राजेश कुमार राव
दलित कहानीकारों की कहानियां आज के समय की महत्त्वपूर्ण सर्जनात्मक उपलब्धि हैं। इनमें विचारों और अनुभवों का टटकापन है। ये भारतीय समाज की विद्रूपताओं, विडंबनाओं को जिम्मेदारी के साथ व्यक्त करती हैं। विषमता और घृणा आधारित समाज की जगह समता और करुणा का महान विचार लेकर दलित कहानीकार लेखन की दुनिया में आते हैं। उनके चिंतन के मूल में महात्मा बुद्ध, कबीर, भीमराव आंबेडकर, पेरियार, ज्योतिबा फुले के विचार हैं। ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानी ‘सलाम’ में इस घृणित रिवायत की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है कि विवाह के बाद दलित समाज का दूल्हा तथाकथित ऊंची जातियों के घर जाकर सम्मान प्रकट करे। वाल्मीकि इस कहानी में दलित नायक हरीश के मित्र कमल उपाध्याय को सामने रख कर ऊंची जातियों को जातिगत अपमान की पीड़ा महसूस कराना चाहते हैं, जिससे वे अक्सर कन्नी काटते दिखते हैं या जानकर भी अनजान बनने की कोशिश करते हैं।
मोहनदास नैमिशराय जातिगत भेद की पीड़ा को अपनी कहानी ‘महाशूद्र’ में अलग नजरिए से देखते हैं। कहानी कहती है कि ब्राह्मणों में भी जिनका कार्य मुर्दों के क्रिया-कर्म को धार्मिक दृष्टि से निपटाना होता है, उनको समाज में ही नहीं, ब्राह्मण जाति में भी नीच दृष्टि से देखा जाता है। यानी नैमिशराय इस कहानी में कर्म की महत्ता को स्थापित करते हैं। तभी तो आचार्य जी कहते हैं- ‘हमें कहा जाता है महाब्राह्मण… पर इसका अर्थ जानते हो… महाशूद्र।’ जयप्रकाश कर्दम दलितों की सामाजिक स्थिति क्या है की जगह कैसी होनी चाहिए की बात करते हैं। उनकी ‘तलाश’ ऐसी ही कहानी है। इसमें रामवीर सिंह दलित हैं। बड़े अधिकारी हैं। रामवती को खाना पकाने से मना कर गुप्ता के मकान में रह सकते थे। पर मात्र जातिभेद के कारण रामवती को खाना बनाने से मना करना गलत मानते हैं। उन्होंने दूसरा मकान तलाश करना वाजिब समझा, लेकिन मकान मालिक गुप्ता की बात मानना ठीक नहीं समझा।
सूरजपाल चौहान की कहानी ‘बदबू’ की चिंता भंगी समाज द्वारा मैला ढोने की प्रथा है। भंगी समाज के अधिकतर लोग मैला ढोते हैं, जबकि इसी समाज की महिला पात्र संतोष को यह मानवीय गरिमा के साथ अन्याय लगता है। वह अपने समाज के तमाम लोगों से सवाल करती है कि आखिर कब तक परंपरा का हवाला देकर और अपनी नियति मान कर इसे हम लोग स्वीकार करेंगे।
‘बिते भर जमीन’ प्रेमशंकर की कहानी है। इसके दलित पात्र लिजलिजे या डरे हुए नहीं हैं, वे लड़ाकू और अपने सम्मान के लिए जान देने वाले हैं। जमीन उनके लिए सम्मान का प्रतीक है। इसके लिए कई पीढ़ियों से जमींदार की तीमारदारी करने के बावजूद उससे अपने हक के लिए लड़ने को तैयार बैठे हैं।
श्यौराज सिंह बेचैन की अधिकतर कहानियां दलित आकांक्षा और वैचारिक चेतना की ठोस जमीन पर खड़ी हैं। ‘भरोसे की बहन’ इसी चेतना की कहानी है। बहुजन समाज पार्टी और उसकी मुखिया के इर्द-गिर्द घूमती यह कहानी दलितों की आकांक्षा और उनके सपने को व्यक्त करती है। इस अर्थ में यह राजनीतिक कहानी भी है। लेकिन राजनीति ऐसी जो दलितों की जिंदगी में बदलाव ला सकती है। उनकी ‘संदेश’ कहानी आधुनिक विमर्श की उस वैचारिकी को तार-तार कर देती है, जिसमें माना जाता है कि दलित और गैर-दलित में विवाह संबंध स्थापित होने से जाति-व्यवस्था टूटेगी। कहानी में भीम सिंह नाम का दलित अफसर सवर्ण लड़की विनिता से प्रेम विवाह करता है, लेकिन यह विवाह तभी तक चल पाता है, जब तक कि विनिता आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं हो जाती। अधिकारी बनने और उच्च जाति के अफसरों के संपर्क में आने से भीम सिंह और दलित समाज के प्रति उसका नजरिया परंपरागत सवर्णों जैसा हो जाता है।
सुशीला टाकभौरे की कहानी ‘संघर्ष’ में दलित जाति के शंकर को स्कूल में पढ़ने से कोई मना नहीं कर सकता है। वह शान और स्वाभिमान से कक्षा में बैठ सकता है और आधुनिक द्रोणाचार्य भी उनको निकाल नहीं सकते हैं। गांव में छुआछूत और आचार – विचार की भावना ज्यादा है। फिर भी इतना परिवर्तन जरूर हुआ है कि शंकर स्कूल में दूसरी जातियों के विद्यार्थियों के साथ कक्षा में बैठ कर पढ़ सकता है। यह बात शंकर को बहुत अच्छी लगती है। शंकर जूठन खाना पसंद नहीं करता। वह सफाई कर्मी की जिंदगी नहीं बसर करना चाहता। वह अपने घर में विद्रोह कर देता है। वह चाहता है कि उसके घर के लोग भी इंसान बन कर रहें। सुशीला टाकभौरे अपनी कहानियों में दलित को पूरा इंसान बनते देखना चाहती हैं।
दयानंद बटोही की कहानी ‘सुरंग’ उच्च शिक्षा में दलित समाज के संघर्ष को व्यक्त करती है। इसमें दलित समाज का एक लड़का हिंदी में पीएचडी करना चाहता है। पूरी योग्यता के बावजूद हिंदी विभागाध्यक्ष येन केन प्रकारेण उसको प्रवेश से रोकना चाहता है। तर्क दिया जाता है कि जब इतने सालों से आरक्षण देने के बावजूद कुछ नहीं कर पाए तो अब क्या कर पाओगे। दलित छात्र का गुस्सा फूट पड़ा- ‘लोग कहते हैं, बीस वर्षों से सुविधा दी जा रही है। जब कई वर्षों तक अंधेरे में रखा गया तो लोग चाहते हैं कि तुरंत दौड़ने लगे। संसार तो धीरे-धीरे ही बदला जा सकता है।’
अजय नावरिया अपनी कहानियों में दबी-कुचली जातियों के शोषण का मुद्दा वैचारिकता और गंभीरता के साथ उठाते हैं। उन्होंने एक विडंबना की तरफ इशारा किया है कि जैसे-जैसे दबी-कुचली जातियां मजबूत हुई हैं, उनका शोषण तो कम हुआ है, लेकिन समाज में जाति कमजोर होने के बजाय उसका विस्तार और तेजी से हुआ है।
युवा दलित कहानीकार टेकचंद की कहानी ‘मोर का पंख’ में दलितों के लिए दोयम दर्जे के व्यवहार को गंभीर तरीके से उठाते हैं। इस दोयम दर्जे के व्यवहार का असर अंतर्मन पर ज्यादा पड़ता है और व्यक्ति मानसिक कुंठा का शिकार हो जाता है। यह अकारण नहीं है कि ‘मोर का पंख’ के विशाल की मन स्थिति और आत्मविश्वास परंपरा से प्राप्त सामाजिक और व्यक्तिगत स्थिति पर ज्यादा निर्भर करती है। कह सकते हैं कि दलित कहानियों और उनके कहानीकारों के अलग-अलग वैचारिक आयाम और निकष हैं। अधिकतर कहानियां दलित समाज की वर्तमान सामाजिक स्थिति को व्यक्त करती हैं। वे एक तरह से यथार्थ को ज्यों का त्यों प्रस्तुत करने में विश्वास करती हैं। इससे कई बार कहानी अखबार की रपट लगने लगती है। ऐसी स्थिति में उसकी कलात्मकता का क्षरण होता है।
कुछ कहानियां दलित समाज द्वारा जातिगत भेद और शोषण के विरुद्ध उनके संघर्ष को व्यक्त करती हैं। ऐसी कहानियां अपना प्रभाव छोड़ती और चेतना जागृत करती हैं। दलित समाज की वृहत्तर आकांक्षा को व्यक्त करने वाली कहानियों की संख्या अनुपात में कम है। दलित समाज के अन्दर की जटिल जातिगत संरचना और जातिभेद की पीड़ा वाली कहानियां तो और कम हैं। दलित कहानीकार अक्सर इससे कन्नी काटते दिखते हैं। वे अपनी कमजोरियों पर कम बात करते हैं। इससे अलग हट कर कुछ समकालीन दलित कहानीकारों ने खतरा मोल लेते हुए जातिगत मुक्ति की राह में गैर-दलित प्रगतिशीलता बनाम दलित दृष्टिकोण को सामने रखने की सफल कोशिश की है। यह उनके बने-बनाए खांचे को तोड़ने की कोशिश है।
जातिगत भेद को तोड़ने की कोशिश करती ये कहानियां एक नए भारत को बनते देखना चाहती हैं। इसके लिए साहित्य और समाज दोनों में प्रतिगामी ताकतों को वे नकारती हैं। वे वर्ण-व्यवस्था और उसके मूल्यों के विरोध में संघर्ष करती और खुद एक नया मूल्य बनाती हैं। वह मूल्य लोकतांत्रिक है, जो समानता और बंधुत्व पर आधारित है।

