डॉ. वरुण वीर

जीवन में तपस्या मनुष्य की सहनशक्ति का अद्भुत विकास करती है। तपस्वी का जीवन न केवल उसके लिए लाभकारी, बल्कि समाज को भी प्रेरणा देने वाला होता है। तपस्या का फल अनेक स्तरों पर अनेक प्रकार से मिलता है। धैर्य, संतोष तथा सरल जीवन तपस्वी को तपस्या करने में अधिक सहायक होते हैं। तपस्या का केवल यह अर्थ नहीं है कि शरीर को तपाया जाए, अनेक प्रकार से कष्ट दिए जाएं, बल्कि शरीर, मन, वचन तथा कर्म अनेक स्तरों पर तपस्या की जा सकती है। सभी का फल भी अलग-अलग स्तरों पर मिलता है। गीता में कृष्ण ने तपस्या को तीन भागों में बांटा है- शरीर, वचन तथा मन।

देवद्विजगुरु प्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम ।
ब्रहचर्यामहिंसा च शरीरं तप उच्यते ।
राष्ट्र सेवा में राष्ट्र द्वारा नियुक्त देवपुरुष अर्थात देश की रक्षा करने वाले सिपाही, पुलिस, सुरक्षाकर्मी आदि देश और समाज की व्यवस्था को बनाए रखते हैं। अगर सुरक्षाकर्मी नहीं होंगे, तो समाज में अराजकता, अनुशासनहीनता होने से हिंसा को बढ़ावा मिलेगा और समाज की सभी व्यवस्थाएं चरमरा जाएंगी। अगर देश की सुरक्षा के लिए सीमा पर जवान नहीं होगा तो शत्रु आपके घर के भीतर घुस कर आपको भयभीत करेगा। जो लोग ब्राह्मण, गुरु और विद्वानों की सेवा करते हैं उनके भोजन, रहन-सहन का सम्मान करते हैं तथा शरीर को स्वच्छ और स्वस्थ बना कर रखते हैं, अपने व्यवहार में सरलता रखते हुए विनम्रता पूर्वक सभी से व्यवहार करते हैं और जो व्यक्ति ब्रह्मचर्य का पालन करता है, शरीर से हिंसा नहीं करता है। ये सब शारीरिक तप की श्रेणी में आते हैं।

ब्रह्मचर्य की रक्षा करना अत्यंत कठोर तपस्या है। सभी तपस्याएं इसके नीचे की श्रेणी में आती हैं। महर्षि पतंजलि ने योग दर्शन में ब्रह्मचर्य का स्पष्ट लाभ बताया है- ‘ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठां वीर्य लाभ:’। ब्रह्मचर्य का पालन करने से वीर्य की वृद्धि तथा रक्षा होती है। यही शरीर तथा मस्तिष्क की शक्ति का आधार है। शरीर की मुख्य और मूल शक्ति है। पांचों इंद्रियों से संबंधित तपस्या करना कठिन है। जो इन इंद्रियों को वश में कर लेता है वह राजा हो जाता है और जो इन इंद्रियों के वशीभूत बना रहता है, वह गुलाम हो जाता है। एक बार मन को कठोर करने से इंद्रियों की गुलामी से छूट सकता है। लेकिन ब्रह्मचर्य का पालन करना सबसे कठिन है। जो ब्रह्मचर्य पर विजय पा लेता है वह भीष्म पितामह और दयानंद सरस्वती की तरह बलशाली हो जाता है।

हिंसा का त्याग कर अपने जीवन को सुख पूर्वक व्यतीत करना चाहिए। आज भारत के शहरों में हिंसा का बोलबाला है। लोग छोटी-छोटी बातों पर हत्याएं तक कर रहे हैं। दूसरों के जीवन को नष्ट कर अपने जीवन को भी बर्बाद कर लेते हैं। शरीर से हिंसा न करना भी बड़ा तप है। हिंसा का मुख्य कारण उचित नैतिक शिक्षा का अभाव तथा पाश्चात्य जीवन-शैली में केवल भोग का स्थान प्रमुख होना है। इस भोगवादी जीवन-शैली ने समूचे विश्व में लालच को जन्म दिया है। यह लालच ही है, जो भौतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए हिंसा को जन्म देता है और जब कभी इच्छाएं पूरी नहीं हो पाती हैं, तब व्यक्ति व्याकुल होकर हिंसा करने लगता है, इसलिए हिंसा का त्याग कर परम आवश्यक है। इससे केवल अपना नहीं, दूसरों का भी लाभ होता है।

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहित च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाड्मयं तप उच्यते॥
ऐसा बोलना, जिससे किसी को कष्ट न हो। भाषा में मधुरता और विनम्रता पूर्वक बात करना। अक्सर हम देखते हैं लोग बात-बात में गाली का प्रयोग करते हैं और नकारात्मक व्यंग (टोंट) करते हैं। बातों में अपने को बड़ा बताना तथा दूसरों को छोटा दिखाना यह अच्छी बात नहीं है। जैसा व्यवहार हम दूसरों से अपने प्रति चाहते हैं वैसा ही व्यवहार हमें भी दूसरों के प्रति करना चाहिए। अगर कोई हमसे ऐसी वाणी का प्रयोग करे, जिससे कि हमें बुरा लगे तो उसे भी हमारी वाणी का बुरा लग सकता है, इसलिए हमेशा ध्यान से, सोच-समझ कर बोलना चाहिए। हमारी संस्कृति में ध्यान का महत्त्वपूर्ण स्थान है। बचपन से हमें माता-पिता कहते हैं कि ध्यान से बोलो, ध्यान से चलो, ध्यान से पढ़ो आदि। ध्यान से बोलने का अर्थ है कि नपा-तुला बोलना और मीठा बोलना। साथ ही शब्दों की प्रमाणिकता भी होनी आवश्यक है। सत्य बोलना, सुंदर तरीके से बोलना। यह वाचिक तप कहलाता है।

सदा सत्य बोलना उच्च कोटि में आता है। कहते हैं, जीवन पूरी तरह सत्य पर आधारित होकर नहीं चल सकता। यह बात ठीक नहीं है। हां, यह जरूरी है कि जीवन में व्यवहार कुशल तथा वाकचतुर होना चाहिए, लेकिन यह कहना कि बिना झूठ के जीवन नहीं चलता, यह ठीक नहीं है। कर्मफल का सिद्धांत है- जो जैसा कर्म करता है उसे उसका फल भोगना ही पड़ता है। इसलिए जीवन को सरलता, विनम्रता तथा बुद्धिमत्ता पूर्वक चलाने से असत्य से बचा जा सकता है। सत्य के साथ प्रिय और हितकर भी होना चाहिए। समाज में रहने वाले मनुष्य को दूसरों के प्रति प्रिय और हितकर बोलना चाहिए। परिवार के सदस्यों के प्रति तो हम हितकर बोलते हैं। कोई अपना गलत कर रहा होता है या फिर किसी विषय को लेकर समझ नहीं होती कि उसे क्या करना चाहिए तब हम बिना पूछे उसे उसके हित की बात बता देते हैं। ऐसा बोलते हैं जो उसके लिए हितकारी होता है। यह नियम केवल अपने लोगों के लिए नहीं होना चाहिए। अगर कोई अनजान व्यक्ति भी है और उसके हित की बात है, तब बिना उसके पूछे हमें बता देना चाहिए। यह मानवता का श्रेष्ठ गुण है। किसी को बुरा न बोलना तथा सदैव हितकर बोलना भी वाणी का तप है।
स्वाध्याय का अभ्यास भी वाणी की तपस्या में आता है। उच्च स्वर में आध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए। प्रतिदिन सोने से पहले या जब भी समय मिले किसी न किसी पुस्तक का अध्ययन करना चाहिए। साथ ही शांत भाव में बैठ कर स्वयं का अध्ययन करना भी स्वाध्याय है। मधुर, सत्य, प्रिय, हितकर आदि वाचिक तप कहलाते हैं।

मन: प्रसाद: सौम्यत्वं मौनमात्म विनिग्रह: ।
भावसंशुद्धि रित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥
मन सदा प्रसन्न रखना चाहिए। जीवन में उतार-चढ़ाव बहुत आते हैं। सभी परिस्थितियों में मन को प्रसन्न रखना बड़ा ही कठिन कार्य है। आज भौतिकवादी जीवन में मन संतुष्ट नहीं रहता है। जीवन जितना प्रकृति के निकट और संतोषी होगा, मन उतना ही प्रसन्न होगा। लोकेषणा, वितेषणा, पुत्रेषणा जीवन के आनंद को समाप्त कर देती हैं। तीनों तृष्णाएं व्यक्ति के मूल आनंद से वंचित कर देती हैं और मनुष्य समझता है कि इसी में सुख है, लेकिन जब थोड़ा भी कष्ट आता है तब वह दुखी हो जाता है और शीघ्र ही मन तनाव में चला जाता है। इसलिए कर्म ऐसा हो, जिससे मन प्रसन्न रहे, मन में मधुर भाव रहे, किसी के प्रति घृणा, द्वेष न रखना तथा व्यर्थ न बोलना, मौन रह कर मन को शांत तथा एकांत रखते हुए शून्य की ओर लाना भी मन का तप है। मन में शुद्ध और सात्विक भावना रखते हुए सब कार्य करना मानसिक तप कहलाता है। शारीरिक तथा मानसिक तपस्या मनुष्य का सर्वांगीण विकास करती है। समाज में उसे दिव्य बनाती है। व्यक्ति को तुनकमिजाज नहीं होना चाहिए। सभी स्थितियों में अपने जीवन को चलाने की योग्यता होनी चाहिए। तपस्या से जीवन में धैर्य तथा संघर्ष करने की अद्भुत शक्ति आती है और जीवन का मूल आध्यात्मिक आनंद प्राप्त होता है।