देवा उस आदिवासी का नाम था, जो खेती करता था। उसके पिता ने सत्रह वर्ष की उम्र में ही उसकी शादी करवा दी। पच्चीस तक पहुंचते-पहुंचते उसके तीन बच्चे हो गए। देवा के परिवार की हालत बहुत दयनीय थी। उसकी जमीन पहाड़ी परिक्षेत्र में स्थित होने के कारण इतनी उपजाऊ भी नहीं थी, फिर भी देवा और उसकी पत्नी पत्थरों में पसीना बहाया करते थे, ताकि बच्चों का पेट भरने जितना अन्न पैदा किया जा सके।  देवा के खेत पर महुए का एक पेड़ था, जिससे कभी-कभार वह देशी शराब बनाया करता था। शराब बेचने से उसे ठीक-ठाक आमदनी हो जाती थी। पर समय के साथ समाज के खुरदरे हाथों ने उस पर निहायत भद्दे नक्स बना दिए थे, जो मुझे उसकी मजबूरी के कारण जान पड़ रहे थे। सफेद लिबास वालों ने उसकी जमीन हथिया ली। उसकी पत्नी की हैजे से मौत हो गई। देवा ने अख्तियार कर ली एक अनसोची राह…। फिर एक दिन सूबेदार डोगरा की राइफल से निकली सनसनाती गोली से देवा उस जमीन पर निढाल पड़़ा था, जिसका कोई नाम नहीं था। हां, उसे वह अपनी वसीयत अवश्य कहता था।

मालाबार हिल, गर्मी में भी सुकून देने वाली जगह। पहाड़ी से नीचे चौराहे तक जाती नैपिएन्स रोड। रोड के चारों ओर गुलमोहर के बड़े-बड़े पेड़। चौराहे पर बना कबूतरखाना, वहीं एक ओर नानीबाई स्कूल फिर सामने वर्ली दूरदर्शन केंद्र और वानखेड़े स्टेडियम की बड़ी-बड़ी चमचमाती लाइटें। स्कूल बस्ते के भारी भरकम बोझ को सहते हुए भी नौनिहाल अक्सर कबूतरों के लिए दाना लाना नहीं भूलते थे, मैं भी उनमें से एक था। बस जब चौराहे के सिग्नल पर लाल बती के हरा होने के इंतजार में थोड़ी देर खड़ी रहती, तब मैं लगभग भागता हुआ, कबूतरों को दाना डाल कर वापस बस में चढ़ जाता। कबूतर गुटर-गुटर करते दानों पर टूट पड़ते थे। इस जगह से कभी विदा लेने का सोचा भी न था, पर आज अवसर कुछ और था।
सारी पैकिंग करने के उपरांत भी सूटकेस के आसपास सामान बिखरा पड़ा है। मन अब भी उलझन में है, शायद पीछे कुछ छूट रहा है। ओह! माता-पिता की तस्वीर रखना तो भूल ही गया। एक तस्वीर और भी है, जिसे सूटकेस के नीचे वाले हिस्से में संभाल कर रखना होगा। वक्त-बे-वक्त कुछ समय तो इनके साथ जाया करना ही होगा। सरकारी बंगला, जिसमें सारी सुविधाएं नौकर-चाकर तो होंगे ही, पर इनके बिना बंगला खाली एक इमारत बन कर रह जाएगा।

‘बेटा रोहन, दंतेवाड़ा पहुंचते ही खबर देना।’ पिताजी थोड़े चिंतित थे। पहली पोस्टिंग। नया शहर। नए लोग। घर में बड़े लाड़-प्यार से पाला था मुझे। दीदी मुझे पढ़ाने के लिए रात-रात भर अपनी नींद हराम किया करती थी। उनका सपना था कि मैं आइएएस बनूं और उनका सपना सच करना मेरा मकसद भी था। और किया भी। उस दिन मम्मी-पापा दोनों स्टेशन तक छोड़ने आए थे। मम्मी भावुक थीं। बार-बार आंसू टपका रही थीं। ‘अपना ध्यान रखना। नौकर से कहना खाना समय पर बनाए। और चाय तो तुम्हें छह बजे ही चाहिए, उसे पांच बजे ही उठा देना। दंगे-फसाद वाली जगहों पर जाओ तो सावधानी बरतना। सुना है, वहां जीवदानी माताजी का बड़ा मंदिर है, समय निकाल कर वहां माथा टेकने जाते रहना।’ मम्मी के पास ढेर सारी बातें थीं और उनका मेरे पास एक ही जवाब था- हां। छत्तीसगढ़ का दंतेवाड़ा जिला। जहां नक्सलवाद के जिक्र मात्र से रोंगटे खड़े हो जाते हैं। देश एक ओर अपनी आंतरिक समस्याओं से त्रस्त है, तो दूसरी ओर आतंकवाद, उग्रवाद, नक्सलवाद जैसी अनेक बीमारियों से। अब आप सोच रहे होंगे, मैं इन्हें बीमारी क्यों कह रहा हूं, तो वास्तव में ये सब बीमारियां ही तो हैं, जो देश को अंदर से खोखला किए जा रही हैं। ऐसा तो नहीं है कि सरकार इन पर लगाम नहीं लगाना चाहती, पर कहीं तो रेलम-पेल अवश्य है। आइएएस की पढ़ाई के दौरान ही मैंने छत्तीसगढ़ के बारे में बहुत कुछ जान-समझ लिया था।

ट्रेन का सफर बड़ा मजेदार होता है। एसी कोच, जिसमें मैं सीट नंबर इक्कीस पर था। ट्रेन आज खाली थी। मैं फैल कर बैठ गया, जिससे सीट नंबर बाईस भी मेरे दायरे में आ गई। रात बारह बजे तक सोलापुर स्टेशन आ गया। इसी बीच यात्री भार भी बढ़ता जा रहा था। सरकारी नियमों को ध्यान में रखते हुए, मैंने अपना अतिक्रमण स्वयं ध्वस्त कर लिया।
वारंगल स्टेशन से मेरे सामने वाली सीट पर एक ऐसा शख्स आकर बैठ गया, जिसका चेहरा डरावना था। चेहरे से तो लग नहीं रहा था कि वह व्यक्ति एसी कोच में बैठने लायक था, पर आज के समय में कुछ कहा नहीं जा सकता, इसलिए मैंने भी अपनी निगाहें उस पर से हटा कर खिड़की से बाहर कर लीं। अगले स्टेशन पर ट्रेन रुकती उससे पहले ही डिब्बे में टीटी महोदय आ धमके। टीटी ने आते ही उस व्यक्ति से टिकट मांगा। उसने कहा टिकट नहीं है। ट्रेन आंध्रप्रदेश की सीमा समाप्त कर रही थी। टीटी ने चालान बनाने की कोशिश की तो उसने ‘मेरा चालान बनाएगा’ कहते हुए, टीटी की खोपड़ी पर रिवाल्वर तान दी। मैं तो एकदम सहम गया, बाकी यात्री भी।‘टीटी महोदय, रहने दीजिए। इनके टिकट के पैसे मैं अदा कर देता हूं, और श्रीमान आप भी अपना रिवाल्वर हटा लीजिए।’ मैंने हिम्मत से काम लेते हुए कहा। रिवाल्वर हटी तो टीटी ने राहत की सांस ली और मेरी भी जान में जान आई। अन्यथा खोपड़ी का एक-एक पुर्जा ढूंढ़ना पड़ता। दूसरे दिन का सूर्य उगने के साथ ही ट्रेन दंतेवाड़ा पहुंच गई थी। सरकारी गाड़ी स्टेशन के बाहर खड़ी मेरा इंतजार कर रही थी। मेरे उतरने से पहले ही वह व्यक्ति, जो ट्रेन में आतंक मचा रहा था, मेरी नजरों से ओझल था।  पहले ही दिन आॅफिस में शहर के कई नामचीन लोग, स्वागत के बहाने मिलने आए थे। किसी के हाथ में मिठाई, किसी के हाथ में महंगी पेंटिंग्स, तो किसी के हाथ में रंग-बिरंगे फूलों से सजा हुआ गुलदस्ता।

पहले दिन मैंने स्टाफ के कर्मचारियों की मीटिंग ली। आॅफिस के लोग अपने तजुर्बों के आधार पर मुझे बता रहे थे कि पहले किसी व्यक्ति या अधिकारी के अपहरण की वारदात होती रहती थी, पर अब दोनों ओर से बकायदा लड़ाई की खबरें जारी थीं। बम और बारूदी माइन्स बिछा कर हमला करने की योजना लगातार जारी थी, जिसमें कई लोग हताहत होते तो कई मारे जाते। सेना सरकार की ओर से लड़ रही थी, तो दूसरा पक्ष अपने अधिकारों की मांग को लेकर मैदान में था। अपनी जमीन का हक पाने का अधिकार।
मीटिंग में एक कर्मचारी ने जब नक्सली मुखियाओं की फाइल मेरे सामने रखी, तो मैंने देखा, वह चेहरा सबसे ऊपर था, जिसे मैंने ट्रेन में देखा था। फाइल चित्र के नीचे साफ-साफ बड़े अक्षरों में नाम लिखा हुआ था- ‘देवा’।मैंने कम समय में ही मीडिया, जनसंपर्क और स्टाफ के सदस्यों की सहायता से, देवा के अतीत में झांक लिया। तस्वीर एकदम साफ थी, उजले पानी की तरह।उसी दिन रात के ठीक ग्यारह बजे मुझे फोन आया, पास के गांव में नक्सलवादियों ने चार लोगों को गोलियों से भून दिया। मुझे लगा, शायद यह मेरा स्वागत है, उनकी ओर से। उसी पल मैंने मन ही मन देवा से मिलने और उससे बातचीत करने का संकल्प लिया, वह भी अकेले। सवेरे मैंने नक्सलवादियों के दुर्गम स्थानों पर संदेश भिजवाया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया।सर्दी के दिन। कड़ाके की ठंड। जब मैं नक्सलवादियों द्वारा निर्धारित स्थान पर पहुंचा, तो देखा, घना अंधकार और उसमें जुगनू की तरह रोशनी प्रदान करने वाला अलाव, जो उन्होंने अपने समूह के मध्य जला रखा था। मेरे साथ केवल दो हथियारबंद सिपाही थे। मैं उन्हें अपने साथ लाना नहीं चाहता था, मगर एसपी साहब की जिद थी। मुझे देख कर नक्सलवादी, जो संख्या में तकरीबन तीस थे, खड़े हो गए। उन्होंने मुझे बैठने के लिए लकड़ी का एक गट्ठा दिया। मैं बैठ गया। देख कर हैरान रह गया कि सबके हाथों में स्टेनगन थी।

मेरी नजर उस शख्स तक तुरंत पहुंच गई, जिसने मेरे जेहन में खलबली मचा रखी थी। मेरी आंखें उससे मिलीं और मैंने देखा कि उसकी आंखों में नफरत और सख्ती के अलावा कहीं करुणा से लिपटा हुआ आदरभाव भी था। काफी सूक्ष्म, लेकिन मैं उसे पहचान गया। मेरे बैठने का इशारा करते ही देवा के सभी साथी स्टेनगन थामे जमीन पर बैठ गए, देवा खड़ा रहा।
‘देवा!’ मैंने बिना किसी औपचारिकता के अपनी बात कहनी चाही। ‘मेरी नजरों में तुम वह इंसान नहीं हो जैसा सरकार तुम्हें समझती है। मैंने तुम्हारे बारे में बहुत कुछ जानकारी प्राप्त की है, बिना किसी प्रशासनिक भाव से।’देवा ने लगभग गुर्राते हुए सख्त स्वर में कहा- ‘काम की बात करो, कलेक्टर साब!’ उसकी सख्त आवाज से मैं अंदर तक कांप गया। कैसे अपनी बात कहूं। लेकिन मुझे अपनी बात कहनी थी। कुछ देर चुप रहने के बाद, अपने मानस में उठने वाले विचारों को मैंने जुबान पर लाना शुरू किया।
‘देवा! मैं तुम्हारे साथ हुए अत्याचार और नाइंसाफी को बहुत अच्छी तरह समझता हूं।’
मेरी बात उसने बीच में ही काट दी- ‘कलेक्टर साब! मैं फिर कह रहा हूं, काम की बात करो, लोरी मत सुनाओ।’
मैं हतप्रभ रह गया। उस जंगली मानस को कैसे समझाता।

मैंने फिर से कहा- ‘देखो देवा, तुमने जो रास्ता अपनाया है वह सही नहीं है। ऐसा लगता है जैसे तुम स्वयं अपने परिवार को उजाड़ने पर तुले हो। तुम अपनी जिद छोड़ दो और परदे के पीछे बैठे हुए उन सफेद नकाबपोशों को पहचानो, जो तुम्हें और तुम्हारे परिवार को अपनी ही सेना से जंग करने को मजबूर कर रहे हैं। ये नकाबपोश लोग वे हैं, जो न तुम्हें तुम्हारे हक दिला पाऐंगे, न हमें हमारे कर्तव्य का निर्वहन करने देंगे। ये वे लोग हैं, जो तुम्हारे कंधों पर, अपने स्वार्थों की बंदूकें रख कर देश को गृहयुद्ध की आग में झोंक रहे हैं। कभी तुमने सोचा है कि तुम्हें मिलने वाला पैसा और हथियार कौन और क्यों उपलब्ध करवाता है?… तुम मेरा भरोसा करो देवा!’  ‘खबरदार! कलेक्टर साब। भरोसा! ऐसी फिजूल बातों से समय जाया न करो। साब! आप अच्छे हो या बुरे, मैं नहीं जानता। मेरी सलाह है कि आप कल ही यहां से चले जाइए, देवा रहे नरहे यह जंग जारी रहेगी। क्योंकि यह जगह भी मेरी है और यहां का राज भी।’  देवा के इतना कहते ही उसके साथी उठ खड़े हुए और पलक झपकते ही उसके साथ जंगल के अंधियारे में कहीं गुम हो गए। मैं अनमना-सा, किसी पराजित सिपाही की तरह अवाक खड़ा देखता रह गया। मंथर गति से चलता हुआ मैं अपने आवास पर लौट आया।

लगभग एक महीना बीत गया। फिर एक दिन शाम को पार्टी विशेष की रैली का आयोजन होना था। वहां देवा के हमला करने की पुख्ता सूचना थी। मैंने सेना के अधिकारियों से बात कर घात लगा दी, जंगल की सरहद से थोड़ी दूर।रैली को थोड़ी देर के लिए रोक दिया गया। बख्तरबंद सेना की एक टुकड़ी को रैली के रूप में उसी रास्ते से आगे बढ़ने का आदेश देकर मैं सेना के बाकी जवानों के साथ सरहद के दूसरे रास्ते पर हमलावर के रूप में तैयार था।अंधेरा घिर आया था। हवा और पेड़ों के बीच सरगोशियां शुरू हो गई थीं। कर्नल सतीश ने जवानों को सचेत किया कि सरहद के पास कीचड़ और खाई-खंदक है, पांव जमीन में धंस सकते हैं, कोई भी कोताही न बरते। अचानक दो-चार हथगोले और बारूदी माइन्स फटने से रैली के रूप में चल रहे जवानों ने अपना मोर्चा संभाला। दूसरी तरफ घात लगाए बैठे जवानों ने चील-कौवों की भांति धावा बोला। आधे घंटे तक धांय-धांय, हाय-हाय, इधर-उधर का शोर चलता रहा। एकाएक सूबेदार डोगरा की गोली अंधेरे को चीरती हुई अपने निशाने पर लगी। एक गगनभेदी चीख हवा के संग बह गई। चार-पांच जवान अपनी जवानी को कुर्बान कर चुके थे और लगभग सारे हमलावर अपनी जान गंवा बैठे। मेरी नजरें देवा को ढूंढ़ रही थीं। आखिर वह दिखा, धूल से सना चेहरा, खून से लथपथ शरीर, पास में बिखरी हुई लाल पगड़ी और एक हाथ में राइफल, जो अब भी कह रही थी, यह सरहद और वसीयत देवा की है। आॅपरेशन पूरा हुआ, पर खौफनाक मंजर पूरी रात मेरी आंखों में तैरता रहा। सीने में एक अजीब तूफान बरपा। अगले सवेरे टेबल पर पड़ी फाइल को बंद कर दिया गया। ०

 

 

सोहन वैष्णव