिरफ्तार हुआ। वो साल 2002 से 2005 के बीच का मामला था। न यक़ीन हो तो सूरत की पीड़ित महिला के आरोप की एफआईआर निकलवा कर देख लो। पूरे 8 साल बाद की शिकायत थी। फिर भी हुई गिरफ्तारी। नारायण साईं आज भी जेल में है। सूरत की। वो भी राजनीति में दिलचस्पी रखता है। एनडीटीवी वाले रवीश पांडे, अरे हाँ भाई, रवीश कुमार के भाई ब्रजेश पांडे की तरह। चुनाव भी लड़ चुका है। फिर भी मुझे उससे कोई सहानुभूति नही। ऐसे 1000 उदाहरण हैं। गिनवाऊंगा तो बगैर क्लोरोफॉर्म सुंघाए बेहोश हो जाओगे।

किसी वामपंथ के जले हुए बुरादे पर बलात्कार का आरोप लगेगा तो मानक बदल जाएंगे तुम्हारे। तब लड़की का चरित्र बताने की औकात पर उतर आओगे। एनडीटीवी वाले रवीश पांडे, हाँ हाँ वही, ‘बागों में बहार’ वाले रवीश कुमार, के सगे बड़े भाई बृजेश पांडे पर बलात्कार और सेक्स रैकेट का संगीन आरोप लगा है। वो भी एक नाबालिग दलित लड़की ने लगाया है। तो तुम उस दलित लड़की के चरित्र का सर्टिफिकेट जारी किए दे रहे हो। कि वो चरित्रहीन है। रवीश पांडे का भाई मजबूरी में कुर्सी छोड़ने से पहले। बिहार कांग्रेस का प्रदेश उपाध्यक्ष था। तुम तो खा गए होते अभी तक, अगर ऐसे ही कोई बीएसपी का प्रदेश उपाध्यक्ष फंसा होता। कोई समाजवादी पार्टी। या फिर कांग्रेस का ही ऐसा नेता फंसा होता। बशर्ते वो तुम्हारी बिरादरी के ही किसी कॉमरेड का भाई न होता। और बीजेपी का फंस जाता तो फिर तो तुम्हारे थुलथुल थानवी जी ‘हम्मा-हम्मा’ गाते हुए अब ले शकीरा वाला डांस शुरू कर दिए होते। लिख लिखकर, पन्ने के पन्ने। स्याही के मुंह से कालिख का आखिरी निवाला तक छीन लिए होते। अमां, कौन सी प्रयोगशाला में तैयार होता है खालिस दोगलेपन का ये दीन ईमान। थोड़ा हमे भी बताए देओ।

ऐसे ही खुर्शीद अनवर का केस हुआ था। साहब पर नार्थ-ईस्ट की एक लड़की से बलात्कार का आरोप था। अनवर साहब जेएनयू के निवासी थे। फिर क्या था। रुसी वोदका के कांच में धंसे सारे के सारे वामपंथी। उस बेचारी नार्थ ईस्ट की लड़की की इज्ज़त आबरू का कीमा बनाने पर उतर आए थे। एक से बढ़कर एक बड़े नाम। स्वनाम धन्य वामपंथी। बड़ी-बड़ी स्त्री अधिकार समर्थक वामपंथी महिलाएं। सब मिलकर उस बेचारी लड़की पर पिल पड़े थे। वो स्टोरी मैंने की थी। बड़े गर्व के साथ लिख रहा हूँ। उस केस में पुलिस की एफआईआर थी। लड़की की शिकायत थी। मेरे पास पीड़िता का इंटरव्यू था। राष्ट्रीय महिला आयोग की चिट्ठी थी। आरोपी खुर्शीद अनवर के अपने ही एनजीओ की कई महिला पदाधिकारियों की उनके खिलाफ इसी मामले में लिखी ईमेल थी। ये सब हमने चलाया। खुर्शीद का वो इंटरव्यू भी जिसमें वो सीधी चुनौती दे रहे थे कि पीड़ित लड़की में दम हो तो सामने आए। शिकायत करे। वो सामना करेंगे। लड़की आगे आई। शिकायत भी की। पर खुर्शीद अनवर सामना करने के बजाए छत से कूद गए।

भाई साहब, ये पूरी की पूरी वामपंथी लॉबी जान लेने पर आमादा हो गई। कई वामपंथी वोदका में डूबे पत्रकार ‘केजीबी’ की मार्फत पीछे लगा दिए गए। जेएनयू को राष्ट्रीय शोक में डूबो दिया गया। शोर इतना बढ़ा कि दिल्ली पुलिस की एक स्पेशल टीम नार्थ ईस्ट रवाना की गई। ये केंद्र में यूपीए के दिन थे। वरना तो पूरी की पूरी सरकार हिला दी जाती। मैं आज भी उस नार्थ ईस्ट की लड़की की हिम्मत की दाद देता हूँ। तमाम धमकियां और बर्बाद कर देने की वामपंथी चेतावनियों को नज़रंदाज़ करती हुई वो दिल्ली पुलिस की टीम के साथ मजिस्ट्रेट के आगे पहुंची और सेक्शन 164 crpc के तहत कलमबंद बयान दर्ज कराया कि खुर्शीद अनवर ने उसके साथ न सिर्फ रेप किया, उसे sodomise भी किया। एक झटके में सारे वामपंथी मेढ़क बिलों में घुस गए। हालांकि टर्र टर्र अभी तक जारी है। उस बिना बाप की लड़की की आंखो में जो धन्यवाद का भाव देखा वो आज भी धमनियों में शक्ति बनकर दौड़ता है। इस हद तक कमीनापन देख चुका हूँ इंसानियत के इन वामपंथी बलात्कारियों का।

और हाँ। डिबेट का रुख काहे ज़बरदस्ती मोड़ रहे हो? ये कह कौन रहा है कि एनडीटीवी वाले रवीश पांडे इस बात से दोषी हो जाते हैं कि सगा बड़ा भाई बलात्कार और सेक्स रैकेट के आरोप में फंसा है? कौन कह रहा है ई? हाँ। ज़बरदस्ती बात का रुख मोड़ रहे हो ताकि मुद्दे से ध्यान हट जाए। मुद्दा ये कि दोहरा चरित्र काहे दिखाए रहे हो अब? आरोपी रवीश पांडे का भाई है तो अपराध सिद्ध होने तक खबर भी न चलाओगे। और कोई गैर हुआ तो चला चलाकर स्क्रीन काली कर दोगे?

सुनो, बड़ी बात लिखने जा रहा हूँ अब। अपने भाई के ख़िलाफ़ ई सब चलाने का साहस बड़े बड़ों में न होता है। सब जानते हैं। बात सिर्फ इतनी है कि ये जो नैतिकता का रामनामी ओढ़कर सन्त बने बैठे हो, इसे अब उतार दो। तीन घण्टे पूरे होय चुके हैं। पिक्चर ओवर हो गई है। अब ई मेकअप उतार दो। नही तो किसी रोज़ चेहरे में केमिकल रिएक्शन होय जाएगा।

और हाँ, मेरी वॉल पर आए के चिल्ल-पों करने वाले रवीश पांडे के चेलों, सुनो। हम किसी ऐलिब्रिटी-सेलिब्रिटी पत्रकार से कहीं ज़्यादा इज़्ज़त ज़िले के स्ट्रिंगर की करते हैं। जो दिन रात कड़ी धूप में पसीना बहाकर, धूल धक्का खाकर टीवी चैनल में खबर पहुंचाता है। इस देश के टीवी चैनलों का 70 फीसदी कंटेंट ऐसे ही गुमनाम स्ट्रिंगरों के भरोसे चलता है। न यक़ीन हो तो सर्वे कराए के देख लो। तुम जैसे ऐलिब्रिटी-सेलिब्रिटी इन्हीं की उगाई खेती पर लच्छेदार भाषा की कटाई करके चले आते हो और बदले में वाह-वाही लूटकर अपने-अपने एयर कंडिशन्ड बंगलों में दफ़न हो जाते हो। तुम हमे न समझाओ सेलिब्रिटी का मतलब। हम अभी अभी अपने चैनल के इलाहाबादी सेलिब्रिटी से मिलकर लौटे हैं।”

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नदीम एस. अख्‍तर ने अपनी टाइमलाइन पर लिखा है, ”मैं पत्रकार रवीश कुमार पर हो रहे निजी हमले के खिलाफ हूं. यहां बाप, बेटे की गारंटी नहीं ले सकता, फिर भाई की गारंटी भाई क्या लेगा और क्यों लेगा?? पत्रकार क्या लिखेगा और क्या दिखाएगा, ये उसका न्यूज जजमेंट है. इसके लिए उस पर दबाव नहीं बनाया जा सकता. वह biased हो सकता है. तो ?? यहां कौन नहीं हैं. ये दुनिया बहुत subjective है महाराज. Objective कौन है यहां. भगवान भी नहीं, वरना हम भी Bill Gates या Mark Zukerberg होते।”

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नरेंद्र नाथ ने लिखा है, ”यह किस तरह का पढ़ा लिखा जाहिलपन है- रवीश कुमार के बड़े भाई कांग्रेस के नेता हैं।अभी एक लड़की से शोषण करने के आरोप में फंसे हैं। पार्टी से इस्तीफा दिया। कोर्ट-पुलिस एक्शन ले रही है। केस की मेरिट पर वह तय करेंगे। पिछले साल बिहार चुनाव में लड़े भी थे लेकिन हार गए। अब बात मुद्दे की। पढ़ा लिखा तबका ऐसे लिख रहा है मानो रवीश कुमार ही आरोपी हो। रवीश कुमार ने पिछले साल मुझसे कहा था,भाई से सालों से बात नहीं हुए।दोनों अलग अलग सेल्फ मेड हैं। लेकिन सोशल मीडिया पर तो लोगों को केस से मतलब नहीं,लड़की को जस्टिस मिले इसकी फिक्र नहीं,उन्हें मतलब है कि कैसे रवीश को जलील करें। ऐसे लोग रविश को उनके भाई के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं जो पूरी जिंदगी खुद से आगे नहीं बढ़ पाते। आप नफरत कीजये।आपकी यह नफरत रवीश की सफलता है। यह लोगों की कुंठा है। आप मीडिया को गाली दे रहे थे,ठीक था।प्रेस्टीट्यूट बता रहे थे,चलेगा। रिपोर्टिंग को गाली दे चलेगा। अगर रवीश की ओर से केस दबाने का सबूत हो,तब भी मान लूंगा। लेकिन यह अति है। चरित्र निहायत निजी पहलु होता है,यह जानते हुए पढ़े,लिखे जाहिल लोग रविश को गाली दे रहे हैं। उनसे मेरा अनुरोध की वह इसके साथ गारंटी लें कि उनके पूरे खानदान में अगर किसी ने गलती की तो वह भी ओन करेंगे। राजनीति के चक्कर में लोग नफरत की जिस निचले स्तर पर जा रहे हैं,उससे अब घिन आने लगी है।”

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पत्रकार संतोष सिंह ने फेसबुक पर लिखा है, ”भाई के कुकर्म के लिए रवीश को दोषी नहीं ठहराया जा सकता.. लेकिन पाती लिखने के एक्सपर्ट रवीश कुमार इस पर भी एक पाती लिख देते। इतनी अपेक्षा तो है ही।” मनोज वर्मा लिखते हैं, ”अगर रवीश कुमार का भाई सेक्स रैकेट चलाने के आरोपों में बाद फरार है तो इसमें रवीश का क्या दोष है? इस मुद्दे पर उसकी आलोचना क्यों हो रही है? बेहतर यही होगा कि लोग रवीश की एकतरफा पत्रकारिता, खोखली बकलोली और पत्रकार की जगह भोजपुरी एक्टर जैसा बर्ताव करने के लिए उनकी आलोचना करने पर अपना ध्यान केंद्रित करें।”

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हीरेंद्र जे ने लिखा है, ”जबसे फेसबुक पर हूँ एक पत्रकार हमेशा #ट्रेंड में रहा है। कमाल की बात यह भी कि उनके पक्ष में लिखने वाले नाम भी तय हैं और विपक्ष में लिखने वाले भी वही चुनिंदा साथी हैं। मेरे लिखने से अगर रत्ती भर भी फ़र्क पड़ता हो तो मैं ये कहना चाहूंगा कि बालि के कुकर्मों की सज़ा सुग्रीव को नहीं मिलती है इस देश में। ज़्यादा गोल-मोल नहीं लिख रहा हूँ। साफ़ कह रहा हूँ रवीश को बख्श दीजिये। काजल की कोठरी बन चुकी मीडिया इंडस्ट्री में रवीश बेदाग़ न सही पर एक उजला नाम है। अगर रवीश नहीं…तो फिर कौन?”

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सारांश गौतम ने अपनी वॉल पर लिखा है, ”कउन जात हो, इस जुमले को प्रसिद्ध कराने वाले…पत्रकारिता में गंगा के अवतरण की साधना करते स्वनामधन्य, स्वघोषित भगीरथ रविश कुमार उर्फ़ रविश पाण्डेय जी के जात पात का आज कच्चा चिट्ठा खुल गया है हो..!! हलकट हरकतों वाले दल्ले नेता के छोटे भाई हैं ई रबिश जी तो..!!! कहते हैं ना… सच और सूरज ज़्यादा देर छिपाया नहीं जाता…रवीश जी… अब क्या काला करेंगे.. स्क्रीन का कलर या अपने काली करतूत के लिए भाई का मुंह..???”

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