यह एक छोटा-सा गांव है नरहरपुर। कहने को तो यह गांव ही है। गांव के सभी चिह्न भी यहां मौजूद हैं। जैसे गांव के पश्चिम दिशा में दस-बारह फर्लांग की दूरी पर गांव का बड़ा पोखर, गांव के मध्य मंदिर और मंदिर के प्रागंण में बार्इं ओर छोटा-सा ताल और गांव के चारों ओर दूर-दूर तक खेत-खलिहान, बाग-बगीचों का फैलाव है। इन चिह्नों के साथ नरहरपुर पूरी तरह से एक गांव है। पर न जाने कब और कैसे शहर की विषैली हवा इस गांव तक आ पहुंची? हरे-भरे खेतों के बीच में अब सीमेंट के पक्के मकान बनने लगे हैं। पांचवीं कक्षा तक के सरकारी विद्यालय के अतिरिक्त आगे की कक्षाओं की पढ़ाई के लिए कोई सरकारी स्कूल भले न हो, पर बिजली के तार और टीवी के केबल पूरे गांव में लग गए हैं। जो बच्चे आगे पढ़ना चाहते हैं, वे गांव के प्राइवेट विद्यालयों में पढ़ते हैं। पांचवी कक्षा से आगे सरकारी विद्याालय न होने के कारण गांव में इन विद्यालयों का धंधा चोखा होने लगा है।
यही कोई सात-आठ माह हुए हैं सुदर्शना को इस गांव में ब्याह कर आए हुए। नरहरपुर में काफी बदलाव आ गया है। एक दूसरे से होड़ और प्रतिस्पर्धा की भावना गांव बढ़ती जा रही है। सुदर्शना की ससुराल यहां के खाते-पीते परिवारों में है। घर में सास-ससुर, पति के अलावा देवर और ब्याहने योग्य दो ननदें हैं। खेती-बाड़ी के अलावा बाईक और ट्रैक्टर भी हैं। सुदर्शना के माता-पिता ने उसका ब्याह समृद्ध परिवार देख कर किया है। सुदर्शना का मायका यहां से लगभग चौदह कोस दूर जोखनपुर गांव में हैं। विवाह के बाद पहली बार उसका मरद छोटेलाल उसे ट्रैक्टर से लेकर मायके गया था। आधे घंटे के भीतर वह अपने पीहर पहुंच गई थी। बड़ी खुश थी वह अपने मरद के साथ पहली बार ट्रैक्टर से माई-बाबू के घर जाकर। उसके बाबू छोटे किसान हैं।
थोड़ा-सा खेत, एक कच्चा घर, दरवाजे पर बंधी दो गाएं… बस यही है उसके पिता हरक की संपत्ति। पर वे खुश हैं कि है कि अपनी बेटी सुदर्शना का विवाह उन्होंने खाते-पीते घर में किया है। सुदर्शना को ट्रैक्टर से घर आया देख कर उसके माई-बाबू, छोटे भाई-बहन सभी खूब प्रसन्न हो गए थे। खुश क्यों न हों भला? दरवाजे पर ट्रैक्टर होना गांवों में संपन्नता की निशानी मानी जाती है। सुदर्शना की माई ने हैसियत भर अपने दामाद छोटेलाल का स्वागत-सत्कार किया। दोपहर के भोजन में स्वादिष्ट पकवान बनाए, जो सुदर्शना के यहां कभी-कभार तीज-त्योहार पर ही बनाए जाते हैं। भोजन करने के बाद शाम को छोटेलाल ट्रैक्टर लेकर चला गया।
दस दिन हो गए थे सुदर्शना को पीहर आए। एक दिन छोटेलाल आया और सुदर्शना को विदा करा कर ले गया।
दूसरी बार वह सावन में मां के घर आई। इस बार भी उसका मरद छोटेलाल उसे ट्रैक्टर से छोड़ गया। माई-बाबू के पूछने पर उसने बता दिया कि ससुराल में सभी उससे खुश हैं। हफ्ते-दस दिन बाद छोटेलाल आया और उसे विदा करा कर ले गया। माई-बाबू ने विदाई में उसे अपनी हैसियत के अनुसार सामान देकर विदा किया।
‘घर से कुछ रुपए पैसे लाई कि इस बार भी ऐसे ही चली आई।’ रसोई के काम खत्म कर सुदर्शना आंगन में बैठ कर बर्तन मांज रही थी कि पीछे से उसकी सास के स्वर उसके कानों में पड़े। वह सास से पूछ बैठी, ‘क्या हुआ माता जी?’ ‘हुआ क्या…? क्या तू नहीं जानती…? पहली बार आई-गई, किसी ने कुछ न कहा। इस बार भी बिना नगदी लिए चली आई। तुम्हारे माई-बाप तो ब्याह में एक बार खर्च कर के छुट्टी पा गए, और हमारे सर पर तुम्हें बैठा दिया।’ यह सब सुन कर सुदर्शना को रोना आ रहा था।
‘तुम्हें नहीं तो तुम्हारे मां-बाप को तो पता है कि दुआर पर चार चीजें हैं, जिनमें पैसा लगा है। उन चीजों से गांव में इज्जत है, रुतबा है। तुमहू जिस ट्रैक्टर पर चढ़ कर बप्पा के घर गई रहो, वो बैंक से कर्जा लेकर लिया है, जिसका महीने-महीने पैसा जाता है। इज्जत तो तुम्हारे बाप की भी गांव में बढ़ी थी। उसका भी फर्ज था कि कुछ नहीं तो ट्रैक्टर के ही पैसे दे।’ सुदर्शना चुप। एक शब्द भी जबान से नहीं निकल पा रहा था। पर मन ही मन कांप रही थी। उसने किसी प्रकार अपनी रुलाई रोक रखी थी। खरी-खोटी सुना कर उसकी सास बाहर दालान में चली गई, जहां सुदर्शना का पति, देवर, ननदें और ससुर इकट्ठा बैठे थे।
अब आए दिन ही नहीं, बल्कि दोनों पहर यही होने लगा। सास, ननदें तो डांटती ही रहती थीं, अब देवर और उसका पति छोटेलाल भी सुदर्शना को अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। सुदर्शना दिन-रात रोती रहती। कभी-कभी सोचती कि क्या ऐसे ही उम्र कट जाएगी अपमान और जिल्लत सहते-सहते? अगर किसी प्रकार यह बात माई बाबू तक पहुंची भी तो वे कहां से दहेज लोभियों की मांग पूरी करेंगे? उसकी दो अन्य बहनें भी हैं। बाबू खेत बेच देंगे तो खाएंगे क्या? पूरा परिवार भूखा मरेगा, क्योंकि बाबू के पास जो कुछ भी है वह एक विस्वा खेत ही है। इससे ही पूरे परिवार का पेट भरता है। सुदर्शना बाबू के पास पैसे मांगने कभी नहीं जाएगी।
उस दिन सुदर्शना को रात भर नींद नहीं आई, जब उसकी सास ने उससे कहा कि अपने बाप के घर जाकर पचास हजार रुपए लाओ, नहीं तो हम छोटेलाल का दूसरा ब्याह कर देंगे। और तो और उसके ससुर बृजलाल भी अपनी पत्नी की हां में हां मिलाने के लिए सामने खड़े थे। दहेज का लोभ सुदर्शना के ससुराल वालों के मन में समा चुका था। उनके नेत्रों पर लोभ का आवरण इस प्रकार छा गया था कि उन्हें यह भी भान न था कि उनकी भी दो बेटियां हैं। अगर उन्हें भी इसी प्रकार लोभी ससुराल मिली तो वे क्या करेंगे, उनकी दहेज की मांग कब तक पूरी करते रहेंगे?
अपमान और जिल्लत सहन कर-कर के सुदर्शना के दिन रात व्यतीत होते जा रहे थे। उसके ब्याह को एक वर्ष होने को है। सुदर्शना ने निश्चय कर लिया है कि वह अपने बाबू से दहेज के पैसे कभी नही मांगेगी, बल्कि वह कोई काम करेगी और आत्मनिर्भर बनेगी। उसने सुना है कि गांव में एक मैडम आती हैं। वह गांव की औरतों को सिलाई सिखाती हैं। उनके सिले कपड़े शहर में ले जाकर बेचती हैं। गांव की अनपढ़ औरतें काम सीख कर कुछ पैसे कमा रही हैं, जो उनकी घर गृहस्थी, बच्चों की शिक्षा में काम आ रहा है।
एक दिन सुदर्शना सिलाई सिखाने वाली उस मैडम से मिली और काम सीखने की इच्छा प्रकट की। उन्होेंने सुदर्शना को सीखने के लिए आने को कहा। विदाई में माई के दिए नए कपड़े लेकर सुदर्शना दूसरे दिन से सिलाई केंद्र जाने लगी। सिलाई केंद्र जाने से पहले वह घर में सबके लिए खाना बना कर, चौका-बर्तन कर के रख देती। सिलाई सीखने में सुदर्शना का खूब मन लग रहा था। सिलाई सिखाने वाली मैडम उसके काम से बहुत खुश थीं। सप्ताह भर हुआ था सुदर्शना को काम पर जाते हुए। एक दिन वह सिलाई केंद्र से लौटी ही थी कि उसका देवर उसकी पीठ पर लात-घूसे बरसाने लगा। कह रहा था- ‘तेरी इस कमाई से ट्रैक्टर के पैसे जमा होंगे’। उसका पति छोटेलाल दालान में बैठा था। सुदर्शना गालियां और मार खाती रही, पर वो कुछ नहीं बोला। अपनी कोठरी में जाकर सुदर्शना फूट-फूट कर रोई। आंचल से अपने आंसुओं को पोंछा, खुद को समझाया और मन ही मन कुछ निश्चय किया और शांत हो गई।
सुदर्शना के गांव में पड़ोस में रहने वाले पटवारी काका के घर अखबार आता था। सुदर्शना प्रतिदिन उनसे मांग कर अखबार पढ़ती थी। उसमें ही पढ़ा था कि दहेज लेना कानूनन अपराध है। दहेज के लिए बहुओं के साथ मारपीट, गाली-गलौज, बदसलूकी आदि ससुराल वाले नहीं कर सकते। यह भी कि दहेज के लिए कोई पति अपनी पत्नी को नहीं छोड़ सकता। अगर छोड़ता है तो उसे आजीवन पत्नी के भरण-पोषण का खर्च देना होगा।
आज सुदर्शना रोज की तरह घर के सारे काम करने के बाद सिलाई केंद्र के लिए निकली थी कि घर के बाहर सड़क पर उसका देवर न जाने कहां से आया और उसे मारने लगा। वह देवर की मार से बचने का प्रयत्न कर ही रही कि उसकी सास भी देवर के साथ मिल कर उसको बुरी तरह मारने लगी। ‘तेरे से हम सब कहिन रहैं कि अपने बाप के घर से पचास हजार रुपए लेकर आ। वो तो तुमसे हुआ नहीं। अब हमारे खानदान में तू कमाने वाली निकली है।’
पूरे गांव के सामने पिटती सुदर्शना लाज से पानी-पानी हो रही थी। पिटाई से बचने के लिए वह अपनी सास और देवर का हाथ पकड़ने का प्रयत्न कर ही रही थी कि उसका ससुर ब्रजमोहन डंडा लेकर चला आया। डंडे की मार से सुदर्शना गिर पड़ी। सुदर्शना को वहीं छोड़ कर सभी घर चले गए। इतने में सुदर्शना का पति छोटेलाल आया, वह भी गिरी-पड़ी सुदर्शना को लात-घूसों से मारने लगा। सुदर्शना मार खाती रही और पीड़ा से चिल्ला-चिल्ला कर आपने माई-बाप को पुकारती रही। पूरा गांव चारों ओर खड़ा होकर तमाशा देखता रहा था, पर किसी ने भी उन्हें रोकने का साहस न किया। सबके चले जाने के बाद सुदर्शना उठी और अपनी कोठरी में जाकर रोने लगी। पूरा बदन छिल गया था। डंडे की चोटों के निशान से पीठ और कलाइयां भर गई थीं।
सहसा सुदर्शना ने एक साहसिक निर्णय किया, जो उसकी ससुराल वालों की सोच से परे था। उसने एक कागज पर थानेदार के नाम अर्जी लिखी, जिसमें उसने ससुराल वालों पर दहेज के लिए प्रताड़ित करने, मार-पीट कर घर से निकाल देने और अपनी सुरक्षा के लिए गुहार लगाते हुए सास-ससुर, देवर रोशनलाल और पति को नामजद किया। दोनों ननदों के नाम उसने छोड़ दिए, यह सोच कर कि ये लड़कियां हैं। ब्याह कर एक दिन इन्हें ससुराल जाना होगा। ससुराल में जीने और गुजर-बसर के मार्ग इतने सरल नहीं होते। टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों से गुजरना पड़ता है।
अर्जी लेकर सुदर्शना घर से निकली। डेढ़ कोस पैदल चल कर दूसरे गांव में बनी एकमात्र पुलिस चौकी पर जा पहुंची। दारोगा को उसने अर्जी दी। दारोगा को उसने बाहों पर पड़े डंडे के नीले निशान भी दिखाए। दारोगा ने उसकी रपट लिखी और सब कुछ ठीक करने का आश्वासन देते हुए उसे घर जाने को कहा। घर आकर सुदर्शना कोठरी में लेट गई। दिन का तीसरा पहर ढल रहा था। शाम होते-होते दारोगा साहब दरवाजे पर आ गए। उस समय सभी घर में थे। उन्होंने कड़कती आवाज में ससुर बृजलाल, देवर रोशनलाल, सास सवितरा और उसके पति को बुलाया। उन्हें कानून की भाषा में समझाया कि तुम लोगों पर दहेज के लिए बहू का उत्पीड़न, मारपीट, उस पर जानलेवा हमला करने और दहेज के लिए घर से बाहर निकालने का आरोप साबित हो गया है। तुम लोगों के विरुद्ध रपट लिख ली गई है। अब तुम सबको जेल जाना पड़ेगा।
सुदर्शना ने देखा कि दारोगा की बात सुनते ही उसे सड़क पर डंडे से पीटने वाला व्यक्ति बृजलाल थर-थर कांप रहा था। ‘माई-बाप, हुजूर… क्षिमा कर दीजिए। दुबारा ऐसी गलती न होगी’ कहते हुए बृजलाल दारोगा के पैरों पर गिर पड़ा। ‘हमें क्षिमा कर दो साब!’ गिड़गिड़ाते हुए सुदर्शना की सास ने कहा। सुदर्शना को गालियां देने वाले छोटेलाल व रोशनलाल की तो जैसे बोलती ही बंद हो गई थी। सब हाथ जोड़े गिड़गिड़ा रहे थे। वे सुदर्शना से भी गिड़गिड़ाते हुए क्षमा मांग रहे थे।
गांव के लोग सुदर्शना की प्रशंसा कर रहे थे। वे सभी बृजलाल की दबंगई और लालची स्वभाव से परिचित थे। सुदर्शना ने दारोगा से विनती की कि इस बार वे इन सबको क्षमा कर दें। दारोगा ने उनसे शपथ-पत्र लिखवाया कि अगर दुबारा वे ऐसी गलती करेंगे तो उन्हें जेल में डाला जाएगा। गांव वाले आपस में बातें कर रहे थे कि छोटेलाल की बीवी बहुत पढ़ी-लिखी है। सुदर्शन सोच रही थी कि अगर उसे आगे और पढ़ने के अवसर मिलते, तो जीवन की राहें और सुगम हो जातीं। ०

