हमारा समूचा समाज समस्याओं से ग्रसित है। हर किसी का जीवन उथल-पुथल से भरा पड़ा है। न चाहते हुए भी हम अनेक समस्याओं का सामना करते रहते है। नित नई अनचाही समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं। ये समस्याएं अनेक रूपों में होती हैं जैसे- हिंसा हत्या या आत्महत्या, बलात्कार, भ्रष्टाचार और भी अनेक ऐसे छोटे-बड़े अपराध। उनसे जुड़ी परेशनियां सामने आती रहती हैं जो कि पूरे समाज की जड़ें हिला कर रख देती हैं। कहीं न कहीं हम सब इन परेशानियों के लिए जिम्मेदार हैं। जब कोई समस्या अचानक सामने आ जाती है तब सड़क से संसद तक शो सुनाई देता है तब लगता है कि इसका निराकरण हो कर ही रहेगा। धीरे-धीरे शोर मध्यम पड़ते पड़ते शांत हो जाता है और समस्या जस की तस रह जाती है। हर समस्या के लिए नया कानून बनाने की बात के साथ पूर्णविराम लग जाता है। प्रत्येक समस्या से निपटने के लिए हर बार नए कानून की जरूरत नहीं है। समस्या के सिलसिले पर नए सिरे से सोचना जरूरी है। उसके समाधान पर ध्यान केंद्रित करना जरूरी है।

समाज को स्वस्थ करने वाली विचार प्रक्रिया थमी हुई है, न तथ्य पर आधारित तर्क दिखता है न विवेक। केवल कुरीतियां, मूढ़ताएं और भ्रामक मान्यताएं हावी होती जा रही हैं। हां इसे हम सामाजिक पिछड़ापन ही कहेंगे, जहां किसी सांप्रदायिक या भावनात्मक मुद्दों को उभार कर समाज में कुछ लोग मार-काट मचाने में सफल हो जाते हैं। हमारा समाज पहले से ही कई तरह की समस्याओं -जैसे बाल विवाह, डायन-हत्या, बाल मजदूरी, बंधुआ मजदूरी आदि से ग्रस्त है। ऐसे में नित नई-नई समस्याएं सामाजिक तनाव को और बढ़ा देती हैं।

जो समाज मनोविकार से ग्रस्त महिला का इलाज कराने के बजाय उसे डायन समझ कर पत्थर से मार देता है, उसको निरंतर जमाने और सजग करने की जरूरत है। स्थिति ऐसे बनती जा रही है, मानों नए प्रयोगों और कार्यों के लिए कोई जगह ही नहीं बन पा रही है। बात किसी एक गांव, शहर या जाति की नहीं है, यह समस्या पूरे समाज की है। समाज के तमाम हिस्से में गहरी निराशा पसर रही है, जिसका नतीजा यह हो रहा है कि हम आए दिन बच्चों, युवकों और बूढ़ों को आत्मघात करने में हो रहा है।

हमारे परिवारों में बदलाव की ऐसी लहर दौड़ी है कि आपसी सूझबूझ का दौर ही समाप्त हो गया है। लोग अपने काम में अपने आप मे सिमट कर रह गए हैं। कोई किसी के साथ रहने-जीने को तैयार ही नहीं है।इसे समय पर समझना और रोकना आवश्यक है नहीं तो यह पूरा समाज मायूसियों के बोझ तले दब जाएगा।

(वीना सिंह)