पूरी दुनिया में जलवायु परिवर्तन के लक्षण प्रत्यक्ष दिखाई दे रहे हैं। इसमें बढ़ता वैश्विक तापमान और पिघलते हिमनद यानी ग्लेशियर हैं। ग्लेशियरों के पिघलने से जहां एक तरफ समुद्र का जल स्तर बढ़ रहा है, समुद्र के फैलाव में उपयोगी भूखंड आ रहे हैं, वहीं पहाड़ों का बंजर बढ़ रहा है। हमारे यहां भी उत्तराखंड के ग्लेशियरों के पिघलने से वहां के पारिस्थितिकी तंत्र के बिगड़ने और पहाड़ों का जन-जीवन अस्त-व्यस्त होने का खतरा बढ़ता गया है। ग्लेशियरों के पिघलने से मानव जीवन के सामने किस तरह के संकट पैदा हो रहे हैं, बता रहे हैं अभिषेक कुमार सिंह।
करीब सात सौ साल पुराने हिमनद यानी आइसलैंड का ओकोजोकुल ग्लेशियर जाते-जाते आखिर चला ही गया। दावा है कि यह पहला ऐसा ग्लेशियर है, जो जलवायु परिवर्तन की जानी-मानी समस्या की चपेट में आकर दुनिया के नक्शे से पूरी तरह मिट गया। सात सदी पुराना ग्लेशियर गला, तो दुनिया में पहली बार एक ग्लेशियर की याद में एक शोकसभा हुई। शोक में डूबे आइसलैंड के प्रधानमंत्री कैटरीन जोकोबस्दोतियर की अगुआई में ओकोजोकुल की मौत पर मर्सिया पढ़ा गया और दुआ की गई कि दुनिया का कोई और ग्लेशियर इस तरह हमसे हमेशा के लिए जुदा न हो जाए। करीब तैंतीस बरस तक लगातार पिघलती बर्फ के कारण यह नौबत आई कि अड़तीस वर्ग फीट किलोमीटर से सिकुड़ कर एक किलोमीटर तक रह गए इस ग्लेशियर की अंतत: समाधि बन गई और इसके समाधि लेख में दुनिया के बाकी बचे ग्लेशियरों को लेकर शोकसभा में चिंता प्रकट की गई।
ग्लेशियर यानी हिमनद हमारे देश में भी पिघल रहे हैं। हमारे देश में ग्लेशियरों के पिघलने और इस वजह से प्राकृतिक आपदाओं की खबरें तो अरसे से आती रही हैं, पर इसे एक बड़ा खतरा मानते हुए अदालतों का ध्यान भी इधर गया है। तीन साल पहले 2016 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने इस मामले में एक बड़ी पहलकदमी करते हुए राज्य के सभी हिल स्टेशनों और ग्लेशियरों को तीन महीने में ‘इको सेंसिटिव’ घोषित करने और ग्लेशियरों के पच्चीस किलोमीटर के क्षेत्र में सभी प्रकार के निर्माण कार्यों पर रोक लगाने के आदेश दिए थे। इसके अलावा ग्लेशियर घूमने जाने वाले पर्यटकों पर टैक्स लगाने और उनकी संख्या नियंत्रित करने का आदेश भी अदालत ने दिया था। उत्तराखंड हाई कोर्ट का यह आदेश एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान आया था, जिसमें नैनीताल के आसपास अवैध निर्माण और वृक्षों के अवैध रूप से कटाई पर रोक लगाने के लिए अदालत से दखल का अनुरोध किया गया था।
हाई कोर्ट ने भीमताल, सातताल, नौकुचियाताल, नैनीताल और खुरपाताल के चारों ओर दो किमी और पांच किमी के क्षेत्र में सभी प्रकार के निर्माण और वृक्षों की कटाई पर रोक लगा दी थी। यह आदेश भी दिया था कि गंगोत्री और यमुनोत्री ग्लेशियरों के पच्चीस किमी के क्षेत्र में कोई नया निर्माण नहीं होगा, जबकि दस किमी के क्षेत्र में कोयला या अन्य किसी प्रकार का जीवाश्म ईंधन नहीं जलाया जाएगा। अदालत के ऐसे आदेशों-निर्देशों पर कितना अमल किया जाता है, यह तो समय बताएगा, पर यह जरूर है कि अब ऐसे ही उपायों से ग्लेशियरों को बचाया जा सकता है। पर सवाल यह है कि आखिर ग्लेशियरों के संरक्षण के लिए ऐसे उपायों की जरूरत क्यों पड़ रही है।
छह साल पहले 16-17 जून, 2013 की रात को केदारनाथ में जो प्राकृतिक विपदा आई थी, उसके वास्तविक कारणों पर यों तो अब भी बहस होती रहती है। इस अरसे में पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और सरकार ने इसके जवाब अलग-अलग ढंग से तलाशने की कोशिश की है और प्राय: सभी अलग नतीजों तक पहुंचे। लेकिन इसी दौरान पहाड़ में सूखती नदियों और खाली होती झीलों और ग्लेशियरों ने सबका ध्यान खींचा। पिघलते-सूखते ग्लेशियरों की चर्चा पिछले कुछ वर्षों में तब ज्यादा बढ़ी, जब वर्ष 2016 में नैनीताल की प्रसिद्ध नैनी झील का जलस्तर तेजी से नीचे चला गया और उसके सूखने का संकट पैदा हो गया था। नैनीताल झील का जलस्तर 1977 के बाद सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया था। सिर्फ नैनी झील ही नहीं, दावा किया गया कि उत्तराखंड में पांच सौ से अधिक पेयजल योजनाओं को आपूर्ति करने वाले जलस्रोतों और झीलों में पचास फीसद तक पानी की कमी हो गई है। टिहरी बांध तक में जलस्तर घटने और पानी का दबाव कम होने से टर्बाइन नहीं चल पाए, जिसका असर जलविद्युत उत्पादन पर पड़ा।
झील आदि जलस्रोतों के सूखने के अलावा भूगर्भशास्त्रियों का दावा यह भी है कि पिछले कुछ वर्षों में पहाड़ के जंगलों की आग ने जो रौद्र रूप धरा है, उसके पीछे ग्लेशियरों का पतन भी है। दरअसल, शीतकाल में जो ग्लेशियर और पहाड़ बर्फ से भरे रहते थे, अब सर्दियों के दौरान बर्फबारी और बारिश में आई कमी की वजह से वे प्राय: सूखे और खाली रहने लगे हैं। अप्रैल की चमकती धूप में इन्हीं ग्लेशियरों की तेजी से पिघलती बर्फ नदियों और झीलों में जल भरती रही है, पर अब ग्लेशियरों से वह जरूरी बर्फ नदारद है।
पर यह त्रासदी महज आज की नहीं है, ऐसा लगता है कि इसकी भूमिका काफी पहले से लिखी जा रही थी, पर हमारे मौसम विज्ञानी यह बात जानने में विफल रहे। ऐसे एक अहम कारण का खुलासा अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी- नासा ने 2013 में किया था। नासा ने केदारनाथ त्रासदी से करीब बीस दिन पहले 25 मई, 2013 को अपने उपग्रह- लैंडसेट-8 से केदार घाटी के कुछ चित्र लिए थे, जिनके विश्लेषण से इस केदारनाथ में हुए विनाश के कुछ कारणों का पता चला था। चित्रों में दिखा था कि केदार घाटी के ऊपर स्थित दो मुख्य हिमनदों (ग्लेशियरों)- चूराबारी और कंपेनियन- की कच्ची बर्फ तेजी से पिघल कर बहने लगी थी और मार्ग में आने वाले चट्टानी अवरोधों के कारण रिस कर आया पानी बड़ी मात्रा में केदारनाथ के ऊपर आकर जमा हो गया था। दावा है कि तेजी से पिघले हिमनदों से ही इतना भारी विनाश हुआ था। पर सवाल है कि हिमनदों के तेजी से पिघलने का आज के सूखे से क्या संबंध है?
असल में एक दौर में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का एक असर यह होता है कि नदियों में पानी का प्रवाह बढ़ जाता है और कई बार जल संकट से फौरी राहत या निजात मिल जाती है। पर हमेशा यह काम नियंत्रित ढंग से नहीं होता है। इस बारे में डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के ‘ग्लोबल क्लाइमेट चेंज प्रोग्राम’ की निदेशक जेनिफर मॉर्गन ने करीब पंद्रह साल पहले एक चेतावनी दी थी। उन्होंने 2005 में कहा था कि हिमनदों के पिघलने से जाहिर है कि शुरुआत में नदियों-झीलों में ज्यादा पानी आएगा। इससे पहले तो भयानक सैलाब आएंगे, जो भारी विनाश का कारण बन सकते हैं। जैसा कि केदारनाथ में हुआ। पर बाद में खाली हो चुके ग्लेशियर नदियों-झीलों को पानी की अपूर्ति करने में असमर्थ हो जाएंगे, जिससे सूखा एक त्रासदी बन जाएगा।
गौरतलब है कि हमारे देश में सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र- इन तीन बड़ी नदियों पर 38039 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में 5220 छोटे-बड़े हिमनद हैं और सभी के सिकुड़ते जाने से यह संकट ज्यादा गहरा रहा है। भारत के हिस्से में पड़ने वाली सिंधु पर सबसे ज्यादा हिमनद हैं। वहां इनकी संख्या 3538 है, जबकि गंगा बेसिन में 1020 और ब्रह्मपुत्र में 662 हिमनद हैं। देश के पांच राज्यों- जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश- में स्थित इन सभी हिमनदों का पर्यावरण संतुलन की दृष्टि से खासा महत्त्व है। हिमालय के हिमनदों के पिघलने की रफ्तार पर हमारे पड़ोसी नेपाल के सेंटर फॉर इंटिग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (आईसीआईएमओडी) की भी नजर रही है। इस सेंटर ने अपनी रिपोर्ट- ‘फॉरमेशन आॅफ ग्लेशियल लेक इन द हिंदूकुश-हिमालय ऐंड जीएलओएफ रिस्क असेसमेंट’ में कहा है कि हिंदूकुश के हिमालय क्षेत्र के चारों तरफ जो आठ हजार हिमनद हैं, उनमें से दो सौ से ज्यादा इस क्षेत्र के लिए वाकई खतरनाक हैं।
समस्या इनका खतरनाक होना भर नहीं है, बल्कि यह है कि इनके पिघलने की दर पर निगाह रख कर चेतावनी जारी करने वाली कोई माकूल व्यवस्था उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में मौजूद नहीं रही है, जबकि यही राज्य इनसे सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। गौरतलब है कि उत्तराखंड सरकार ने बीते पांच-छह वर्षों में चार धाम यात्रा का मजबूत आधारभूत ढांचा खड़ा करने में दिलचस्पी ली है। इसी तरह आपदा प्रबंधन के नाम पर सड़कें बनाने, यात्रियों की संख्या सीमित करने, उनका मेडिकल टेस्ट कराने, आपदा की सूरत में बचाव के रास्तों को चिह्नित करने आदि के सब काम किए हैं, लेकिन कहीं इसका जिक्र नहीं मिला कि हिमनद के तेजी से पिघलने की जानकारी लेने और उसकी समय पर सूचना देने का प्रबंध भी किया गया हो।
हिमनदों के पिघलने-सिकुड़ने की समस्या दुनिया के किसी एक हिस्से तक सीमित नहीं है, बल्कि चौतरफा है। हमारे देश में गंगोत्री के अलावा पिंडारी और शिगरी नाम के दूसरे बड़े हिमनद पिघले हैं। जम्मू-कश्मीर का पिंडारी हिमनद 1848 से 1957 के बीच एक सौ आठ वर्षों में 1350 मीटर सिकुड़ चुका था। इसी तरह, तंजानिया (अफ्रीका) में किलिमंजारो के ग्लेशियर लगभग गायब हो चुके हैं। पेरू की दक्षिणी एंडेस पर्वतमाला में स्थित क्युलस्सया बर्फ टोपियां 1963 के बात बीस फीसद पिघल गईं। अमेरिका में ओहियो स्थित बायर्ड पोलर रिसर्च सेंटर के विज्ञानियों ने दो दशकों के दौरान किए गए शोध में पाया कि अफ्रीका के अलावा, दक्षिणी अमेरिका, चीन, तिब्बत, भारत और दूसरी जगहों पर ग्लोबल वॉर्मिंग आदि अनेक पर्यावरणीय कारणों से हिमनद पिघल रहे हैं। निश्चय ही पर्यावरण हितैषी उपाय ही इन्हें बचाने में कारगर हो सकते हैं।
अगर हम हिमालय के पर्यावरण से छेड़छाड़ न करें, नदियों का प्राकृतिक प्रवाह न रोकें और सीमित दायरे में रह कर तीर्थयात्रा और पर्यटन करें, तो ही प्रकृति की ये सौगातें वरदान के रूप में मौजूद रहेंगी और इनसे ऐसा विनाश नहीं होगा। कोशिश होनी चाहिए कि हिमनदों के रूप में प्रकृति के इस ठंडे और श्वेतवर्णी वरदान को हमेशा के लिए बचा कर रखा जा सके।
ग्लैशियर हैं तो हम हैं
समुद्रों को पानी से भरा रखने वाली नदियों में पानी आता है हिमनदों यानी ग्लेशियरों से। दो साल पहले 2017 में जब उत्तराखंड हाईकोर्ट ने पहले गंगा-यमुना नदियों को इंसान की जीवित इकाई का दर्जा दिया था, तो शायद यह सवाल अदालत के मन में भी रहा होगा कि इस हक से ग्लेशियर वंचित क्यों रहें। जबकि वे यानी ग्लेशियर हैं, तभी तो नदियां हैं, समुद्र हैं, यह सारा जीवन है। यही वजह रही है कि गंगा-यमुना के साथ उत्तराखंड हाईकोर्ट ने जीवित व्यक्ति मानने के दायरे में गंगोत्री-यमुनोत्री ग्लेशियर्स, झीलों, हवा, जंगलों, झरनों और घास के मैदानों को भी शामिल कर लिया और इन्हें भी जीवित इंसान जैसे कानूनी हक दिए जाने की बात कही। लेकिन इस फैसले में भी अदालत का ज्यादा जोर गंगोत्री और यमुनोत्री ग्लेशियरों पर ही रहा।
अदालत के ऐसे आदेशों-निदेर्शों पर कितना अमल किया जाता है, यह तो समय बताएगा, पर अब ऐसे ही उपायों से ग्लेशियरों को बचाया जा सकता है। आखिर ग्लेशियरों के संरक्षण के लिए ऐसे उपायों की जरूरत क्यों पड़ रही है। इसकी एक फौरी वजह केदारनाथ त्रासदी और उत्तराखंड की सूखती झीलें हैं। करीब छह साल पहले 16-17 जून, 2013 की रात को केदारनाथ में जो प्राकृतिक विपदा आई थी, उसके वास्तविक कारणों पर यों तो अब भी बहस होती रहती है। पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और सरकार ने इसके जवाब अलग-अलग ढंग से तलाशने की कोशिश की है और प्राय: सभी अलग नतीजों तक पहुंचे। मगर इसी दौरान पहाड़ में सूखती नदियों और खाली होती झीलों और ग्लेशियरों ने सबका ध्यान खींचा। देश के बाहर कई मुल्कों में ग्लेशियरों को पिघलने से बचाने के लिए कहीं उन्हें लंबे-चौड़े तिरपाल से ढंका गया है, तो कहीं तीखी धूप से उन्हें बचाने के लिए सूरज की किरणों को वापस मोड़ने के लिए दर्पण आदि लगाने के प्रबंध किए गए हैं। यकीन मानिए, अगर ग्लेशियर सूख गए तो न नदियां हरी रहेंगी और न बादलों को जन्म देने वाले सागरों का कोई वजूद बचेगा।
धधक रही धरती
हाल में जिस एक अन्य खबर ने दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है, वह आर्कटिक इलाके से जुड़ी है। आर्कटिक को धरती का फ्रीजर कहा जाता है। यहां सदियों से जमी बर्फ धरती का तापमान नियंत्रित करने में काम आती रही है, पर इधर दावा किया गया है कि आर्कटिक शेष दुनिया की तुलना में दोगुनी रफ्तार से गर्म हो रहा है, जिससे इसमें जमी बर्फ भयानक गति से गायब होने लगी है। बर्फ पिघलने के दो असर हुए हैं। पहले यहां के बड़े इलाके में मौजूद बर्फ सूरज की किरणों को वायुमंडल में वापस ठेल देती थी, लेकिन बर्फ का दायरा सिकुड़ते जाने से अब वह काम नहीं हो पा रहा है। यही नहीं, बर्फ के पिघल जाने से आसपास के समुद्र का दायरा बढ़ गया है, जिसका पानी सूर्य की ऊष्मा को अपने अंदर सोख लेता है। जज्ब की हुई यह ऊष्मा आर्कटिक इलाके में गर्मी और बढ़ा रही है। इससे आर्कटिक की बर्फ और तेजी से पिघल रही है।
उल्लेखनीय है कि पर्यावरणविद् अरसे से चेतावनी दे रहे थे कि अगर वक्त रहते ठोस उपाय नहीं किए गए तो आर्कटिक को गायब हो जाने से रोका नहीं जा सकेगा। अमेरिका पर्यावरणविद फिलिफ हिगुएरा की भविष्यवाणी इस मामले में खासतौर से रेखांकित की जाती है, जिन्होंने 2016 में ग्रीनलैंड, कनाडा और साइबेरिया के आर्कटिक इलाकों में आग लगने की घटनाओं में इजाफे की बात कही थी। यह वास्तव में एक विचित्र बात है कि सदियों से जो इलाके पूरी तरह बर्फ में जज्ब थे, अब वहां गर्मी अपना असर दिखा रही है और तापमान बढ़ने के कारण बार-बार बिजली गिरने से वहां के कई इलाकों में आग तक लग रही है। एक खतरा और है। भीषण ठंड के कारण आर्कटिक में अभी तक कीटाणु नहीं पनपते थे, लेकिन अब वहां का माहौल गर्म होने से कीटाणुओं के प्रकोप की समस्या भी पैदा हो सकती है। ऐसा होने पर पूरी धरती का इको-सिस्टम प्रभावित होगा और धरती पर जीवन और मुश्किल में पड़ जाएगा। ल्ल

