घर के भीतर कैरमबोर्ड और घर के बाहर सिर्फ बगीचे में बैडमिंटन खेलने की आजादी देने वाला समाज अब अपेक्षा करने लगा है कि उनके घर की बेटियां भी देश के लिए कोई पदक लेकर आएं। यह राह आसान नहीं है क्योंकि इसके लिए लड़कियों को ड्रेस कोड की सामाजिक बाध्यताओं से पार पाना है और उस शोषण का सामना करना है जो उन्हें खेल प्राधिकरणों के भीतर झेलना पड़ता है। पहलवानी यानी रेसलिंग में 2016 भारत के लिए एक उपलब्धि साक्षी मलिक के रूप में लेकर आया था, जब उसने रियो ओलंपिक में देश के लिए कांस्य पदक हासिल किया। इसी ओलंपिक में बैडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधू ने रजत पदक जीतकर देश में महिला खिलाड़ियों के लिए बेहतर भविष्य का संकेत दिया और दीपा कर्माकर ने भी चौथा स्थान हासिल कर जिमनास्टिक जैसे खेल में भी भारतीय महिलाएं चुनौती दे सकती हैं। रेसलिंग, बॉक्सिंग, वेट लिफ्टिंग, चक्का फेंक और जिमनास्टिक में भारतीय महिला खिलाड़ियों की ये उपलब्धियां साबित करती हैं कि वे अब पुरुषों के वर्चस्व वाले खेलों और उसमें अपने करिअ‍ॅर को लेकर काफी गंभीर हैं। इनमें वे सिर्फ भाग नहीं लेना चाहतीं, बल्कि पदक भी जीतना चाहती हैं। यह एक उल्लेखनीय बदलाव है और इसमें महिला उत्थान के उन आह्वानों का भी असर परिलक्षित होता है, जिसकी चर्चा काफी समय से होती रही है।

हमारे समाज में कुश्ती-पहलवानी, वेट लिफ्टिंग, बॉक्सिंग, भाला फेंक और चक्का फेंक जैसे खेलों के साथ यह अलिखित शर्त जुड़ी रही है कि ये तो पुरुषों के खेल हैं। जब पहली बार 2000 के ओलंपिक में कर्णम मल्लेश्वरी ने महिलाओं के 69 किलोग्राम वर्ग में भारोत्तोलन में कांसे का पदक दिलाया तो लगा कि महिलाओं पर खेलों में कायम बंधन अब थोड़े ढीले होंगे। साइना नेहवाल ने बैडमिंटन में देश को दूसरा ओलंपिक पदक (कांस्य) दिलवाया और फिर 2012 के लंदन ओलंपिक ने एमसी मैरी कॉम को मुक्केबाजी में पदक दिलाया तो उम्मीदों को और बल मिला। जिस देश में कन्या भ्रूण हत्या अब भी जारी है और जहां बेटी बचाओ के बाद बेटियों को पढ़ाने की ही बातें हो रही है, वहां लड़कियों के लिए ऐसे खेलों में भी मौके हैं जो अब तक सिर्फ पुरुषों के लिए ही सीमित माने जाते थे।

रूढ़ियां कैसे असर डालती रही हैं, इससे संबंधित एक रहस्योद्घाटन बैडमिंटन खिलाड़ी ज्वाला गुट्टा एक टीवी कार्यक्रम में कर चुकी हैं। गुट्टा ने बताया था कि वे बैडमिंटन में सिर्फ इसलिए आ पार्इं क्योंकि इसमें खुले मैदान में खेलने की बाध्यता नहीं थी और त्वचा के काला पड़ने का खतरा नहीं था। पर रूढ़ियों को धता बताते हुए कई लड़कियों ने वह साहस दिखाया है जो उन्हें ‘दंगल’ की ‘शेरनियों’ से कम नहीं ठहराता है, इसलिए उनका भी नोटिस लिया जाना चाहिए। जैसे इंचियोन में आयोजित 17वें एशियाई खेलों में बॉक्सर एल सरिता ने कड़ी मेहनत से कांस्य पदक जीता था। मशहूर महिला बॉक्सर मैरी कॉम ने भी इंचियोन में अपनी सफलता दोहराई थी, पर साथ में भारतीय खिलाड़ी अन्नू रानी ने भाला फेंक में कांस्य और पूनिया ने चक्का फेंक में स्वर्ण पदक जीतकर दर्शा दिया था कि भारतीय महिलाएं किसी से कम नहीं हैं। लड़कियों को कठिन व ताकतवर खेलों में जाने को छूट देने की जो समझ इधर हमारे समाज में पैदा हुई है, उसके पीछे मैरी कॉम और गीता-बबीता फोगाट का श्रेय है। अभी भी कई खेलों में महिला खिलाड़ियों को उनका वास्तविक और वाजिब हक नहीं मिल रहा है। वहां उनके साथ काफी भेदभाव होता है। खुद दीपा कर्माकर स्वीकार कर चुकी हैं कि देश में विश्वस्तरीय जिमनास्टिक की सुविधाएं नहीं हैं।

यों तो केंद्र और राज्य सरकारें खेलों में पदक लाने वाली लड़कियों को खूब ईनाम बांट रही हैं, पर सवाल खिलाड़िनों को उचित अवसर देने और उस शोषण से बचाने का है जो उन्हें कई स्तरों पर झेलना पड़ता है। 2015 में हुई जिस एक घटना ने महिला खिलाड़ियों के शोषण के बारे में देश का ध्यान खींचा था, वह केरल के भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) के प्रशिक्षण केंद्र में हुई थी। केंद्र में चार उदीयमान महिला खिलाड़ियों ने आत्महत्या की कोशिश की थी, जिनमें से एक की मृत्यु हो गई थी। इन लड़कियों ने आरोप लगाए थे कि वहां उनका शारीरिक उत्पीड़न या यौन शोषण हो रहा था। जब यह शोषण उनकी बर्दाश्त से बाहर हो गया तो उन्होंने एक साथ जहरीला फल खाकर जान देने का प्रयास किया था। इस घटना से यह मुद्दा चर्चा में आया था कि किसी न किसी स्तर पर महिला खिलाड़ियों का कोई शोषण या उत्पीड़न होता है। देश में पहले भी ऐसी कई घटनाओं का खुलासा हो चुका है जब महिला खिलाड़ियों ने अपने साथ होने वाली ज्यादती के आरोप लगाए थे।

मशहूर मुक्केबाज मैरी कॉम तक ऐसे शोषण को झेल चुकी हैं और कई अन्य नामी खिलाड़ियों ने ऐसे उत्पीड़न की शिकायतें की हैं। सिडनी ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने वाली कर्णम मल्लेश्वरी ने एक अवसर पर भारोत्तोलन के कोच पर यह आरोप लगाया था कि वह महिला खिलाड़ियों के साथ शारीरिक हद तक की बदतमीजियां करता था। मल्लेश्वरी ने तो भारोत्तोलन प्राधिकरण से मांग की थी कि उन्हें उपलब्ध कराया गया कोच महिला खिलाड़ियों के साथ काम करने योग्य नहीं है। मल्लेश्वरी के समान देश की महिला हॉकी टीम भी अतीत में अपने कोच पर ऐसे ही शोषण के आरोप लगा चुकी है। महिला खिलाड़ियों के साथ छेड़छाड़ और ज्यादती की खबरें सिर्फ खेल प्राधिकरणों के भीतर से नहीं आतीं, बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के आयोजनों के वक्त भी उन्हें परेशान करने या उन पर बेजा दबाव डालने की घटनाएं प्रकाश में आ चुकी है।

टेनिस या गोल्फ जैसे महंगे खेलों में तो महिला खिलाड़ियों के साथ ऐसे वाकये अक्सर नहीं होते, लेकिन बैडमिंटन, तैराकी, कबड्डी, खो-खो से लेकर तीरंदाजी या एथलेटिक्स में उन्हें कोच या प्राधिकरणों के अधिकारी परेशान करते हैं। रुचिका मल्होत्रा जैसी प्रतिभावान खिलाड़ी की आत्महत्या इसकी गवाही देती है कि खेलों में महिला खिलाड़ियों का शोषण से पूरी तरह से बचाव नहीं है। कई खेलों में मध्य या निम्न मध्य वर्ग की लड़कियां आती हैं। ऐसी लड़कियों के पास किसी नाकामी की सूरत में वापसी की कोई राह नहीं होती है। यानी उन्हें या तो खेलों में ही अपनी योग्यता साबित करनी होती है या फिर उसके बल पर सरकारी नौकरी पा लेने का प्रबंध करना होता है। ऐसी स्थिति में वे खेल प्राधिकरणों के हाथों का खिलौना बन जाती हैं। गांव-कस्बों से आने वाली ये लड़कियां अपने अधिकारों के प्रति भी जागरूक नहीं होतीं, इसलिए हर तरह का शोषण तब तक बर्दाश्त करती हैं जब तक कि पानी सिर से ऊपर नहीं हो जाता। वे शिकायत करने की हिम्मत नहीं जुटा पाती हैं क्योंकि इससे उनका खेल करिअ‍ॅर ही नहीं तबाह होता, नौकरी पाने की संभावना भी खत्म हो जाती है। ऐसी स्थिति में भारी दबाव के बीच कभी कभी वे कोई आत्मघाती विकल्प भी चुन लेती हैं।

ए क बड़ी समस्या महिला खिलाड़ियों के कपड़ों को लेकर भी होती है। 2015 में पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में महिला फुटबाल मैच इसलिए रद्द कर दिया गया था, क्योंकि कुछ कट्टरपंथियों ने कहा था कि लड़कियों को छोटे कपड़े पहनना उन्हें मंजूर नहीं। सानिया मिर्जा की पोशाक को लेकर तो कई मौकों पर विवाद खड़े किए गए। पहलवानी और जिमनास्टिक में भी महिला खिलाड़ियों के कपड़ों को लेकर हमारे समाज के कुछ तबकों की दकियानूसी सोच के दर्शन भी जब-तब होते रहते हैं। यह समझना वाकई मुश्किल है कि महिलाएं कुछ काम सिर्फ इसलिए नहीं कर सकतीं, क्योंकि समाज के कुछ तबके उस पेशे के मुताबिक अपनाए जाने वाले ड्रेसकोड के विरोधी हैं। भारत जैसे देश में तो ऐसे तुगलकी फरमान महिला खेलों की भारी दुर्गति कर सकते हैं। जीवन के लगभग हर क्षेत्र में महिलाओं को ऐसी हिदायतें दी जाती रही हैं कि किस मौके पर वे क्या पहनें? समाज के भीतर से ही नहीं, बल्कि सरकार के स्तर पर भी महिलाओं को ऐसे निर्देश दिए जाते रहे हैं कि वे क्या पहनें और क्या नहीं। ऐसे निर्देशों में कपड़ों के चयन का मानदंड पेशे की जरूरत के मुताबिक नहीं होता, बल्कि समाज की दकियानूसी सोच के अनुसार होता है जिसमें उनसे शालीन कपड़े पहनने की अपेक्षा की जाती है। (मनीषा सिंह)