शिप्रा किरण

साहित्य के फिल्मी रूपांतरण की कड़ी में यों तो कई फिल्में बनी हैं, लेकिन कुछ ही ऐसी हैं जो हिंदी सिनेमा में मील का पत्थर साबित हुर्इं। सिनेमा और साहित्य के इसी कड़ी को मजबूत करती एक फिल्म है-साहब, बीवी और गुलाम। विमल मित्र के उपन्यास पर बनी यह फिल्म 1962 में रिलीज हुई थी। इसे उस वर्ष के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का सम्मान मिला था। साथ ही फिल्मफेयर पुरस्कारों में इसे चार श्रेणियों में एक साथ सम्मानित किया गया, जिनमें से दो पुरस्कार अभिनय के लिए थे जो सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए गुरुदत्त और सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए मीना कुमारी मिले थे। उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षों की कथा कहती और कलकत्ता (अब कोलकाता) की पृष्ठभूमि पर बनी यह फिल्म कई मामलों में खास हो गई। कई गहरे प्रतीकों और शानदार अभिनय से सजी यह फिल्म भारतीय समाज और इतिहास के एक खास दौर के विभिन्न पहलुओं का लेखा-जोखा प्रस्तुत करती है और इसी क्रम में कई मायनों में अपने समय से आगे निकल जाती है। पूरी फिल्म भारतीय सामंती समाज के विघटन को आधार बना कर चलती है। फिल्म की शुरुआत एक ढही या ढहाई जा रही हवेली से होती है और यह पहला दृश्य ही पूरी कहानी का खाका प्रस्तुत कर देता है। ढहती या ढहाई जाती वह हवेली खत्म होती जमींदारी और उसकी जर्जर अवस्था का प्रतीक है। सामंतों की खस्ता होती हालत, उनकी ऐय्याशियों के बीच सबसे दयनीय स्थिति अगर किसी की थी तो वह थी सूनी और खंडहर होती हवेलियों में रहने वाली औरतों की। उसी की वास्तविक स्थिति का बयान है यह फिल्म। वैसे तो फिल्म के सभी किरदार महत्त्वपूर्ण हैं पर ‘छोटी बहू’ के रूप में मीना कुमारी पूरी कहानी के केंद्र में हैं।

पूरी फिल्म और सभी पात्र छोटी बहू को केंद्र में रख कर ही गढ़े गए हैं। फिल्म में पहली बार छोटी बहू से हमारा सामना तब होता है जब वह अपने पड़ोस में रहने आए नए युवा भूतनाथ यानी गुरुदत्त को हवेली आने का बुलावा भेजती है। भूतनाथ रोजगार की तलाश में पहली बार गांव से शहर आया था। उसे मोहिनी सिंदूर बनाने के कारखाने में नौकरी मिल गई थी। छोटी बहू ने भूतनाथ को हवेली इसलिए बुलाया था कि वह उससे मोहिनी सिंदूर मंगाना चाहती थी। वही मोहिनी सिंदूर जिसे अपने माथे पर सजा कर वह अपने पति और हवेली के ‘छोटे बाबू’ का मन मोह सके और दूसरी औरत से दूर कर उन्हें अपने करीब ला सके, क्योंकि वह कई-कई दिन और कई-कई रात घर नहीं लौटते थे। वह किसी पतुरिया यानी नाचने वाली के कोठे पर अपना समय बिताते। छोटे बाबू का चरित्र उसी ठेठ सामंती पुरुष का प्रतिनिधित्व करता है जो पतन के कगार पर भी विलास के साधनों में डूबा हुआ था। छोटी बहू के मोहिनी सिंदूर लगाने का भी जिस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। छोटी बहू दिन रात उसकी प्रतीक्षा में खुद को खोती जाती है। कभी नौकरों को भेजकर तो कभी बीमारी का बहाना बनाकर भी उसे अपने पास बुला लेना चाहती है लेकिन वह हर बार असफल ही होती है। पूरी फिल्म स्त्री के अस्तित्व के प्रश्न तो खड़े करती ही ह,ै उसी संदर्भ में मोहिनी-सिंदूर के माध्यम से सिंदूर जैसे वैवाहिक प्रतीकों के सामर्थ्य पर भी सवाल उठाती है। एक रात जब छोटी बहू अपने पति को बाहर जाने से रोकती है और उससे सवाल करती है कि इतनी बड़ी हवेली में मैं तुम्हारे बिना क्या करूं तो वह कहता है-‘गहने तुड़वाओ, गहने बनवाओ और कौड़ियां गिनो, सोओ आराम से।’

क्या हवेलियों में रहने वाली एक समृद्ध स्त्री का एकमात्र यही काम था? धार्मिक-सामजिक रीति-रिवाजों द्वारा वैवाहिक बंधन को जन्म-जन्मांतर का संबंध मानने वाली छोटी बहू जैसी स्त्री अपने साथ हुए छल को देख कर हतप्रभ रहती है। वह अपना दुख बांटे भी तो किसके साथ? सवाल किससे करे जबकि हवेली की अन्य स्त्रियां भी उसी सामंती और पुरुषवादी मानसिकता का शिकार हैं। उसी हवेली की मझली बहू यानी छोटी बहू की जेठानी उस पर ताने कसती है कहती है-रईस घराने का मर्द जब तक नाच-रंग न देखे मर्द कैसा!! तुम जैसी मर्द के लिए तड़पने वाली औरत हमने आज तक नहीं देखी। स्त्रियों की मानसिक अवस्था का उदाहरण है मझली बहू का यह संवाद। उन स्त्रियों को अपनी स्थिति का अहसास तो क्या होता बल्कि वह पुरुष की गलतियों को भी सही साबित करने लगती हैं, और तो और, पति के पास रहने की छोटी बहू की सहज नैसर्गिक मानवीय इच्छा को ही गलत ठहराती हुई उसके स्त्रीत्व का अपमान ही करती है। फिल्म में छोटी बहू के चरित्र को मात्र एक समृद्ध सामंती परिवार की किसी पत्नी द्वारा अपने पति का साहचर्य पाने की लालसा रखने वाली स्त्री-पात्र कहना उस सशक्त किरदार और इस पूरी फिल्म की अधूरी समझ होगी। उस जकड़े हुए समाज में अपने पति के साहचर्य के लिए आवाज उठाना भी कहीं न कहीं उस समय और संदर्भ में विद्रोह की शुरूआत है। और इस बात से भी कहीं बहुत आगे यह स्त्री के मान, उसके स्वाभिमान और उसके अस्तित्व की लड़ाई की अभिव्यक्ति है। छोटी बहू की यह लड़ाई किसी एक छोटे बाबू या किसी एक पुरुष से नहीं बल्कि उस पूरी सामाजिक व्यवस्था से है जिसने स्त्री को उसकी भावना और उसकी अस्मिता से अलग कर सिर्फ एक शरीर तक सीमित कर दिया है। छोटी बहू एक जगह कहती भी है- ‘वो मर्दों को नहीं समझाया जा सकता। कई औरतों को भी नहीं। औरत का इतना बड़ा अपमान! इतनी बड़ी लज्जा!’ यह हवेली के सामंती घुटन का शिकार एक स्त्री की चेतना थी जो उससे यह बात कहलाती है।

वह सिर्फ पति के प्रेम में पागल एक स्त्री छवि नहीं बल्कि अपने व्यक्तित्व, अपने स्वाभिमान की चेतना से लैश हो रही स्त्री है। उसे अपने आत्मसम्मान की गहरी समझ है। उसे यह स्वीकार नहीं की हवेली की यथास्थिति को स्वीकार कर जीने वाली अन्य स्त्रियों से उसकी तुलना की जाए। उसे इस बात का भी अहसास है कि वह दूसरी औरतों से अलहदा है और वह सचमुच अलहदा है भी। अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए ही वह अपने पति के कहने पर शराब भी पीती है ताकि वह किसी और स्त्री के पास रहने न जाए। यह अलग बात है इसी कोशिश में वह शराब की आदी हो जाती है लेकिन आखिरकार पति की तरफ से उसे कुछ भी हासिल नहीं होता। वह शराब पीती तो है पर साथ ही उसके भीतर एक अपराधबोध भी घर किए रहता है। ‘स्व’ की चेतना और भावना के बीच के स्त्री-अंतर्द्वंद को छोटी बहू के रूप में मीना कुमारी ने बखूबी चित्रित किया है। छोटे बाबू अपने जिस पौरुष के मद में चूर थे उनसे वह सवाल करती है कि ‘तुम क्या दे सके मुझे? मुझे मां कह कर पुकारने वाला…?’

उस सामंती युग में किसी पुरुष से सवाल करती और उसके पौरुष के छद्म-अहम् पर प्रश्नचिह्न लगाती स्त्री है ‘साहिब बीवी और गुलाम की छोटी बहू।’ अंत में छोटे बाबू के लकवाग्रस्त हो जाने पर अपने लकवाग्रस्त पति के इलाज के लिए छोटी बहू रात में भूतनाथ के साथ हवेली से निकलती है लेकिन रास्ते में ही छोटे बाबू का मझला भाई उसकी ह्त्या करा देता है, क्योंकि वह जानता था कि जमींदारी अब बची नहीं और जो रही-सही संपत्ति है उसे वह छोटी बहू के साथ बांटना नहीं चाहता था। अपने तथाकथित चौधराना सम्मान की रक्षा के लिए छोटी बहू की लाश हवेली में ही दफना दी जाती है। उसी लाश की हड्डियां फिल्म के अंत में ओवरसियर भूतनाथ को टूटी हुई हवेली के मलबे के बीच मिलती है। उसके हाथ के कंगन बताते हैं कि वह छोटी बहू के ही हड्डियों का ढांचा है। इस तरह अपने सम्मान के रास्ते तलाशती स्त्री की मौत उस तत्कालीन व्यवस्था का सच तो बयान करती ही है, साथ ही हमें वर्तमान व्यवस्था के सामंती अवशेषों के प्रति भी आगाह करती है। छोटी बहू की भूमिका में मीना कुमारी ने अविस्मरणीय अभिनय किया है। उनकी आवाज, उनके सौंदर्य में मादकता, पीड़ा और मासूमियत का मेल सम्मोहित करता है। मीना कुमारी ने छोटी बहू के माध्यम से अपने मूलभूत अधिकारों के लिए संघर्ष करती स्त्री के किरदार को अपने सशक्त अभिनय से और अधिक सशक्त बनाया है। रूढ़िग्रस्त भारतीय सामंती समाज में स्त्री-प्रश्नों से रूबरू कराती यह फिल्म अपने समय से कहीं बहुत आगे निकल जाती है।