लिंग युद्ध के बाद सम्राट अशोक को जब लोक से जुड़ने की जरूरत महसूस हुई तो उन्होंने शिलालेखों का ही सहारा लिया। वह शिलालेख ही हैं जिसके कारण लोेकमानस में अशोक की स्मृति युद्ध त्यागने वालों में है, अहिंसा के पैरोकारों में है। अगर युद्ध नहीं है तो फिर जनता ही होगी, और जनता से जुड़ने के लिए एक ही हथियार है संचार। अशोक के शिलालेख जनता की भाषा पालि में लिखे गए थे न कि शासक की भाषा संस्कृत में। कहते हैं कि अशोक को शिलालेख लिखने की प्रेरणा ईरान के शासक डेरियस से मिली थी।
अशोक जनता के बीच अपने काम का प्रचार करते हुए खुद को देवप्रिय कहते हैं। भारतीय इतिहास में अशोक पहले शासक हैं, जो जनसंचार का इस्तेमाल अपने जनमत निर्माण के लिए करते हैं। कहते हैं कि सत्ता उसी की है जिसका माध्यम पर कब्जा है। भारत जैसे कम साक्षरता दर वाले देश में दीवार से बड़ा जनसंचार का माध्यम और क्या हो सकता है। सत्ता बदलते ही सबसे पहले दीवारों का रंग और इबारत बदलती है। दक्षिण भारत की राजनीति तो दीवारों पर ही लड़ी जाती है, जहां शब्दों से ज्यादा चित्रों का महत्त्व होता है। इस दीवार की लड़ाई में जो पीछे हुआ उसका आगे बढ़ना भी मुश्किल हो जाता है।
राजनीतिक गंदगी ने ही लगाया प्रतिबंध
गली-मोहल्ले से लेकर विश्वविद्यालय परिसरों की दीवारों तक इसे-उसे वोट दो की लड़ाई ने भारत की दीवारों को बदरंग कर डाला था। अब सूरज उगने से पहले दीवारों पर सुलेख की रोशनी डालने वाले राजनीतिक कार्यकर्ताओं की कोई पूछ नहीं थी, छापेखाने से निकले पोस्टर और गोंद ही काफी थे। पोस्टर विज्ञापन में विचार पर प्रचार की गंदगी हावी थी। मुस्कुराते प्रणाम छाप मुद्रा की नेताजी वाली तस्वीरों ने दीवारों को बदरंग कर दिया था। इस हालत के खिलाफ आम लोगों ने आवाज उठाई, तो सरकारी दीवारों पर राजनीतिक या कारोबारी विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगाया गया।
