दिनेश कुमार

पिछले कुछ सालों से हिंदी में विधा के तौर पर गजल का तेजी से उभार हुआ है। विभिन्न पत्रिकाओं में गजलें न सिर्फ प्रकाशित, बल्कि लोकप्रिय भी हो रही हैं। देश के लगभग सभी छोटे-बड़े शहरों में गजल कहने वाले सक्रिय हैं। हिंदी गजल का स्वरूप विविधतापूर्ण है और वह स्थानीय यथार्थ के साथ-साथ राष्ट्रीय यथार्थ को पूरी गंभीरता के साथ अभिव्यक्त कर रही है। बावजूद इसके, हिंदी कविता के भीतर गजल को अभी तक स्वीकार्यता नहीं मिल पाई है। मुख्यधारा के साहित्यिक विमर्शों या अकादमिक बहसों में गजल की कोई चर्चा नहीं होती। काव्य-संग्रहों की तुलना में गजल-संग्रहों पर न के बराबर आलेख या समीक्षाएं प्रकाशित होती हैं। ऐसे में, एक बड़ा प्रश्न यह है कि गजलकारों की बड़ी संख्या और बहुतायत में लिखे जाने के बावजूद हिंदी गजल साहित्य की मुख्यधारा से बेदखल क्यों है?
लोकप्रिय काव्य विधा होने के बावजूद गजलकारों को वह स्थान कभी नहीं मिला, जो कवियों को स्वाभाविक रूप से मिलता है। इसके पीछे का मूल कारण हिंदी साहित्य विशेषकर हिंदी कविता का विशिष्टताबोध है। सरलता और लोकप्रियता को दुर्गुण मानने वाली हिंदी कविता भला गजल को स्वीकार कैसे कर सकती है? कविता के संदर्भ में संप्रेषणीयता का सवाल हिंदी में सिर्फ अकादमिक सवाल बन कर रह गया है और वहां इस मसले पर काफी चिंतन भी हुआ है। हालांकि ऐसे चिंतन में जटिल और असंप्रेषणीय कविताओं का सैद्धांतिक डिफेंस अधिक है।

हिंदी में संप्रेषणीयता संबंधी पूरी बहस एक तरह से व्यावहारिक स्तर पर संप्रेषण में जटिल और लगभग विफल कविताओं को उचित और महत्त्वपूर्ण सिद्ध करने की कवायद है। इस बहस में कविता के लिए संप्रेषणीयता के सवाल को महत्त्वपूर्ण मानते हुए व्यावहारिक स्तर पर असंप्रेषणीय कविताओं को सैद्धांतिक स्तर पर संप्रेषणीय सिद्ध किया गया। कविता के रूप में हो रहे बदलाव के संदर्भ में संप्रेषणीयता के संकट का व्यावहारिक समाधान खोजने की जगह सैद्धांतिक समाधान किया गया, जिससे संकट और बढ़ता गया। परिणामरूवरूप कविता जनता से कटती गई। आश्चर्य तो यह है कि जो लोग कविता के लिए सामाजिकता को अनिवार्य मानते थे, उन्हें भी इस बात की चिंता कम ही थी कि कविता जनता तक कैसे पहुंचे। समाज की सारी चिंता कविता के भीतर होने लगी, पर उस समाज तक कविता संप्रेषित हो रही है या नहीं, इसकी परवाह नहीं की गई। जिस समाज को लेकर कविता में युद्ध लड़ा जा रहा था, वह समाज उस कविता से पूरी तरह अनजान था।

क्या विडंबना है कि समाज की चिंता के कारण जिन कविताओं को महत्त्वपूर्ण बताया गया और समाज की चिंता न होने के कारण जिन कविताओं को तिरष्कृत किया गया, दोनों ही जनता के लिए बोधगम्य नहीं थीं। हालांकि अपवाद भी दानों तरह की कविताओं में मौजूद हैं। जनता के दुख-दर्द की अभिव्यक्ति के साथ-साथ उस जनता तक पहुंचने की चिंता ही हिंदी गजल के मूल में है। हिंदी गजल का मूल स्वर यथार्थवादी है और यही इसकी असल ताकत है। यह यथार्थवादी प्रगतिशील कविता के यथार्थवाद से इस अर्थ में अलग है कि यहां जिस जनता या समाज की चिंता है, उसके लिए वह बोधगम्य है और वहां तक वह पहुंचती भी है। हिंदी गजल का यथार्थवाद अधिक मुकम्मल है। इस मुकम्मल यथार्थवाद की बेहतरीन अभिव्यक्ति दुश्यंत कुमार की गजलें हैं। सत्तर के दशक का यथार्थ किसी भी कविता की तुलना में दुश्यंत की गजलों में अधिक प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त हुआ है।

कोई भी साहित्यिक रूप का जब एक भाषा से दूसरी भाषा में संचरण होता है, तो उसकी अंतर्वस्तु में भी निश्चित रूप से बदलाव होता है। जैसे अंग्रजी या अन्य यूरोपीय भाषाओं से हिंदी में आए उपन्यास का पूरी तरह कायाकल्प हो गया। वैसे ही उर्दू-फारसी से आई गजल हिंदी में बहुत हद तक बदल चुकी है। हिंदी गजल उर्दू गजल की रूमानी परंपरा को त्याग कर यथार्थवादी तेवर अपनाती है। उर्दू गजल की पहचान उसकी रूमानियत है, तो हिंदी गजल की पहचान उसकी सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक चिंताएं है। यथार्थ से मुठभेड़ करके ही गजल का हिंदीकरण हुआ है। बहुत सारे लोग हिंदी गजल में रूमानियत को ही केंद्रीय भाव की तरह अभिव्यक्त करने में लगे हैं। यथार्थवादी धारा के साथ ही हिंदी गजल अपना अलग रास्ता अ‍ैर मुकाम तय कर सकती है। सिर्फ रूमानियत को अभिव्यक्त कर हिंदी गजल उर्दू गजल की छाया मात्र लगेगी और उसकी स्थिति सदा दोयम दर्जे की होगी। यह संतोष की बात है कि इधर हिंदी में सक्रिय गजलकार इस बात को समझ रहे हैं और उनकी गजलों में सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ की तीखी अभिव्यक्ति हो रही है।
हिंदी कविता के भीतर गजल को स्वीकार न करने वाले अभिजात कवि और आलोचक प्रश्न करते हैं कि गजल ने हिंदी कविता में नया क्या जोड़ा? इसका एक उत्तर तो यही है कि उसने जनता की पीड़ा को जनता की भाषा में अभिव्यक्त किया। बदली हुई परिस्थितियों में कविता औ समाज को फिर से जोड़ने का काम किया। वैसे सवाल यह भी पूछा जा सकता है कि हिंदी कविता में ऐसा क्या है, जो हिंदी गजल में नहीं है। देश के सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ से लेकर मनुष्य के सूक्ष्म मनोभावों तक की अभिव्यक्ति हिंदी गजल में हुई है। किसानों की आत्महत्या और दुर्दशा पर इधर की हिंदी कविता लगभग मौन है। पर हिंदी गजल में इसकी चिंता है। रामकुमार कृषक लिखते हैं- ‘बीज बोए थे खुशी के खुदकुशी बोई न थी/ चार कंधों पर फसल ऐसी कभी ढोई न थी।’

आज की हिंदी कविता जहां महानगरीय भाव-बोध से भरी पड़ी है, वहीं हिंदी गजल देश की बुनियादी चिंताओं से रूबरू है। सांप्रदायिकता पहले शहरों तक सीमित थी। भारतीय गांव धार्मिक मेल-जोल के अनूठे उदाहरण रहे हैं। पर अब सांप्रदायिकता गांवों तक पहुंच गई है। सांप्रदायिक राजनीति ने गांव के भाईचारे को परास्त कर दिया है। साझी संस्कृति और साझी विरासत को हमारे गांवों ने महफूज रखा था। अब उस पर खतरा मडंरा रहा है। प्रताप सोमवंशी का एक शेर देखिए: ‘कभी पत्तों में जो कीड़े लगे थे, जड़ों तक वो पहुंचते जा रहे हैं/ गजब है मजहबी तलवार से अब, हमारे गांव काटे जा रहे हैं।’
मगर सवाल है कि ऐसा क्यों हो रहा है? हमारी चुनी सरकारें क्या कर रही हैं? समतामूलक समाज बनने की जगह गरीबी-अमीरी की खाई रोज और चौड़ी क्यों होती जा रही है? इसका उत्तर विनय मिश्र कुछ इस तरह देते हैं: ‘केवल धन के लोभ में डूबा है परिवेश/ कुछ सेठों के हाथ में गिरवी सारा देश।’
बाजार के कारण देश में लाभ-लोभ की एक ऐसी संस्कृति विकसित हो गई है, जिसने मनुष्यता को लगभग विस्थापित कर दिया है। मीडिया, जिससे संवेदनशीलता की सर्वाधिक अपेक्षा होती है, पूरी तरह संवेदनहीन और क्रूर हो चुका है। लोगों का मारा जाना उसके लिए दुख और विशाद का विषय न होकर धंधे की दृष्टि से फायदे का मसला है। विनय मिश्र का एक शेर है: ‘समाचारों में रौनक लौट आई/ हजारों लोग मारे जा रहे हैं।’

राजनीति की स्थिति भी मीडिया से अलग नहीं है। आज देश में दलित एक बड़ी राजनीतिक शक्ति है। सभी पार्टियां दलितों के पक्ष में दावे और वादे करती हैं। पर जमीनी हकीकत बहुत बदली नहीं है। वे सिर्फ बातें करती हैं, क्योंकि उन्हें दलितों के वोट चाहिए। बीआर विप्लवी अपनी एक गजल में सभी राजनीतिक धाराओं को प्रश्नांकित करते हुए कहते हैं: ‘वो चाहें राम हो या काम हों लोहिया कि गांधी हों/ है सबको वोट खातिर ‘विप्लवी’ दरकार दलितों की।’

किसानों की आत्महत्या से लेकर सांप्रदायिकता, आर्थिक गैरबराबरी, बाजारवाद, मीडिया, राजनीति आदि कोई भी ऐसा विषय नहीं है, जो आज के गजलकार से अछूता हो। दरअसल, हिंदी कविता के संकट को देखते हुए अब इस बात को समझना जरूरी है कि कविता को अगर फिर से लोकप्रिय होना है, तो उसे संप्रेषणीया और बोधगम्य होना ही होगा। छंद रहित संप्रेषणीयता के दूसरे औजार ढंूढ़ने होंगे या छंदों की तरफ लौटना होगा। छंद को लेकर किसी शास्त्रीय नियम में बंधने की जरूरत नहीं है। रूप पक्ष की तुलना में संप्रेषणीयता को तरजीह देनी होगी। इसलिए गजल को लेकर इस विवाद में पड़ने की जरूरत ही नहीं है कि उसका मूल रूप उर्दू में कैसा है और हिंदी में कैसा, या कैसा होना चाहिए। सवाल गजल की शास्त्रीयता का नहीं, उसकी बोधगम्यता का है। हिंदी में उसका रूप अलग होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। इसी तरह, इस विवाद का भी कोई औचित्य नहीं है कि हिंदी गजल उर्दू-फारसी से आयातित विधा है। गजल हिंदी की परंपराओं में ढल कर अपनी स्वतंत्र पहचान बना चुकी है। जहां तक भाषा का सवाल है, फारसी-उर्दू का भाषायी संस्कार हिंदी गजल की कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत है। हिंदी गजल की भाषा हिंदुस्तानी है। हिंदी गजल उर्दू और हिंदी को करीब ला रही है। वर्तमान दौर में इस भाषायी मेलजोल और एकता का महत्त्व असंदिग्ध है। हिंदी गजलकार भाषा के इस व्यर्थ विवाद में पड़ना ही नहीं चाहता। जैसा कि प्रसिद्ध गजलकार अशोक ‘मिजाज’ कहते हैं: ‘मेरी गजल सुनोगे तो महसूस करोगे/ तुम जिसको ढूंढ़ते थे वो आवाज यही है।/ उर्दू कहें कि हिंदी कहें आप की मर्जी/ अपना तो गजल कहने का अंदाज यही है।’ ०