डॉ. वरुण वीर
एक काफिला यात्रा के दौरान अंधेरी सुरंग से गुजर रहा था, तभी यात्रियों ने अनुभव किया कि उनके पैरों में कंकड़ियां चुभ रहीं हैं। कुछ यात्रियों ने इस विचार से कि किसी दूसरे आने वाले यात्री को ये कंकड़ियां न चुभें यह सोच कर कंकड़ियां उठा कर अपनी जेब में रख ली। कुछ ने कम उठाई, तो कुछ ने ज्यादा। जैसे ही सुरंग समाप्त हुई, तो उन यात्रियों ने अनुभव किया कि वे कंकड़ियां नहीं, बल्कि हीरे हैं। जिन्होंने कम उठाए, उन्हें दुख हुआ कि उन्होंने और क्यों नहीं उठाई? उनमें कुछ यात्री ऐसे भी थे, जिन्होंने कंकड़ियां यह सोच कर नहीं उठाई थी कि मैं क्यों उठाऊं, जो यात्री आएगा अपने आप उठा लेगा या अपने आप संभल कर अंधेरी सुरंग से निकल जाएगा। यही जीवन है। जीवन भी एक सुरंग की तरह है। अगर हम दूसरों के रास्ते के कष्टों को समाप्त करते हैं, तो हमें आगे चल कर वे हीरे की तरह जीवन में मिलते हैं। परोपकार कर्म की भावना रखते हुए हम सभी को कार्य करना चाहिए।
यं तु कर्माणि यस्मिन्स न्यायुडक्त प्रथमं प्रभु:।
स तदेव स्वयं भेजे सृज्यमान: पुन:पुन:॥
जो मनुष्य जिस प्रकार के कर्म करता है, परमात्मा उसे उसी प्रकार की योनि में भेज देता है। कर्म तीन प्रकार के होते हैं। सात्विक, राजसी तथा तामसी। सरल भाषा में हम इसे आचार, अनाचार तथा अत्याचार कर्म भी कहते हैं ।
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषत: कृतम्।
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ।। जो कर्म शास्त्र विधि के अनुसार नियत किया गया हो, कर्तापन के अभिमान से रहित, फल की इच्छा के बिना, राग द्वेष रहित किया गया हो तथा आचार कर्म की श्रेणी में वह कर्म आते हैं, जो किसी का अहित नहीं करते हैं। अहिंसा का पालन, सत्य बोलना, चोरी, गाली-गलौच, अपमान, चुगली, निंदा आदि कर्म न करना। वह कर्म जिसके करने से प्रसन्नता, उत्साह तथा दूसरों को प्रेरणा मिले, इस प्रकार के कर्म आचार कर्मों की श्रेणी में आते हैं यानी इस प्रकार के कर्मों को सात्विक कर्म कहा गया है।
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम्।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥
जो कर्म बहुत परिश्रम से किया जाता है, ऊपर से भोग इच्छा से या अहंकार से किया जाता है तथा वह कर्म जिसके करने से धैर्य का त्याग, असत् कर्मों का ग्रहण, अत्यधिक भौतिक इच्छाओं की पूर्ति, निरंतर विषयों का सेवन आदि राजसी अर्थात अनाचार कर्म है।
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुन: ।
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्॥ वह कर्म जो परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्य को ध्यान में रखे बगैर किया जाता है तथा अज्ञान की वजह से किया जाता है वह कर्म तामसी कहा गया है। अर्थात अत्याचार कर्म में क्रूरता, हिंसा, अत्यंत आलस्य, नास्तिकता, अत्यंत लोभ, असत्य, चोरी, अन्याय तथा दूसरों को पीड़ा देना आदि कर्म आते हैं।
हम सभी मनुष्यों को तामसिक कर्म से राजसी, तथा राजसी कर्म से सात्विक कर्म की ओर बढ़ना चाहिए। आज आधुनिक युग में कर्मों के विधान को इतनी गहराई से कोई नहीं देख रहा है। भारतीय समाज आंख बंद कर धन की दौड़ में भागा चला जा रहा है। जीवन का लक्ष्य क्या है? सुख का मूल क्या है? इन भावनाओं को त्याग कर जीवन में सुख को पाने के लिए केवल भौतिक सुख साधनों की खाई में गोते लगा रहा है। एक समय था, जब भारत विश्व गुरु हुआ करता था। केवल ज्ञान विज्ञान में नहीं, बल्कि राजनीतिक न्याय-व्यवस्था, शिक्षा, चिकित्सा तथा जीवन शैली किस प्रकार की होनी चाहिए यह विश्व के अनेक राष्ट्र हमसे सीखने भारतवर्ष आया करते थे। पारिवारिक संबंध, सामाजिक व्यवहार तथा राष्ट्रीय व्यवहार किस प्रकार का होना चाहिए हमारे ऋषि-मुनियों ने इस विषय पर
अनेकों अनुसंधान किए थे।
बुद्धि युक्तो जहातीत उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माघोगाय युज्यस्व योग: कर्मसु कौशलम्॥
बुद्धिमान मनुष्य इस जगत में सुख और दुख दोनों ही प्रकार के कर्म में आसक्ति को छोड़ देता है इसलिए योग मार्ग पर चलने का प्रयत्न करें। कर्म को श्रद्धा और निपुणता से करना चाहिए। योग द्वारा अच्छे और बुरे कर्मों की पहचान करनी आवश्यक है। कौन-सा कर्म लोक कल्याण कारक है? कौन-सा कर्म बंधन कारक है? सब पर बुद्धि पूर्वक विचार कर कर्म करना ही कर्मयोग है। मनुष्य को सदा इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि राग-द्वेष से रहित यानी आत्मा से सत्य कर्म जाने तथा उसी कर्म को करना चाहिए, जैसे जब कोई चोरी तथा कोई बुरा कर्म करता है तभी उसके अंतकरण में भय, लज्जा तथा शंका उत्पन्न होती है तब व्यक्ति को समझ जाना चाहिए कि यह उत्तम कर्म नहीं है लेकिन यह वही मनुष्य अधिक अनुभव कर सकता है, जिसकी बुद्धि और जीवन-शैली सात्विक तथा पवित्र बनी हुई है। दुष्ट व्यक्ति लगातार लंबे समय से चोरी, असत्य तथा हिंसक कर्म कर रहा है, तो वह अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनने में असमर्थ भी हो सकता है। इसलिए अपने कर्म को मुख्य रूप से अच्छाइयों की ओर चलाना चाहिए।
सत्यं माता पिता ज्ञानं धर्मो भ्राता दया स्वसा।
शान्ति: पत्नी क्षमा पुत्र: षड़ते मम बान्धवा:॥
प्रसन्न चित्त आनंदमय योगी के स्वरूप और व्यवहार को देख कर किसी ने पूछा, योगीवर आपके आनंद का राज क्या है? योगी बोले मेरे जीवन की हर गतिविधि सत्य पर टिकी हुई है। सत्य मेरी मां के समान है। ज्ञान मेरे पिता समान है, जो मेरा लालन पोषण करता है ‘धर्म’ मेरा भाई है। प्राणी मात्र में दया की भावना रखना मेरी बहन है। शांति मेरी पत्नी है तथा क्षमा शीलता मेरा पुत्र है। ये छह गुण अगर हम अपने जीवन में अपना लें तो समस्त परिवार और समाज आनंदमय हो सकता है। वर्तमान समय में भौतिकवादी युग में पारिवारिक तथा सामाजिक संबंध कच्चे पड़ गए हैं। संबंधों में विश्वास समाप्त हो चुका है। पति-पत्नी तथा पत्नी-पति पर विश्वास नहीं कर पा रही है। सभी प्रकार के संबंधों को संदेह की दृष्टि से देखना हमारी पुरातन संस्कृति को कमजोर कर रहा है।
आज भारत में भारतीयता दिखाई नहीं देती है। कुछ वर्ष पहले मैं बैंकॉक के हवाई अड्डे से टैक्सी लेकर शहर की ओर चला तब मैंने बहुत बड़ा बोर्ड देखा, जिसमें अभिवादन करने के तीन चित्र बने हुए थे और थाई भाषा में कुछ लिखा हुआ था। मैंने अपने थाईलैंड के सहयोगी मित्र से पूछा कि यह क्या है? तब उसने बताया कि बोर्ड में दर्शाया गया है कि किस प्रकार से अभिवादन करना चाहिए जैसे अगर हम समान उम्र वाले व्यक्ति से मिलते हैं तो सीधे हाथ जोड़ तथा खड़े होकर अभिवादन करें, अगर माता-पिता तथा अध्यापक हैं तो थोड़ा झुक कर अभिवादन करें और अगर पुजारी या संन्यासी हैं तो नब्बे डिग्री के एंगल पर झुक कर अभिवादन करें। यह शिक्षा वहां की सरकार अपनी जनता को सिखाती है। यह सरकार का ही कर्तव्य है कि वह अच्छे से अच्छे संस्कार से नागरिकों के चरित्र को विनम्र, सहनशील, संतोषी, अहिंसक तथा परोपकारी बनाएं। स्कूल, अस्पताल, सड़क, पुल आदि भौतिक विकास तो जरूरी हैं, लेकिन देश के नागरिकों का बौद्धिक तथा आध्यात्मिक विकास भौतिक विकास से कहीं अधिक आवश्यक है। परिवार में सबके साथ किस प्रकार का व्यवहार किया जाए, यह केवल माता-पिता का दायित्व नहीं, बल्कि अध्यापक का भी दायित्व है। तथा अध्यापक कहां से सीखे? यह मूल रूप से सरकार का दायित्व है कि विद्यालयों के स्तर से ही नैतिक शिक्षा का पाठ पढ़ाया जाए तथा किस प्रकार से उसे व्यवहार में लाना है यह भी सिखाया जाए। आज भारत को सभ्य बनाने की अत्यंत आवश्यकता है। भारत के नागरिक अपने अधिकारों के लिए तो सड़कों पर उतरकर धरना प्रदर्शन करते दिखाई देते हैं लेकिन अपने कर्तव्यों के प्रति आलसी और निकम्मे दिखाई देते हैं। देश में चारों ओर तामसिक और राजसी कर्म ही दिखाई देता है। सरकार शिक्षा में बड़े परिवर्तन की तैयारी करें और राष्ट्र का चरित्र निर्माण करे। तभी मनुष्य उत्तम कर्म करेगा और तभी उसके उत्तम भाग्य का निर्माण होगा।
