डॉ. वरुण वीर
प्राणाय नमो यस्य सर्वमिंद वशे।
यो भूत: सर्देश्वरो यस्तिन्सर्वं प्रतिष्ठितम्॥
संपूर्ण जगत का आधार प्राण है। इसलिए प्राण को नमस्कार है। यही लोक-लोकांतरों का प्रकाशक है। यही समस्त सृष्टि का आधार है।
प्राणमाहुर्मातरिश्वानं वातोह प्राण उच्चते।
प्राणो ह भूतं भव्यञ्च प्राणे सर्वं प्रतिष्ठम्।।

प्राण ही इस जीवन को चलाने वाला है। संपूर्ण आकाश में प्राण वायु विद्यमान है। भूत, भविष्य और वर्तमान काल इसी में स्थित हैं। जब तक शरीर में प्राण है तभी तक जीवन चलता है और जिस जीव के पास जितनी सांसें हैं, वह उतना ही जीता है। सांस समाप्त तो जीवन समाप्त। सांस केवल फेफड़ों तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि शरीर के प्रत्येक अंग का विकास इस प्राणवायु के साथ ही होता है। जो पानी भोजन या वायु हम ग्रहण करते हैं उसी से यह ‘प्राण’ हमारे शरीर के भीतर, यहां तक कि शरीर के कोने-कोने में प्रत्येक अंग तक पहुंचकर ऊर्जा को फैलाता है।

यही प्राणवायु रक्त के साथ शरीर का निर्माण तथा शरीर को चलाने का कार्य करता है। जो प्राणवायु शरीर में विद्यमान तथा जिससे जीवन चलता है, वही प्राण समस्त आकाश में भी वायु के रूप में फैला हुआ है। इसी प्राणशक्ति की सहायता से सृष्टि का निर्माण हुआ और इसका संचालन भी इस प्राण के कारण ही हो रहा है। भविष्य में भी यह प्राणशक्ति विद्यमान रहेगी। जब सृष्टि का प्रलय होगा तब भी यह प्राणशक्ति के माध्यम से ही होगा। जीव की उत्पत्ति में भी प्राण उपादान (इंस्ट्रूमेंटल फैक्टर) कारण है। शरीर में प्राण को प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। यह प्राणवायु शरीर में प्रविष्ट होकर ही शरीर के सारे क्रियाकलाप कर रही है।

पंचभूतों में वायु महाभूत शरीर निर्माण में सहकारी उपादान कारण है। प्राण शरीर को गतिशील बनाता है तभी शरीर के भीतर के कार्यों का होना संभव हो पाता है। शरीर के भीतर चेतन आत्मा के अनंतर यदि प्राण को जीवन का आधार माना जाए तो कोई गलती नहीं होगी क्योंकि प्राण के रहते ही जीवन रहता है और प्राण के निकलते ही शरीर मृत हो जाता है। वैसे इस सिद्धांत को अपनाने पर प्रश्न उठ सकता है कि जल-भूमि आदि तत्वों में भी प्राण वायु है फिर वे चेतन क्यों नहीं होते? इसका उत्तर यही है कि भूमि तथा अन्य पदार्थों में मनुष्य की तरह ज्ञान-कर्म नहीं होता है। मनुष्य में कर्म तथा ज्ञान किसी और के अधीन है लेकिन यदि प्राण को जीवन का साधन मात्र समझ लें तो आत्मा की जरूरत ही नहीं रहेगी। इस प्रकार से प्राण को भी चेतन तत्व मानना पड़ेगा। लेकिन प्राण तो केवल वायु का कार्यक्षेत्र है क्योंकि उसी से पैदा होता है। इसीलिए जैसे दूसरे तत्व जड़ हैं उस तरह से प्राणवायु जड़ तत्व ही मानना चाहिए। जड़ से जगत की उत्पत्ति होती है।

प्राणवायु तत्व स्वाभाविक रूप से गतिशील कर्म तथा हिलने-डुलने वाला है लेकिन केवल गतिशील होने से उसे चेतन मान लिया जाए तो यह नादानी होगी। गतिशीलता तो वाहनों, रेलगाड़ी तथा हवाई जहाज में भी होती है तो क्या उन्हें भी चेतन मान लिया जाए ? उन्हें चेतन नहीं माना जा सकता है। जिस प्रकार से वाहनों को ज्ञान तथा कर्म से संचालित किया जाता है जो कि केवल उसको चलाने वाला व्यक्ति ही जानता है तभी उसको चलाया जा सकता है। इसका अर्थ यही है कि प्राणवायु से शरीर में गति तो है लेकिन ज्ञान तथा कर्म आत्मा का ही है। आत्मा ही चेतन है।

प्राण की उत्पत्ति
प्रलय काल के समय जब प्रकृति अपनी साम्य अवस्था को चली जाती है तो उसी को अंतिम अवस्था कहते हैं। उस समय केवल प्रकृति आत्मा तथा परमात्मा ही शेष रह जाते हैं। सत, रज, और तम त्रिगुण भी विलीन भाव को प्राप्त हो जाते हैं। उस समय में कोई विशेष गति नहीं होती है लेकिन प्रकृति का ब्रह्म से संबंध बना रहता है। कोई विशेष गति न होते हुए भी मूल प्रकृति में कंपन का भाव बना ही रहता है।

प्रकृति त्रिगुणात्मक है और रजस का स्थायी धर्म ‘क्रिया’ है। पूर्ण प्रलय में प्रकृति के सभी क्रियाकलाप समाप्त हो जाते हैं लेकिन फिर भी किसी न किसी रूप में अत्यंत सूक्ष्म स्तर पर कुछ न कुछ कर्म तो अवश्य मानना पड़ेगा। प्रकृति तथा ब्रह्म का संबंध कुछ उत्पन्न करने के लिए ही है। जब प्रकृति ब्रह्म के संपर्क में आती है तो अत्यंत सूक्ष्म स्तर पर प्राण की उत्पत्ति होती है।

एक समय के पश्चात प्रकृति में ‘ज्ञान’ ‘बल’ तथा ‘क्रिया’ की वृद्धि होती चली जाती है। आगे चलकर तीनों अपने मूल रूप में आने लगते हैं। प्रकृति का सबसे पहला गुणधर्म अथवा स्थिति ‘प्राण’ है। दूसरा सत्व गुण ‘ज्ञान’, तीसरा रजोगुण ‘क्रिया’, तथा चौथा तमोगुण ‘स्थिति’ है।

ये चारों मिलकर ही सृष्टि का सृजन करते हैं। जिस प्रकार प्रकृति नित्य है, उसी प्रकार इसकी शक्ति ‘प्राण’ भी नित्य है। बहुत गहरे चिंतन करने पर लगता है कि बिना प्राणशक्ति सत्व, रज, तथा तम से भी अत्यंत सूक्ष्म है। प्रकृति की प्रथम परिणिति प्राण होने के कारण ही सत्व, रजस् तथा तम का संघ तथा विघटन इसी के द्वारा है। आत्मा और चित के सहयोग से चित में उत्पन्न ‘प्राण’ को सर्वप्रथम ‘वृत्ति’ माना गया है। वैसे ही ब्रह्म और प्रकृति के सहयोग से प्राण को प्रकृति की सर्वप्रथम शक्ति माना गया है।

समस्त ब्रह्मांड में प्राण व्याप्त है। जो भी ग्रह, नक्षत्र, सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी आदि दिखाई देते हैं या नहीं दिखाई देते हैं। वे सभी किसी शक्ति के आधार पर चल रहे हैं अन्यथा बिना शक्ति के गति संभव नहीं है। ‘गति देना’ अर्थात ‘क्रिया’ जो कि रजस् का गुणधर्म है लेकिन संपूर्ण ब्रह्मांड में जो भी ‘क्रिया’ के आधार का ज्ञान है, वह परमपिता परमेश्वर का ही ज्ञान है। जब परमात्मा के ज्ञान का योग प्रकृति से होता है तो प्राण शक्ति उस समय में सभी क्रियाकलापों को जन्म देती है। वहीं प्राण स्थूल रूप लेकर शरीर के क्रियाकलापों को करता है। वही प्राण दस अलग-अलग नामों व कार्यों से शरीर में व्याप्त होकर संचालन करता है। उदान, प्राण, समान, अपान और व्यान पांच मुख्य प्राण तथा पांच उप-प्राण धनंजय, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त शरीर में अलग-अलग कार्य करते हैं।

प्राण का स्थान हृदय है और यहीं से समस्त शरीर को ऊर्जा मिलती है। यही ह्रदय आत्मा का निवास स्थान माना गया है।
हृदि हेष आत्म क अत्रैतदेअत्रैतदेकशतं नाडीनां तासां शतं शतमेकैकस्यां द्वासप्तति: प्रतिशाखा नाडीसहस्राणि भवन्त्यासु व्यानश्यरति ॥
जीवात्मा का निवास स्थान हृदय है। हृदय में 101 नाड़ियां हैं और 101 मूल नाड़ियो की सौ-सौ शाखाएं हैं। और उन सभी एक एक नाड़ी की बहत्तर- बहत्तर हजार प्रति शाखा नाड़ियां होती है। इन सभी नाड़ियो में व्यान नामक प्राण विचरता है। पूरे शरीर में ‘व्यान प्राण’ वायु का संचार सुचारू रूप से चलाता है। इनकी संख्या इस मंत्र में कही गई है।

इस संख्या को इस प्रकार जानें कि 101 मूल नाड़ियां हैं। प्रत्येक मूल नाड़ी की शाखा नाड़ी सौ-सौ है तथा प्रत्येक शाखा नाड़ी की प्रति शाखा नाड़ी 72000-72000 है। इस तरह यह कुल संख्या बहत्तर करोड़ बहत्तर लाख तक पहुंचती है। सभी नाड़ियों के बीच जो मूल नाड़ी है, वह ‘सुषुम्ना’ नाड़ी है। जो पांव से लेकर सिर तक होती हुई, नासिका के ऊपरी स्थान भृकुटी चक्र पर इंगला तथा पिंगला नाड़ियों में जा मिलती है। वही मूल नाड़ी इन सभी नाड़ियों के माध्यम से प्राण शक्ति शरीर में संचार करती है। इसलिए इस प्राणशक्ति को नमस्कार है।