अमरेंद्र मिश्र
एक डरावने ख्वाब के साथ नींद खुल गई थी। अचकचा कर टेबल घड़ी की ओर देखा- तीन बज रहे थे। मुझे जरा अचरज हुआ कि रात को कैसे मैं बत्ती गुल करना भूल गया! मैं उठ कर बैठ गया और महसूस करता रहा कि कल पूरे दिन की थकान शायद अभी उतरी नहीं है। मन भारी-भारी-सा था और शरीर सुस्त। मैं फिर से सो जाना चाहता था, लेकिन फिर से सो जाने का कोई औचित्य अब रह नहीं गया था। लेकिन इस समय जबकि तीन बज रहे हैं, अब से सुबह तक क्या किया जाए। मैंने अपनी आंखें बंद कर ली और सोचता रहा कि क्या पता फिर नींद आ जाए! पर मेरी कोशिश व्यर्थ गई। चारों ओर सन्नाटा था और शांति बिछी हुई थी। ऐसे में अगर कुछ सुनाई पड़ती थी तो सिर्फ कुत्तों के भौंकने की आवाजें- एक आवाज के समानांतर दूसरी आवाज का सवाल-जवाब।
मैंने अपनी आंखें बंद कर ली और इंतजार करता रहा कि क्या पता कहीं से पुरवाई का हल्का झोंका आ जाए और नींद की खुमारी छा जाए। पर मन पर पिछली रात का एक बोझिल सफर था। मेरे मानस पर पिछली रात का भयानक ख्वाब जैसे चिपक गया था। मेरी आंखें फिर खुल गईं और शून्य में टंग गईं, जो निशब्द था। इस मन:स्थिति के बीच भी उस शून्य में मैंने कोई हसीन ख्वाब तलाशने की कोशिश की, तो वहां से जैसे गोल-गोल अंगारे बरसने लगे थे और सबके सब मेरे शरीर पर गिर रहे थे। मैं फिर उठ बैठा। अपनी ही देह को हिलाता-डुलाता रहा, पर सब कुछ ठीक-ठाक ही तो था! लेकिन इस बीच अचानक ऐसा लगा, मानो मेरी देह भारी हो गई है, हिल-डुल नहीं रही है। मैंने अपनी गर्दन घुमाई, पर वह सीधा तन गई थी। मेरी आंखें उसी तरह शून्य में टंगी थीं, जहां किसी हसीन ख्वाब की जगह कई-कई लाल अंगारे लगातार बरस रहे थे।
मैं रात के उस ख्वाब के विषय में फिर से सोचने लगा। वह कुछ ऐसा था मानो मैं समुद्र किनारे मीलों घूमते-घूमते एक निर्दिष्ट जगह पर खड़ा कॉफी ले रहा था। वहां कई सैलानी हैं। दूरदराज से आए हजारों सैलानी। वे सबके सब अपरिचित हैं मेरे लिए। उन्हें देख कर भला किस तरह की आश्वस्ति मिल रही थी मुझे! उन्हें देख-देख कर मैं बोर हो रहा हूं, क्योंकि सागर-तट पर उन सैलानियों के बीच न तो सुरक्षित हूं, न प्रसन्न। मैं सिर्फ तटस्थ हूं, कहीं दूर खड़ा उनके बीच हूं या फिर उस भीड़ में होता हुआ भी उसमें शामिल नहीं हूं।
मॉरीशस का यह बेहद आकर्षक समुद्र तट है, जिसे स्थानीय लोग ‘ग्रांब वे’ कहते हैं। मैं देखता हूं कि सैलानी किस तरह की मस्ती कर रहे हैं। अपने आप में सब मस्त हैं। एक एंग्लो इंडियन युवती रेत पर औंधे मुंह लेटी है- बिलकुल निश्चेष्ट, मदहोश, बेहोश और अर्धनग्न। एक भारतीय जोड़ा दिख जाता है। उनकी नई-नई शादी हुई है। दोनों की उम्र कोई बीस-बाईस के आसपास होगी। इस माहौल में, जबकि दूर-दूर तक रौरव नाद करती समुद्र की लहरें हैं, हजारों अपरिचित चेहरे हैं, और है एक खूबसूरत दिन! लड़का लड़की से एकदम उन्मुक्त होने की जिद करता है। लड़की ‘ना’ कहती है। लड़का कसम दे रहा है। लड़की तैयार हो जाती है, पर किसी कसम या जिद पर नहीं। वह भारतीय पहनावा उतारना नहीं चाहती। यहां जबकि सभी पर्यटक लगभग आधे हैं, औरतें और लड़कियां आधी हैं, लड़का भी आधा हो चला है, पर लड़की आधा नहीं होना चाहती।
‘यह लबादा ओढ़े यहां क्या करने चली आई? हम किसी फैशन शो के लिए यहां नहीं आए हैं। होटल छोड़ते वक्त क्या मैंने कहा नहीं था कि अपने हनीमून को यादगार बनाने के लिए हम एकदम उन्मुक्त होकर खूब घूमेंगे-फिरेंगे। मगर एक तुम हो कि हमेशा कपड़ों को लेकर ही सतर्क रहा करती हो।’
लड़की संयत थी। समझाते हुए बोली- ‘बात दरअसल वह नहीं रवि। तुम समझने की कोशिश क्यों नहीं करते कि मैं किसी तरह वह नहीं कर सकती जैसा सब करते हैं।’
‘लेकिन तुम्हें वैसा करने को कह कौन रहा है, मैं तो बस तुमसे एक खुलापन चाहता हूं।’
‘छी: यह क्या कह दिया? इतने गंदे हो तुम, यह तो मैं सोच भी नहीं सकती हूं। क्या खुलापन सिर्फ शरीर का होता है? सोचना तो यह चाहिए कि हमारा मन कितना खुला है!’
रेत पर चलते हुए रवि आगे की ओर बढ़ता रहा। उसकी पत्नी कहती जा रही थी- ‘खुलापन तो हमारे विचारों में होना चाहिए रवि। सब कुछ सामने रख कर खुल कर जीना चाहिए। ये आवाजें रवि तक मद्धिम-मद्धिम पहुंच रही थीं, क्योंकि रवि की चाल तेज होती जा रही थी। वह तेज गति से आगे बढ़ता जा रहा था, जबकि उसकी पत्नी उसके पीछे-पीछे चलती रेत के गह्वर में धंसती जा रही थी। अचानक वह जोर-जोर से चीखने लगी- ‘बचाओ, बचाओ, बचाओ, बचाओ…’ समुद्र की सहस्त्र लहरों ने पहले उसे नहलाया-धुलाया और फिर उसके भंवर में लिपट-लिपट डूबती-उतराती, उगती-उमगती लड़की समाधिस्त हो गई अतल गहराई में। लड़का बेतहाशा हांफता-भागता जब तक लड़की तक पहुंच पाता, काफी देर हो गई थी।
स्वप्न बड़ा ही खौफनाक था और मैं पसीने में तरबतर था। मैंने याद करने की कोशिश की, ‘हां, यह ख्वाब ही है- निखालिस ख्वाब। इसी ने मुझे जगा दिया है और मैं भटक रहा हूं। मेरी आंखें भी शून्य में टंगी हैं। और मैं शिथिल तथा स्तब्ध यह सब देख रहा हूं।
कल तो ऐसा कुछ नहीं घटा था।
नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं घटा था। कल मैं ‘ग्रांब-वे’ समुद्र तट गया था और ऐसा तो कुछ भी नहीं हुआ था। न तो कोई लड़की रेत में धंसी थी और न किसी लड़के ने किसी प्रकार की जिद की थी। सुबह होने को आई थी और मैं दिन भर के अपने कार्यक्रम पर सोच रहा था। मुझे याद आया कि सबसे पहले मुझे बोबांसा जाना है। वहां जाकर शास्त्री जी से मिलना है। पिछले पच्चीस-तीस बरस से शास्त्री जी मॉरीशस में सपरिवार रह रहे हैं। जब मैं भारत में उनसे मिला था, तो उन्होंने आग्रह किया था कि मॉरीशस आने के बाद सबसे पहले मैं उनसे ही मिलूंगा। वहां के लिए वे ही मेरे ‘बेस्ट गाइड’ हो सकते हैं।
उनसे मिलने जाते वक्त रास्ते में मुझे कई पथरीले पहाड़ मिले। जंगल की शक्ल में अनगिनत पेड़ मिले और मिले कुछ तेज झरने। जंगली फूलों के पौधे और अनगिनत वनस्पतियों की दुर्लभ प्रजातियां। इन राहों से गुजरते हुए मुझे अपने देश के मध्यप्रदेश स्थित सतपुड़ा के घने जंगल याद हो आए। सड़कें काफी साफ-सुथरी थीं। उनके दोनों तरफ किनारे-किनारे लंबे पेड़ थे, जिनके लिए मैं तो अनजान था, पर वे मानो अपनी भुजाएं फैलाए मेरा ही स्वागत कर रहे थे। एक सीधी-सपाट खुली राह पर मेरी कार सरपट दौड़ रही थी। कार में म्यूजिक चल रहा था और हिंदी फिल्मों का सदाबहार गीत यहां दो देशों को परस्पर जोड़े हुआ था। मैं देख रहा था कि कार ड्राइवर उस संगीत को बड़ी तन्मयता के साथ सुन रहा था।
‘तुम्हारे इस सुंदर देश में हिंदी फिल्में लोग देखते हैं?’
हां, साब जी, बहुत। हिंदी सिनेमा यहां खूब लोकप्रिय है। हिंदी गाने तो यहां दिन-रात चलते ही रहते हैं। हम बोबांसा आ गए हैं साब जी। वह रहा शास्त्री जी का घर, वह लालरंग से पुता। ड्राइवर ने जैसे मुझे आश्वस्त किया।
पर यह क्या? शास्त्री जी के दरवाजे पर ताला बंद पड़ा था। मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा। कहां गए होंगे शास्त्री जी? आसपास किससे पता करूं कि शास्त्री जी कहां गए होंगे। कहीं कोई दिखाई भी तो नहीं पड़ता! मैं यह सब सोच ही रहा था कि इस बीच शास्त्री जी दिख पड़े- पश्चिम की दिशा से आते हुए। मैंने उन्हें सादर नमस्कार किया और जवाब में उन्होंने भी नमस्कार किया। कहने लगे- ‘अभी-अभी एक सी-बीच से आ रहा हूं। दरअसल, वहां एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना घट गई। हमारे अपने ही देश से शादी के बाद एक जोड़ा समुद्र के किनारे-किनारे घूमता समुद्र की लहरों के भंवर में डूबते-उतराते आखिरकार डूब गया। कारण किसी को नहीं मालूम। खैर, छोड़िए इन बातों को। यहां पर यह सब तो चलता ही रहता है। आप अपना सुनाइए। सब ठीक तो है?
‘जी, सब ठीक है। लेकिन आप यह बताइए…’
वे बीच में ही बोल पड़े- ‘बस, यही जान लें कि आग और पानी के साथ किसी को मजाक नहीं करना चाहिए।’
सच तो यही है कि वह नवविवाहित जोड़ा वहीं समुद्र में डूब कर मर गया।
इतना कहने के बाद शास्त्री जी दूर-दूर तक फैले गन्ने के खेतों की ओर देखते रहे, जो अपने कटने की प्रतीक्षा कर रहे थे।
मैं पिछली रात के उस भयानक ख्वाब के विषय में सोच रहा था, जिसने मुझे स्तब्ध कर दिया था। मैं जड़वत था।
‘दिसंबर महीने में हर साल मेरे परिवार के लोग छुट्टियां मनाने या तो लंदन चले जाते हैं, या फिर इंडिया जाते हैं। इस बार अपने ही देश गए हैं।’
‘यह तो अच्छी बात है कि मॉरीशस में पिछले कई बरस रह लेने के बाबजूद भारत के साथ संबंध बरकरार हैं।’
मुझे लगा, शायद यह बात उन्हें अच्छी न लगी हो, क्योंकि वे अचानक बोल पड़े- ‘क्या कह रहे हैं आप? अरे साहब, हम इस मुल्क में चाहें कितनी ही शताब्दियां बिता दें, लेकिन इंडिया को हम कैसे भूल सकते हैं? माना कि रोजी-रोटी के लिए हमारे बाप-दादा यहां आए होंगे, अपना देश छोड़ दिया होगा, पर इसका अर्थ यह तो कदापि नहीं कि हम अपने देश को भुला बैठें! यह तो हम सपने में भी नहीं सोच सकते। शादी-विवाह या इस तरह के दूसरे कर्मकांड हम भारत जाकर ही संपन्न करते हैं।… अच्छा, छोड़िए यह सब। यह बताइए कि आगे का क्या कार्यक्रम है?’
‘सिर्फ घूमना-फिरना और लोगों से मिलना। महात्मा गांधी संस्थान जाना और अपने शोध कार्य को आगे बढ़ाना।’
‘घूमने के लिए तो पूरा देश ही है आपके सामने। इस छोटे-से खूबसूरत देश को आप महज तीन-चार दिनों में घूम सकते हैं। कल सुबह ही मैं अपने ड्राइवर को बुलाता हूं।’
‘जी, ठीक है।’
‘अभी हम कोदो चलते हैं।’
‘जी, यह कोदो क्या है और कहां पर है?’
‘यह पोर्ट लुई में है। पोर्ट लुई मॉरीशस की राजधानी है। इसी के पास कोदो है। इसी के पास कोदो है। इसी से सटा ऐतिहासिक आप्रवासी घाट है भी है। स्थानीय लोग इसे कुलीघाट भी कहते हैं।… क्या आपने आप्रवासी घाट का नाम सुना है?’
कुछ पल सोचने के बाद मैंने कहा- ‘जी, किताबों में पढ़ा है। वही घाट, जहां हमारे पूर्वज पहली बार उतरे होंगे। जब पानी का जहाज चलता था। भारत से मॉरीशस पहुंचने में चालीस दिन लग जाते थे।’
शास्त्री जी बता रहे थे कि हमारे पूर्वजों को यहां जितनी कठोर यातनाएं दी गई थीं, उन्हें इतिहास की कोई पुस्तक संपूर्ण रूप से व्याख्यायित न कर पाई है। कभी कोई अध्येता काम करे तो बात बने। मुझे ऐसा लगता है कि रिसर्च करने वालों ने समस्याओं को गहराई से महसूस नहीं किया है। कायदे से उन्हें मॉरीशस की वर्तमान पीढ़ी से भी बातचीत करनी चाहिए। उनसे उनके पुरखों के बारे में भी पूछना चाहिए और उनके अनुभवों से लाभ उठाना चाहिए और अपने रिसर्च में शामिल करना चाहिए।
पता नहीं शास्त्री जी कब तक मॉरीशस के विषय में बातचीत करते रहे और सुनते-सुनते मैं सो गया। पर अजीब बात तो यह है कि नींद में वही सपना फिर से चलने लगा-समुद्र, समुद्र का किनारा, सफेद बालुका राशि और छूटे हुए पांवों के निशान… एक नवविवाहित जोड़ा और जल समाधि।
मुझे लगा, शून्य में टंगे हुए लाल अंगारे अब बर्फ की शक्ल में झूल रहे हैं।
मैं अगली सुबह की प्रतीक्षा करने लगा।
