प्रमोद दीक्षित

कभी घर और समाज में महिलाओं का गौरवपूर्ण स्थान रहा है। महिलाएं घर-परिवार की न केवल धुरी रही हैं, बल्कि समाज के विविध क्षेत्रों में अपनी सक्रियता, संवेदना और क्रियाशीलता द्वारा उपस्थिति भी दर्ज कराती रही हैं। शेष समाज द्वारा महिलाओं के प्रति आदर और कृतज्ञता व्यक्त की जाती रही है। पर वर्तमान समय में भोगवाद को बढ़ावा मिला है। नैतिकता धूल धूसरित हुई है। घर-परिवार में स्त्री के साथ न समानता और सम्मानजनक व्यवहार है और न ही अधिकार, हालांकि ऊपर से सब सामान्य दिखाई देता है। वह हिंसा का शिकार है और आवाज उठाने पर उसे मिलती है धमकी, झिड़की, डांट, उपेक्षा, उपहास, पिटाई और अपमानजनक व्यवहार। सास, ननद, ससुर, पति, पुत्र, देवर-जेठ और रिश्तेदारों द्वारा उसे प्रताड़ित किया जाता है। आज महिलाएं घर पर भी डरी, दबी और सहमी हुई दिखती हैं। पग-पग पर वे घरेलू हिंसा का शिकार हैं।

भारत के संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के अनुसार सोलह प्रतिशत विवाहित महिलाएं अपने पति की भावनात्मक हिंसा को सहन करती हैं और पंद्रह से उनचास साल की लगभग सत्तर प्रतिशत महिलाएं किसी न किसी रूप में पुरुष की हिंसा का शिकार होती हैं। यूनीसेफ की एक रिपोर्ट कहती है कि भारत में पंद्रह से उन्नीस साल की उम्र वाली सतहत्तर प्रतिशत लड़कियां न्यूनतम एक बार यौन हिंसा का शिकार हुई हैं। वहीं राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की 2012 की सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार एक हजार महिलाओं में से छियालीस घरेलू हिंसा का शिकार हैं। लेकिन यह आंकड़ा सहज स्वीकार्य नहीं हो सकता, क्योंकि जागरूकता की कमी के चलते बड़ी संख्या में महिलाएं हिंसा के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज नहीं करा पातीं। यह हिंसा केवल दैहिक नहीं है, बल्कि मानसिक, यौनिक, शाब्दिक और आर्थिक स्तर पर भी होती है। घरेलू हिंसा किसी महिला के मौलिक और मानवीय अधिकारों का हनन है। केवल भारत नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की आधी आबादी इसका दंश झेलने को विवश है। कोई भी समाज या देश घरेलू हिंसा से मुक्त नहीं कहा जा सकता। चाहे वह अति विकसित यूरोपीय, अमेरिकी देश हों या अफ्रीका और एशिया के अल्प विकसित या विकासशील देश। संयुक्त राष्ट्र के ‘महिलाओं के विरुद्ध हिंसा की समाप्ति, 1993’ घोषणापत्र में कहा गया था, ‘ऐसा कोई भी कृत्य, जो लिंग के आधार पर किया गया है और जिसका परिणाम किसी महिला को शारीरिक, लैंगिक, मानसिक क्षति पहुंचाता है या पहुंचा सकता है या किसी महिला को जिसमें ऐसे कृत्य करने की धमकी हो या जबरदस्ती उसकी स्वतंत्रता चाहे वह उसके व्यक्तिगत या सामाजिक जीवन से जुड़ी हो, को समाप्त करता है।’

मानसिक हिंसा में किसी महिला को उसके बच्चों या रिश्तेदारों के सामने लज्जित करना, कम बुद्धि या बेवकूफ बोलना, पति द्वारा तलाक या आत्महत्या की धमकी देना, परिवार में जो कुछ गलत हो रहा है उसके लिए जिम्मेदार ठहराना, घरेलू मामलों में विचार रखने की मनाही, आदि शामिल हैं। पत्नी से उसकी बिना इच्छा के शारीरिक संबंध बनाना, थप्पड़ मारना, घसीटना, लात-हाथ मारना घरेलू हिंसा के ही रूप हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे 2005-06 के अनुसार भारत में लगभग दो तिहाई विवाहित महिलाएं दैनंदिन जीवन में घरेलू हिंसा से जूझ रही हैं। हिंसा के कई कारण है। जरूरी नहीं कि हिंसा केवल पुरुष कर रहे हैं। एक पक्ष यह भी है कि महिला के प्रति महिलाओं द्वारा किए जाने वाली हिंसा का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है। वह चाहे सास-बहू के झगड़े के रूप में हो, या ननद-भौजाई की कटुता के रूप में। पद और सम्बंध के बदलने से हमारी नजर भी बदल जाती है। जो बहू अपने सास या ननद से प्रताड़ित है वही अपने मायके में भाभी की पीड़ा का कारण बनती है और मां द्वारा की जा रही हिंसा-प्रताड़ना की प्रेरक और सहायक भी। समाज में महिलाओं पर एक बहुत बारीक भावनात्मक हिंसा भी की जाती है जो मोटे तौर पर दिखाई नहीं देती। बेटे की चाह रखने वाले समाज में किसी महिला द्वारा संतान के रूप में लगातार बेटियां पैदा करने पर वह तो गाली और मार खाती ही है, लड़कियों का नाम ‘निराशा’, ‘नकुसा’ आदि रख दिया जाता है, जो जिंदगी भर उस महिला को टीसता रहता है कि वह अवांछित थी और उसने निराश किया है।

भारत ‘द इंटरनेशनल कॉनवेंट ऑन इकोनामिक्स, सोशल, कल्चरल राइट्स’ तथा ‘युनाइटेड नेशन्स कनवेंशन ऑन ऐलिमिनेशन ऑफ डिसक्रिमिनेशन अंगेस्ट वुमन’ का संधिकर्ता देश है। इन संधियों में हस्ताक्षरकर्ता देश अपने संघीय कानूनों में महिला हिंसा के विरुद्ध कानून बना कर महिलाओं को न्याय, समानता एवं स्वतंत्रता के समान अवसर उपलब्ध कराने के लिए वचनबद्ध हैं। इसी आधार पर संसद ने सितंबर 2005 में एक लंबी बहस के बाद ‘घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम-2005’ पारित किया जो 26 अक्तूबर, 2006 को लागू हो गया। इस अधिनियम में किसी महिला को शिक्षा से वंचित करने, उसके पालन-पोषण में भेदभाव करने, संपत्ति में अधिकार न देने, कन्या भ्रूण हत्या करने, अर्थोपार्जन के अवसरों को बाधित करने तथा स्वास्थ्य की अनदेखी करने पर संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध उस महिला को शिकायत करने और संरक्षण प्राप्त करने का संवैधानिक अधिकार दिया गया है। बहुत-सी महिलाओं को अपने ऊपर हो रही हिंसा से मुक्ति की राह कठिन लगती है। उसके पैरों में डाल दी गई इज्जत की बेड़ियां उसे हिंसा के विरुद्ध खड़ा ही नहीं होने देतीं। कई बार तो वह अपने बच्चों का मुंह देख कर सब सहती रहती है। सबसे ऊपर एक बात कि उसका कोई अपना घर नहीं होता। वह कहां जाए, किधर जाए, उसे कोई रास्ता नहीं सूझता। अगर वह ससुराल की हिंसा से बाहर निकल कर मां-बाप के घर जाती है तो वहां उसका बसर कब तक होगा? यह यक्ष प्रश्न उसके समक्ष मुंह बाए हमेशा खड़ा रहता है। घरेलू हिंसा से पीड़ित महिला के सामने चुनौतियों का पहाड़ होता है। यहां सोचना होगा कि घरेलू हिंसा केवल व्यक्तिगत मामला नहीं, बल्कि एक जटिल राष्ट्रीय समस्या है और इसके कारण वैश्विक मंचों पर देश की किरकिरी हो सकती है।

जरूरत है कि उसे पारिवारिक सदस्य स्वीकार करते हुए उसके साथ समता और ममतापूर्ण व्यवहार किया जाए। शिक्षा और रोजगार-विकास के समान अवसर उपलब्ध कराए जाएं। आंखों पर चढ़ा भेदभाव का चश्मा उतार फेंका जाए। बेटी और बहू में भेद का नजरिया जब बदलेगा तो महिला हिंसा भी धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगी। महिलाओं को समझना होगा कि घरेलू हिंसा का विरोध ही इसका उपचार है। महिलाओं को अपनी चुप्पी तोड़नी होगी और समाज में समानता और भेदभाव रहित व्यवहार के लिए लड़ाई लड़नी होगी, उसे मुखर होना होगा। महिला संरक्षण अधिनियम 2005 में उसे तमाम अधिकार प्रदान किए गए हैं। 1984 से पारिवारिक अदालतें काम कर रही हैं। समझना होगा कि महिला और पुरुष परस्पर पूरक हैं, न कि विरोधी। परिवार में मैत्रीभाव से रहते हुए हम हिंसामुक्त वातावरण का सृजन कर सकते हैं, जहां प्रेम होगा और विनम्रता भी। एक-दूसरे के सुख-दुख में साझी होने के मानवीय सरोकार होंगे और उन्नति के शिखर पर साथ-साथ बढ़ने का विश्वास और ऊर्जा भी।