हरियश राय
चर्चा योग्य उत्कृष्ट कहानियों के चर्चा में न होने का सवाल हिंदी का एक ज्वलंत सवाल है। कथा मासिक ‘परिकथा’ की संपादकीय में शंकर ने हिंदी की कथा आलोचना को कठघरे में रखते हुए कहा है कि ‘हिंदी की कथा आलोचना सही मायने में अधूरेपन का शिकार है।’ उनका यह भी कहना है कि ‘हिंदी आलोचना में अक्सर ही कुछ नाम उठाए और उछाले गए और कई उत्कृष्ट रचनाएं चर्चा से बाहर रहीं। अगर ऐसी रचनाओं की सूची बने, तो संभव है कि हिंदी कथा आलोचना शरमाने लग जाए।’ यह सवाल पहली बार नहीं उठा है। कई बार अलग-अलग संदर्भों में उठाया गया है। सवाल है कि यह चिंता फिर से क्यों जताई जाने लगी है। शायद कहानी के चयन का कोई प्रतिमान और कथा आलोचना की कोई विवेकपूर्ण परंपरा न होने के कारण यह सवाल उठा होगा।
दरअसल, हिंदी कथा आलोचना में नामवर सिंह, देवीशंकर अवस्थी, विश्वनाथ त्रिपाठी, सुरेंद्र चौधरी, धनंजय वर्मा, मधुरेश, मार्कंडेय, विजयमोहन सिंह, खगेंद्र ठाकुर, रमेश उपाध्याय ने इस दिशा में काफी काम किया और उनके इस काम से कहानी समीक्षा की आधार भूमि भी तैयार हुई। इससे कथा समीक्षा के क्षेत्र में एक वैचारिक बहस की शुरुआत भी हुई थी। इन सबके बावजूद यह सवाल उठता रहा है।
इस सवाल पर विचार करने के लिए आज के समय से थोड़ा पीछे जाकर कहानी समीक्षा की पड़ताल करनी पड़ेगी और यह जानना तथा समझना होगा कि उत्कृष्ट रचनाएं कथा समीक्षा से बाहर क्यों और कैसे रह गर्इं। दरअसल, कथाकार अपने समय के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिवेश से निरंतर रूबरू होता रहता है और उसी परिवेश में संवेदनात्मक और वैचारिक स्तर पर अपनी कहानियों के कथानक चुनता और बुनता है। अस्सी के बाद के कथाकारों ने अपने-अपने ढंग से अपने सामाजिक परिवेश को देखा और सामाजिक परिवेश के दबावों को अपनी कथाओं में व्यक्त किया। कथाकारों ने अपने जमाने की पेचीदगियों, हकीकतों और तकाजों को मानवीय और विवेकपरक दृष्टि से कहानी के केंद्र में रखा। अस्सी के दशक के बाद कहानी के कथ्य और शिल्प के क्षेत्र में विविधता और संपन्नता देखने को मिली। कथाकारों ने अपनी रचनात्मकता से पहले लिखी जा रही कहानी के क्षेत्र को लांघ कर नई रचना भूमि विकसित की। इस दौरान अनेक बेहतरीन कहानियां लिखी गर्इं, जिनमें अपने समय का परिवेश समग्रता से रेखांकित हुआ है। मगर न जाने किन कारणों से कई महत्त्वपूर्ण कहानियां आलोचकों की नजरों से नहीं गुजर सकीं। दरअसल, हुआ यह कि आलोचकों ने कुछ कथाकारों और कुछ कहानियों का चुनाव कर बार-बार उन्हें ही अपनी आलोचना के केंद्र में रखा, जिससे बेहतर लिखने वाले कई कथाकार या तो हाशिए पर चले गए या परिदृश्य से ही गायब हो गए। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो कहानी के क्षेत्र में कोई गंभीर बहस या विचार-विमर्श नहीं हुआ।
भूमंडलीकरण से निर्मित परिवेश और उस परिवेश से निकल कर आए अनेक संदर्भों और घटनाओं को लेकर हिंदी कथाकार काफी सजग दिखाई देते हैं। सांप्रदायिकता और धार्मिक कठमुल्लेपन को लेकर कई कहानियां लिखी गर्इं। भूमंडलीकरण के बाद की जिंदगी बेहद आक्रामक हो गई थी और कथाकारों ने आक्रामक जिंदगी से मुठभेड़ करती हुई कहानियां लिखीं। इस दौर में मानवीय मूल्यों के पक्ष में अनेक कहानियां लिखी गर्इं। भूमंडलीकरण के इस दौर में जो अपसंस्कृति पनपी और उससे जो मूल्यहीनता सामने आई, कथाकारों ने समग्रता से इस दौर को कथा में दर्ज किया। कथा-जगत में कई लेखिकाओं ने अपनी महत्त्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज की है। स्त्री विमर्श और दलित विमर्श के अनेक मुद्दों को कहानियों के केंद्र में रखा गया। इन कहानियां में ऐसे चरित्र हैं, जो अपने परिवेश से निरंतर टकराते और जीवन में बदलाव लाने के लिए आतुर हैं। अस्सी के बाद के कथाकारों ने जीवन संघर्षों से जुड़े प्रमुख मसलों को अपनी कथा के केंद्र में रखा। साथ ही ग्रामीण जीवन में आए बदलावों और शोषण मूलक सामाजिक संबंधों को अपनी कथाओं में रेखांकित किया। इस दौर में विविधता के साथ नए-नए कथा प्रयोग हो रहे हैं।
कथा आलोचना की जो दृष्टि विकसित हुई, कुछ अपवादों को छोड़ कर वह दृष्टि पश्चिमी देशों के साहित्य से उठाए गए सूत्रों पर आधारित रही, जिसके कारण आलोचकों ने प्रगतिशील और मानववादी आलोचना के प्रति कभी मौन, तो कभी विरोध का रवैया भी अपनाया। कहानी को सम्रगता में न देख कर एक दस्तावेज या वक्तव्य के रूप में भी देखा गया। कथा आलोचना ने विचारधारा और उसके संघर्ष के प्रगतिशील रूपों की उपेक्षा कर कुछ ‘व्यक्तित्वों’ को पेश किया। इस दृष्टि के कारण ही आलोचकों ने अपने-अपने कथा नायक बना लिए और उन कथा नायकों का प्रचार और प्रसार इस तरह किया कि उनकी आड़ में कई बेहतरीन कहानियां या तो छूट गर्इं या उन पर उतना ध्यान केंद्रित नहीं किया, जितना किया जाना चाहिए था। इस प्रवृति के कारण अपने समय के कई विशिष्ट और महत्त्वपूर्ण कथाकार अनचाहे ही ओझल हो गए। कुछ कथा आलोचकों का मानना है कि ऐसी कहानियां लिखी ही नहीं जा रहीं, जो उन्हें लिखने को बाध्य कर सकें और जो कहानियां लिखी जा रही हैं वे उन्हें आकृष्ट कर पाने में सफल नहीं हो रही हैं। कहानी के इस परिवेश में ऐसा कोई आलोचनात्मक हस्तेक्षप नहीं हुआ, जो कथा के रचनात्मक परिदृश्य को समग्रता से सामने लाकर कहानी के प्रतिमानों को रेखांकित कर सके। आज जरूरत लिखी जा रही कहानियों के आधार पर प्रतिमान बनाने और नए कथा विमर्श की है। साथ ही जरूरत कहानी के क्षेत्र में जो आलोचनात्मक कुहासा छाया हुआ है, उसे दूर करने की भी है
अस्सी के दशक के बाद हिंदी कथा आलोचना बहुत धीमी गति से आगे चली और आलोचकों और संपादकों ने अपने चयन और अपने प्राथमिकता के आधार पर कुछ कहानीकारों के नाम सामने रखे और बाकी के आलोचकों ने भी उन्हीं नामों का ढोल पीटा। कुछ आलोचक तो बहुत फख्र से कहते हैं कि मैं कहानियां नहीं पढ़ता या मुझे आज के दौर की लिखी जा रही कहानियों में ऐसा कुछ नहीं दिखाई देता कि मैं उस पर कुछ लिखूं। यह एक चिंतनीय स्थिति है। विश्वनाथ त्रिपाठी की दो किताबें- ‘कुछ कहानियां कुछ विचार’ और ‘कहानी के साथ’- कथा आलोचना के क्षेत्र में नई राह दिखाती हैं। साथ ही पिछले कुछ समय में जानकी प्रसाद शर्मा, खगेंद्र ठाकुर, कर्मेंदु शिशिर, अरुण प्रकाश, शशांक, संजीव कुमार, सूरज पालीवाल, शंभु गुप्त, अरुण कुमार और ज्योतिष जोशी की कहानियों से संबंधित किताबें आर्इं। इन किताबों में अपने समय के कहानी संकलनों पर लेख हैं, जो व्यक्ति विशेष कथाकारों का मूल्यांकन करते हैं। ये किताबें कथा आलोचना की कमी को कुछ हद तक पूरा करती हैं और इनसे कथा आलोचना की एक राह तो निकलती दिखाई देती है, लेकिन इस क्षेत्र में एक मुकम्मल काम होना अभी बाकी है। पर यह बात दावे से कही जा सकती है कि यह चिंता वाजिब है।

