सुमन बाजपेयी

औरत हर तरह से सक्षम है, यह बात पुरुष भी स्वीकार करते हैं, बेशक उसमें मुखरता के स्वर उतने तीव्र नहीं हैं, जितने होने चाहिए। पर भीतर ही भीतर वे इस सच को हर पल पालते-पोसते रहते हैं- फिर भी विडंबना यह है कि स्त्री हर क्षण इसी कोशिश में लगी रहती है कि वह उसकी बराबरी करे या वह यह साबित करने का प्रयास करती है कि वह उससे सर्वश्रेष्ठ है, यह जताने का भी हर संभव प्रयास करती है। कई बार इस प्रयास में वह फूहड़ तरीकों का इस्तेमाल करने से भी गुरेज नहीं करती। वह जब-तब उसकी प्रतिद्वंद्वी बन कर उसे चुनौती देती रहती है। पुरुष ऐसा करता है तो मैं भी ऐसा करूंगी, वह जैसे बोलेगा, मैं भी बोलूंगी, वह पैंट पहनेगा तो मैं भी पहनूंगी, वह तन कर चलेगा तो मैं भी चलूंगी। आज की औरत कहती है कि मैं चाहे ये करूं मैं चाहे वो करूं, मेरी मर्जी। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि बेजिंग सम्मेलन में जोर-शोर से की गई इस घोषणा की काफी चर्चा हुई। उसने कहा कि यह शरीर मेरा है, और इसकी मालकिन भी मैं ही हूं। मर्द कई औरतों से संबंध बना सकता है, तो वह भी कई पुरुषों के साथ संसर्ग कर सकती है। उसकी मर्जी जिससे चाहे विवाह करे, मन न मिले तो तलाक ले ले, या मन न हो तो शादी न करे, बच्चे पैदा करे न करे, सहजीवन में रहे। यही नहीं, अगर पुरुष उसकी न सुने तो उस पर यौन शोषण का आरोप लगा दे।
वह यह समझ ही नहीं रही है कि उसे न तो पुरुष से होड़ करने की जरूरत है और न ही उसकी बराबरी। वे तो एक-दूसरे के पूरक हैं। दोनों को साथ-साथ चलना है, क्योंकि चाहे दोनों कितने ही सक्षम क्यों न हों, उन्हें हर कदम पर एक-दूसरे का साथ चाहिए। स्त्री को पुरुष की या पुरुष को स्त्री की बराबरी करने की जरूरत भी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि दोनों अपने आप में अनूठे हैं। फिर जैसे को तैसा का नारा लगाने का क्या औचित्य है। उसे अपनी ताकत पर भरोसा रखना चाहिए। वह यह क्यों नहीं देखती कि स्त्री खुद में ही एक बहुत बड़ी ताकत है, इतनी बड़ी कि वह मर्द पैदा करती है! उसे मजा चखाने की प्रवृत्ति जो स्त्री के अंदर पल रही है, वह उसे कहीं न कहीं कमजोर करती है।

सीमोन द बोउवार ने कहा है कि औरत पैदा नहीं होती, बनाई जाती है। फिर क्यों वह बराबरी के हक के लिए बीच बाजार में खड़ी होकर अपनी लावण्यता और कोमलता को झुलस रही है। माना कि वह देह से ऊपर है, पर उसकी रचना पुरुष से अलग है और उसे उसी के अनुसार अपनी ताकत को मान देना चाहिए, न कि पुरुष से बेहतर होने की चाह मन में पाल कर, उसे नीचा दिखाने के लिए कमर कसनी चाहिए। वह पुरुषों जैसी बन रही है, पर उसने एक पल के लिए भी कभी सोचा कि पुरुष तो कभी भी उसके जैसा बनने का प्रयास नहीं करता है।
वह कॉरपोरेट ऑफिस में, बैंक में, सेना में, सीमा पर, एवरेस्ट की ऊंचाई पर, हर जगह है। वह जहाज उड़ा रही है, गणतंत्र दिवस पर मोटरसाइकल पर विलक्षण संतुलन से सबको हैरत में डाल रही है, पर कितने पुरुष हैं जो घर में रोटी बेलते हैं? आटा गूंथते या परांठे बनाते हैं, बच्चों की नैपी धोते हैं या घर का कोई अन्य काम करते हैं। औरत अपनी सक्षमता को सिद्ध करने के लिए घर से निकली है, वह दोगुना काम कर रही है। पर पुरुष ऐसा नहीं कर रहा है, क्योंकि वह कोई बराबरी करना ही नहीं चाहता है।

आजकल अक्सर महिला सशक्तीकरण को लेकर कई तरह के सवाल और कयास लगाए जा रहे हैं। महिलाएं निरंतर अपने अधिकारों के लिए लड़ रही हैं, ताकि पुरुषों की बराबरी कर, उनकी एक प्रतियोगी की तरह बन सकें। महिलाओं की यह मुखरता कहीं न कहीं एक स्वच्छंदता और उद्दंडता का रूप लेने लगी है। और तब एक ही बात समाज करता है कि आखिर वह इस तरह कौन-सा महिला सशक्तीकरण हासिल करना चाहती है? यह कैसी स्वतंत्रता है, जो उसे पुरुषों से होड़ करने की ओर धकेल रही है? पुरुषों की तरह गाली देकर या असभ्य आचरण करने से वह जिस जैसे को तैसा के सिद्धांत को जीना चाहती है, वह उसे आगे नहीं और पीछे धकेल रहा है। स्त्री हो या पुरुष, दोनों की अपनी अलग शारीरिक संरचनाएं हैं और उसके अनुसार ही वह काम करते आए हैं। पुरुष तो नहीं कहता कि वह साड़ी पहनना चाहता है या बच्चे पैदा करना चाहता है, तो फिर स्त्री क्यों उससे होड़ कर कहती है कि वह उसके जैसे कपड़े पहनेगी या उसके जैसा व्यवहार करेगी। स्त्री और पुरुष के बीच लैंगिक अंतर तो प्रकृति की अनुपम देन है! इसको स्त्री की कमजोरी और पुरुष की ताकत समझना, पुरुष की सबसे बड़ी नासमझी है और इसे अपनी कमजोरी मान कर, इसे छिपाने के लिए स्त्री द्वारा पुरुषोचित व्यवहार या आचरण करना उससे भी बड़ी मूर्खता है। स्त्री को पुरुषों से होड़ करने की चाह में दया, ममता, कोमलता, सहनशीलता जैसे अपने नैसर्गिक गुणों को खोने नहीं देना चाहिए।

औरत की प्रजनन क्षमता, जिसे नारीवादी उसकी कमजोरी मानती हैं, उसकी कोख को उसका सबसे बड़ा शत्रु मानती हैं, वही तो उसकी सबसे बड़ी ताकत है। अगर कोख न हो तो औरत भी तो पैदा न हो। आखिर कोख से सिर्फ पुरुष तो पैदा नहीं होते।स्त्री का खुद को पुरुष की बराबरी करने का अव्यावहारिक और असंगत विचार भी बड़ी समस्या है, क्योंकि न पुरुष स्त्री की बराबरी कर सकता है और न ही स्त्री पुरुष की बराबरी कर सकती है। स्त्री और पुरुष की पूर्णता आपसी प्रतिस्पर्धा या एक-दूसरे को कमतर या श्रेष्ठतर समझने में नहीं, बल्कि सहयोग और एक-दूसरे को समझने में है। उसे यह समझना ही होगा कि वह चाहे कितनी सक्षम क्यों न हो जाए, चाहे कितनी तरक्की क्यों न कर ले, पर पुरुष के कंधे का सहारा उसे चाहिए होगा, वैसे ही जैसे पुरुष को उसके सहारे और साथ की जरूरत होती है।