सुरेश सेठ

इस देश के भाग्य में इंतजार लिख दिया गया है। हम सब हैं ही अच्छे दिनों के आने के इंतजार की प्रतीक्षा सूची में। अभी खबर मिली है कि इस देश का लगभग हर स्वप्नजीवी इन्सान बेहतर दिनों की तलाश में विदेश पलायन कर जाने की अंतहीन कतार में बरसों से खड़ा है। अगर ईमानदारी से इस कतार में खड़े होकर अमेरिका में जाकर बसने का ग्रीन कार्ड प्राप्त करना है, तो इसमें एक सौ इक्यावन वर्ष लगेंगे। एक आदमी की औसत आयु निकालने वाले आंकड़ाशास्त्री उसे सत्तर बरस बताते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि एक आम आदमी को इस देश से कानूनी तरीके से ग्रीन कार्ड हासिल करने के लिए दो जिंदगी जमा दस वर्ष चाहिए। अब बताइए, ‘भला कौन जीता है तेरी जुल्फ के सर होने तक?’

इसलिए हर शहर में कबूतरबाजों के कुनबे पनपने लगे हैं। ये अपने अवैध पंखों पर सवार करवा कर इन दिवास्वप्नशील प्रतीक्षा ग्रस्त नौजवानों को विदेशी धरती तक पहुंचाते हैं। अपने विरसे का सब जमा जत्था बेच कर इन्हें इन अवैध पंखों पर सवारी मिलती है। उम्मीद उड़ान भर कर न्यूयार्क पहुंच जाने की होती है, लेकिन अभागा भगोड़ों की तरह टिंबकटू के जंगलों में उतार दिया जाता है। उम्मीद लकदक चमकदार बड़ी गाड़ियों, और ऊंचे फ्लैटों में जीने की होती है, तोहफा मिलता है तेल देशों में दोयम दर्जे की नागरिकता का या औरत हो तो शेखों के हरमों में यौन शोषण का। मर्द हो तो उनके दड़बों में कैद होकर उनकी ठोकरों से लेकर कोड़ों के बरसने का इंतजार करना पड़ता है। बेशक एक गुमनाम, दोयम दर्जे की जिंदगी उसके इस प्रमाण के बाद उसका इंतजार करती है। पलायन करने वाला डरे, तो चचा हंस कर उसे समझाते हैं कि ‘इस देश में तो तुम यह भी नहीं पाते। तुम्हें मिली है यहां सातवें दर्जे की नागरिकता की जिंदगी, जिसमें रोटी, कपड़ा, मकान, रोजी-रोजगार के वादे हैं, जो नेताओं के भाषणों में से उभरते हैं और हवा में जुमले बन कर दम तोड़ देते हैं। हर सर को छत का वादा बार-बार दोहराया जाता है, लेकिन भू-माफिया द्वारा खड़े किए गए बहुमंजिलें भवनों के पिछवाड़े दम तोड़ देता है। हम गए थे वहां उन दम तोड़ते सपनों की खोज-खबर लेने, लेकिन वहां कोई राजू डफली वाला हमें ‘दिल का हाल सुने दिल वाला’ गाकर नाचता हुआ दिखाई नहीं दिया।

जब मसीहाओं ने अपने दिल की जगह सोने की ईंटें लगा लीं, तो भला बताओ तुम्हारा हाल उन तक पहुंचेगा कैसे? तुम तो सात समुद्र पार के लोगों को अपना हाल सुनाने के लिए एक चरमराती हुई नौका में ठुंस गए थे। तूफानी थपेड़ों का आघात न सह सकी, वह माल्टा के पास आगाध जल राशि में डूबी। लेकिन केवल एक बार नहीं। यहां बरमूडा त्रिकोण जैसे हम समुद्र में माल्टा उभरते हैं और नौजवानों से भरी नौकाएं डूबती रहती हैं। लेकिन डूबते नौजवानों की हृदय विदारक चीखें कौन सुनता है? एक नौका डूबती है, और दूसरी नौका के लिए सपना जीते युवक कतार लगाए खड़े मिलते हैं। क्या हुआ जो सपने टूट गए? लोगों को तो इनके टूटने की आदत हो गई है।

जुमलेबाज नेता आज भी उन्हें बहलाते हैं, ‘हर पेट को रोटी, हर हाथ को काम’ और मिलेगा जीवन भर का आराम’ आराम तो नहीं मिला, हां, पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीना हराम हो गया, काम के अधिकार को सुविधा केंद्रों की बंद खिड़कियों के पीछे से नौकरशाहों के अट्टहास ने छीन लिया, और ‘पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब’ की शिक्षा के मौलिक अधिकार को अंग्रेजी शिक्षा की चमकदार दुकानों ने। आज भी देश की नब्बे प्रतिशत जनता इन दुकानों से वनवास भोग रही है। बताइए निरक्षर भट्टाचार्यों का यह गट्ठर कबूतरबाजों का हाथ पकड़ कर विदेश बिकने के लिए क्यों न चला जाए? बेशक वहां जिंदगी बंधक है, लेकिन मोल तो अच्छा मिलता है। देश के मसीहा अपने नारों में इसकी चिंता करते हैं, अरे देश से प्रतिभा पलायन रोको, क्योंकि यही तो हमारी प्राणशक्ति है।’ लेकिन यह प्राणशक्ति निर्जीव होकर देश के हर कोने में कुकरमुत्तों की तरह उग आए आईलैट्स संस्थानों में वीजा बैंडों की तलाश कर रही है। लड़कियों की संख्या इन अकादमियों में बढ़ गई, क्योंकि वे बैंड हासिल करके एक के साथ एक ले जा सकेंगी। एक स्वयं और एक उनका नकली दूल्हा, जिसे वह विदेश तक तस्कर कर पराई धरती पर लापता छोड़ देती है। मुट्ठी भर सिक्कों के बदले। लेकिन अब सुना है विदेशी धरती अपनी मुट्ठियां भींच रही है। नकली दूल्हों को तारणहार नहीं मिल रहे। इन्हें इंतजार करना होगा, अभी और उन एक रात की दुल्हनों के साथ, जिन्हें प्रवासी भारतीय उनकी मांग पर इस धरती पर छोड़ गए, वे भी अपने दूल्हों की वापसी का अंतहीन इंतजार करती हैं।

जी हां, इस अवैध तंत्र को छिन्न-भिन्न करने के लिए बन रहे हैं, सख्त कानून। धीरज रखें उनके लागू होने का इंतजार करें। सिर्फ इंतजार ही तो करना है। आपको इसकी आदत भी हो जानी चाहिए कि अगर कानून बन भी जाएंगे तो उनको लागू करने के जिम्मेदार ही खुद उन्हें तोड़ते नजर न आएं। कानून को तोड़ना कोई दोष नहीं है। ऐसा एक कौव्वे ने हमारे कान में फुसफुसाया है। असल दोष तो है कानून तोड़ कर दंड विधान की गिरफ्त में आ जाना। गिरफ्त के चक्रव्यूह में आ गए और उसे तोड़ना नहीं जानते तो तुम ऐसे अभिमन्यु हो, जिसे इस नए युग में जीने का कोई हक नहीं। मामा शकुनि ने उस युग में कहा था, आज होते तो शायद फिर इसे दोहरा देते। ०