भारत में महिलाएं चूल्हा-चक्की से मुक्त होकर अध्यापन, बैंकिंग, आइटी और पत्रकारिता जैस तमाम पेशों में पुरुषों से कंधे से कंधे मिलाकर चल रही हैं, लेकिन लेकिन व्यवसाय के क्षेत्र में आज भी उनकी मौजूदगी नगण्य है। ऐसे फतवे भी दिए जाते हैं कि वे कोई कारोबार चलाने का जोखिम तब तक मोल नहीं लेना चाहतीं जब तक कि उनकी कोई पारिवारिक पृष्ठभूमि न हो। हालात तो ये भी हैं कि कारोबारी परिवार का हिस्सा होने के बावजूद उन परिवारों की महिलाएं अपना अलग कारोबार करने से हिचकती हैं,चाहे उनके पास इसके लिए भरपूर मौके क्यों न हों। हाल में, देश में स्टार्टअप जैसे अभियान के आरंभ के साथ ये सवाल और अहम हो गए हैं क्योंकि अगर नई कंपनियों में महिलाओं की प्रभावी उपस्थिति और भूमिका नहीं होगी तो विकास अधूरा ही रह सकता है।
देश में कारोबार और राजनीति जैसे पेशों में महिलाओं की उपस्थिति से जुड़ा यह एक बड़ा सच है कि उनका असल में इनमें कोई खास दखल नहीं होता। परंपरागत रूप से भारत जैसे पितृसत्तात्मक समाज में व्यवसाय और राजनीति में महिलाओं की कम उपस्थिति का एक कारण यही है कि उनके परिवार वाले ही नहीं चाहते कि महिलाएं इन पेशों में जाएं। पर ऐसा नहीं है कि महिलाएं इन पेशों से जुड़े जोखिम नहीं उठा सकतीं। स्वाति पीरामल और किरण मजूमदार शॉ जैसी सफल उद्योगपति महिलाएं भी हैं। इनकी सफलता ने महिलाओं की योग्यता को साबित किया है। पर देखा गया है कि अगर राजनीति और कारोबार से जुड़े परिवारों की ही कोई महिला इन पेशों में जाकर अपनी काबिलियत साबित करना चाहे तो पहला विरोध उसके परिवार से ही होता है। वहां कहा जाता है कि इस काम के लिए परिवार के मर्द ही काफी हैं। इसलिए अच्छा होगा कि वे अपने पति और बच्चों की देखभाल करें और किटी पार्टियों में जाकर अपना मन बहलाएं।
इस मामले में वास्तविक दोष हमारे सामाजिक माहौल का है। आज अगर कोई महिला व्यवसाय जमाना चाहे या अध्यापन को छोड़कर किसी अन्य क्षेत्र में नौकरी करना चाहे तो ऐसा करना उसके लिए आसान नहीं है। इस माहौल की एक झलक हाल में विश्व बैंक द्वारा जारी की गई रिपोर्ट ‘महिलाएं : कारोबार और कानून’ से मिलती है, जिसमें भारतीय कामकाजी महिलाओं पर कई ऐसी ही पाबंदियों का उल्लेख है। इन पाबंदियों के पीछे लागू होने वाला आम तर्क यह है कि महिलाएं आजीविका के लिए घर के मर्दों पर आश्रित हैं और उन्हें पैसे की कोई समझ नहीं होती, लिहाजा वे आर्थिक मामलों से दूर ही रहें तो बेहतर।
हमारे समाज की यह एक बड़ी विडंबना है कि संविधान भले ही महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार और माहौल देने की बात करता है, लेकिन सामाजिक संकीर्णताओं और पाबंदियों के कारण ज्यादातर महिलाएं अपनी छोटी-मोटी जरूरतों के लिए भी पति के दिए पैसे और उससे पहले आदेश की मोहताज हैं। हिसाब-किताब से महिलाओं को दूर रखने की परिपाटी से नौकरी के लिए बाहर जाने की उनकी इच्छा व क्षमता भी प्रभावित होती है। यही वजह है कि एक ओर महिलाओं के कामकाज के दायरे सीमित कर दिए जाते हैं तो दूसरी तरफ पुरुष सहकर्मियों के मुकाबले उनके वेतन में अंतर रखा जाता है और करिअॅर में आगे बढ़ने का उन्हें हर वह मौका उपलब्ध नहीं कराया जाता है, जो समान योग्यताएं रखने वाले पुरुषों को हासिल होता है।
इस सामाजिक अलगाव का एक परिणाम यह निकला है कि देश के दर्जनों पेशों में स्त्रियों की मौजूदगी को एक प्रकार से नजरअंदाज ही कर दिया गया है। र्इंट-भट्ठा उद्योग, बीड़ी व्यवसाय, निर्माण क्षेत्र, कताई, बुनाई आदि में असंख्य महिला मजदूर कार्यरत हैं। पर वे वहां उपस्थित होकर भी अनुपस्थित मान ली गई हैं क्योंकि उन्हें कामकाजी माना ही नहीं जाता। यही वजह है कि वहां न तो उनके कामकाज का समय तय है न वेतन निश्चित है और न ही वह स्वस्थ माहौल, जिसकी एक महिला मजदूर को जरूरत है।
शायद यही वजह है कि उनके साथ होने वाले हर तरह के भेदभाव और शोषण को सिर्फ उनकी नियति मान लिया जाता है, इसकी कोई खबर तक नहीं बनती। दुनिया के मोर्चे पर देखें तो कुल उत्पादक श्रमिकों में महिलाओं की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत तक है। इसमें शायद ही एक प्रतिशत महिलाएं ऐसी हों जिन्हें मन-मुताबिक काम मिला हुआ है और जिन्हें पुरुष सहकर्मियों के बराबर योग्य माना जाता है। लेकिन अन्य सभी महिला श्रमिकों को रोजगार और वेतनमान में उपेक्षित ही रहना पड़ता है।
जैसे 2013 में देश में कराए गए एक सर्वेक्षण में खुलासा हुआ कि श्रम बाजार में महिलाओं को शहरी और ग्रामीण, दोनों क्षेत्रों में कम दर पर पारिश्रामिक मिलता है। शहरों में पुरुषों की प्रतिदिन की औसत आय 365 रुपए और महिलाओं की आय 232 रुपए है, जबकि गांवों में पुरुषों की आय 249 रुपए और महिलाओं की 156 रुपए है। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की तरफ यह नमूना सर्वेक्षण कराया गया था।
सर्वेक्षण में यह बात भी निकलकर सामने आई कि अनियमित कामगारों की मजदूरी में भी अंतर है। अनियमित श्रेणी के कामकाज में पुरुष श्रमिकों को 102 रुपए और महिला श्रमिकों को 69 रुपए मिलते हैं।
लंबे समय तक इस भेदभाव के लिए एक आधार यह बनाया जाता था कि घर से बाहर के असुरक्षित वातावरण और महिलाओं के अनुकूल ढांचागत सुविधाओं का अभाव महिलाओं को कामकाज या मजदूरी करने से रोकता है। इससे यह धारणा बना ली गई कि महिलाएं कुछ खास किस्म के सरल प्रवृत्ति वाले काम ही कर सकती हैं और कभी भी-कहीं भी काम करने को तैयार नहीं हो पाती हैं। लेकिन अब तो लड़ाकू विमान उड़ाकर और सेना के अग्रिम मोर्चों पर काम करके महिलाओं ने इस धारणा को धराशायी कर दिया है। शहरों में तो अब शादियों में यह चलन भी जोर पकड़ रहा है कि स्त्री अगर कामकाजी हो तो ज्यादा बेहतर। इसके पीछे गृहस्थी का आर्थिक बोझ कम करने की मानसिकता काम कर रही है। लेकिन यहां विडंबना यह है कि एक तरह घरेलू महिलाओं के कामकाज को अनुत्पादक श्रेणी का मान लिया गया और इसके लिए किसी भी तरह के वेतन के बारे में कोई व्यवस्था नहीं की गई तो दूसरी तरफ घर से बाहर काम करने वाली महिलाओं से दफ्तर के साथ-साथ घर के कामकाज में भी बराबर योगदान की अपेक्षा की जाने लगी।
हमारे समाज की यह रूढ़िवादी सोच शहरों की उन कामकाजी महिलाओं की जिंदगी और मुश्किल बना रही हैं जो मानती हैं कि रोटी बनाने और खिलाने के साथ-साथ रोटी कमाना भी महत्त्वपूर्ण है। नौकरीपेशा या कामकाजी महिलाएं सोचती हैं कि जिस तरह पैसे कमाने वाले पुरुषों को समाज में सम्मान हासिल हुआ है, उसी तरह अपने घर की रोटी कमाकर वे भी फैसले लेने वालों की पांत में आ सकती हैं। महिलाएं आज घरों को अपनी कमाई के बल पर चला भी रही हैं, लेकिन वे समाज की मानसिकता और रूढ़ियों में अंतर नहीं ला पा रही हैं। धनार्जन करने के बावजूद वे महिलाओं को रोटी बनाने और खिलाने तक सीमित करने वाले सामाजिक मूल्य से मुक्त नहीं हो पाई हैं।
महिला श्रम की ऐसी उपेक्षा एक खतरनाक बात है क्योंकि ऐसी स्थिति में कोई भी समाज और देश संतुलित विकास नहीं कर सकता। इस बारे में विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र, दोनों का मत है कि महिलाओं की शिक्षा-दीक्षा में निवेश और उन्हें घर-बाहर कामकाज का स्वस्थ और बराबरी का माहौल, वेतन और अधिकार देने से न केवल सामाजिक उन्नति होती है बल्कि किसी भी देश के आर्थिक विकास में महिलाओं की हिस्सेदारी भी बढ़ती है। पर इस बारे में अंतरराष्ट्रीय वूमेंस राइट ग्रुप का एक और मत उल्लेखनीय है। इस ग्रुप का कहना है कि जब तक कि महिलाएं खुद इस बराबरी के लिए आवाज नहीं उठाएंगी तब तक इस दिशा में और महिलाओं की दशा में कोई बड़ा परिवर्तन होना संभव नहीं है। अब स्टार्टअप के रूप में एक बड़ा मौका व्यवसाय के क्षेत्र में सामने उपस्थित है, इसलिए प्रश्न है कि क्या महिलाएं खुद कोई पहल करते हुए इसका फायदा उठाना चाहती हैं? (मनीषा सिंह)
