शहनाई की धुन से लोगों में प्यार और शांति भरने वाले उस्ताद बिस्मिल्लाह खां का जन्म बिहार के डुमारांव में हुआ था। पत्नी की मृत्यु के बाद प्रख्यात शहनाई वादक बिस्मिल्लाह ने शहनाई को ही अपनी बेगम की तरह चाहा और अपने काम की भगवान की तरह पूजा की। दिलचस्प बात तो यह थी कि खां की मृत्यु के समय उनके साथ उनकी शहनाई को भी जलाया गया था। उनके पिता पैगम्बर बक्श खां और माता का नाम मिट्ठन बी था।

प्रारंभिक जीवन
बिस्मिल्लाह खां अपने घर की दूसरी संतान थे। उनके बचपन का नाम कमरूद्दीन था। उनके बड़े भाई का नाम शमशुद्दीन था इसलिए उनके दादा रसूल बख्श ने कमरूद्दीन यानी बिस्मिल्लाह के जन्म पर कहा ‘बिस्मिल्लाह।’ जिसका मतलब था ‘अच्छी शुरुआत! या श्रीगणेश’। अत: घर वालों ने यही नाम रख दिया। और आगे चलकर वे अपने दादा के द्वारा दिए गए नाम से ही प्रसिद्ध हुए।

संगीत की शिक्षा
बिस्मिल्लाह खां के पूर्वज भोजपुर के राजा नक्कारखाना के संगीतज्ञ थे। उनके पिता डुमरांव के महाराजा केशव प्रसाद के दरबार में शहनाई वादक थे। खां का पूरा परिवार संगीत में लीन था। धर्म से शिया मुसलमान होने के बावजूद उन्होंने कभी धार्मिक भेदभाव नहीं किया। वह हिंदू देवी सरस्वती के भक्त थे। आमतौर पर हिंदू मंदिरों में विशेषकर वाराणसी के विश्वनाथ मंदिर में अपनी शहनाई कला का प्रदर्शन किया करते थे। खां जब छह साल के थे तब ही वह अपने नाना के घर वाराणसी में गंगा घाट के पास आकर रहने लगे। उन्होंने शहनाई वादन का प्रशिक्षण अपने मामा अली बख्स ‘विलायती’ से लिया जो वाराणासी के विश्व प्र्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर के शहनाई वादक थे।

पहली बार लाल किले से गूंजी शहनाई
देश को जिस दिन आजादी मिली उस दिन आजादी के जश्न में उस्ताद बिस्मिल्लाह की शहनाई ने ही जश्न के रंग में धुन के राग डाले थे। अब हर स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री के भाषण के बाद खां की शहनाई बजाना रस्म हो गई है। बिस्मिल्लाह तीसरे भारतीय संगीतकार थे जिन्हें भारत रत्न दिया गया। बिस्मिल्लाह पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने अकेले शहनाई को प्रसिद्धि दिलाई। 1937 में उन्होंने जब कलकत्ता में हुए अखिल भारतीय संगीत सम्मेलन में शहनाई वादन किया, तो उनकी इस कला को लोगों ने बहुत पसंद किया। बनारस में उनके घर को बिस्मिल्लाह होटल के नाम से जाना जाता था। क्योंकि ऐसा माना जाता था कि बिस्मिल्लाह के दरवाजे पर जो भी आता था वह भूखा नहीं जाता था। वहां उसे खाने के लिए कुछ न कुछ मिल ही जाता था।

फिल्मी जीवन
उस्ताद बिस्मिल्लाह का जीवन केवल शहनाई वादक तक ही सीमित नहीं था बल्कि उन्होंने कुछ फिल्मों में भी काम किया। अपनी शहनाई की तान भी कई फिल्मों में दी। उन्होंने डॉक्टर राजकुमार की फिल्म ‘सानादी अपन्ना’ में अपन्ना के चरित्र में शहनाई वादन किया। इसके अलावा सत्यजीत रे की फिल्म ‘जलसागर’ में भी उन्होंने अभिनय किया है। बिस्मिल्ला खां ने ‘गूंज उठी शहनाई’ फिल्म में शहनाई का संगीत भी दिया था। निर्देशक गौतम घोष ने बिस्मिल्लाह खां के जीवन पर आधारित एक वृतचित्र ‘संग-ए-मील से मुलाकात’ का निर्माण किया है।

पुरस्कार
बिस्मिल्लाह स्वभाव में सरल और उदार थे। वे अपने काम को भगवान की तरह पूजते थे। इतना यश मिलने के बाद भी रिक्शा में घूमा करते थे। उन्होंने ईरान, इराक, अफगानिस्तान, जापान, अमेरिका, कनाडा और रूस जैसे अलग-अलग देशों में अपनी शहनाई की धुन से लोगों का दिल जीता लिया था। भारत सरकार ने उनके काम के प्रति उनका सम्मान करते हुए उन्हें 2001 में भारत रत्न की उपाधि दी। इससे पहले भारत सरकार ने 1961 में पद्मश्री, 1968 में पद्मभूषण और 1980 में पद्मविभूषण से सम्मानित किया था। इसके अतिरिक्त संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1956), मध्यप्रदेश सरकार द्वारा तानसेन पुरस्कार और एक बार फिर 1994 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किए गए। तीन बार अखिल भारतीय संगीत सम्मेलन कोलकाता पुरस्कार और 1930 में इलाहबाद में हुए अखिल भारतीय संगीत सम्मेलन में श्रेष्ठ संगीतकार का पुरस्कार भी उन्हें दिया गया।

निधन
वाराणसी के हेरिटेज अस्पताल में दिल का दौरा पड़ने से उस्ताद बिस्मिल्लाह का निधन हुआ था।