महेंद्र सिंह

घर की दहलीज में बेखुदी में पांव घिसट-घिसट कर टहलकदमी करते रहने और धूसर दानेदार हवाई चप्पलों की रगड़ से उत्पन्न ध्वनि को अनसुना करते रहने की वजह से यह पता ही नहीं चल पाया कि कब घड़ी की सुइयां टिक-टिक करते हुए आपस में मिल गई हैं और रात बारह का अलार्म बजाने लगी हैं। लगभग इसी समय पर हमारे रिहाइशी परिसर के मुख्यद्वार पर गाड़ी के तीन हार्न सुनाई देने लगते हैं- पों पों पों। मुख्य द्वार के ठीक सामने स्थित नाले के ऊपर बने नवनिर्मित बंदा बहादुर सेतु के बिजली के खंभों पर लाइट नहीं है। उनके पीछे स्थित मोबाइल टावर पर आधा चांद लालटेन की तरह लटक रहा है और अपनी रोशनी से अंधकार को मिटाने का प्रयास कर रहा है। चौकीदार नीम बेहोशी की हालत में हड़बड़ी में उठता है। अभी उसने तौलिया नहीं लपेटा हुआ है। वह पतलून पहने हुआ है। उसकी पतलून खुली हुई है। वह हड़बड़ी में उठ कर अपनी पतलून के बटन लगाता और पैंट की जिप बंद कर देता है। वह बेतरतीब रखी हुई चाबियों के गुच्छे में से मुख्य द्वार की चाबी खोजता है। इस प्रयास में एक मर्तबा चाबी का गुच्छा उससे गिर जाता है। फिर वह मुख्य द्वार की ओर दस कदम चलने पर ताले में चाबी लगाने का विफल प्रयास करता है। उसकी गर्दन ऊपर उठती है। वह पढ़ने की कोशिश करता है कि कार में कौन बैठा हुआ है। आदि की शक्ल देख लेने के बाद चौकीदार कॉलोनी के रजिस्टर में प्रविष्टि करने की कवायद से बच जाता है।

अब वह दरवाजा खोलता है। नखरीला दरवाजा चूं-चां करता हुआ वापस अपनी जगह पर लौट आता है। इस बीच में वह चाबियों का गुच्छा अपनी जेब में रख लेता है। फिर चौकीदार दरवाजे का पल्ला पकड़ कर खड़ा हो जाता है। आदि गाड़ी लेकर कॉलोनी में आ जाता है। मेरी निगाह घड़ी की सुइयों की तरफ जाती है। ठीक बारह बज कर सात मिनट हो गए हैं। आदि ने गाड़ी पार्किंग में लगा दी है। वह तीसरे माले पर स्थित हमारे फ्लैट की तिरालीस सीढ़ियां चढ़ रहा है। बचपन से ही कितना समझाता रहा हूं उसे कि पांव रगड़-रगड़ कर मत चला कर- इससे जूते-चप्पल जल्द घिस कर खराब हो जाते हैं। लेकिन मेरी बात जब उसने बचपन में नहीं सुनी, तब वह एडोब में इंजीनियर के पद पर नियुक्त हो जाने के बाद कैसे सुन सकता था। अपनी इस मध्यवर्गीय मानसिकता पर मन ही मन तंज कसते हुए मैं कहने लगता हूं कि हमारी युवावस्था समझौतों, अभावों और आत्मत्याग के सिरफिरे विज्ञापनों से बहल जाया करती थी, जिसकी वजह से हम खामखयाली में अपनी आदर्श की बीन बजने पर मैले हो चुके अपने सपनों को त्याग के धोबीघाट में धुलने के लिए फेंक आया करते थे। लेकिन वर्तमान पीढ़ी के लिए दाग अच्छे होते हैं, क्योंकि उनके पास सर्फ एक्सेल है। शायद पीढ़ी का अंतराल इसे ही कहते हैं।फिर मैं घर का दरवाजा खोलता हूं। एक दीप्ति मेरे चेहरे पर आ जाती है, मानो उमस भरी रात में थके-मांदे मुसाफिर के चेहरे पर पूर्णिमा के चांद की शीतल, मंद और सुकूनदायक किरण पड़ गई हो। आदि भी शांत मुसकान से जवाब देता है। बचपन से जो एक आदत उसकी नहीं बदली है, वह है कि घर में घुसते ही वह पूछ बैठता है- ‘खाने में क्या बना है? खाना किसने बनाया है?’ मैं जवाब में कह देता हूं कि- ‘राधा के पति का देहांत हो गया है। वह कुछ दिनों तक घर नहीं आ पाएगी।’ थोड़ी देर के लिए उसके मन में शोक का भाव पनपता है। मगर मन ही मन में वह प्रसन्न भी है कि चलो कुछ दिनों तक तो उसे मम्मी के हाथों का बना हुआ भोजन नसीब हो पाएगा।

आदि हाथ-मुंह धो कर और कपड़े बदल कर डाइनिंग टेबल पर बैठ जाता है। मैं ओवन में खाना गर्म करने लगता हूं। एक तरह से सफाई देने के अंदाज में मैं उससे कहता हूं कि ‘मम्मी ग्यारह बजे तक तेरा इंतजार करती रही। फिर उसकी हिम्मत जवाब दे गई और वह सोने चली गई। सुबह चार बजे से जाग कर खटती रहती है। उसका सोना लाजिमी है।’ मेरी बातों का आदि पर कोई असर होता नहीं दिखता। वह चुपचाप भोजन करता रहता है। शायद वह स्पष्टीकरण सुनते-सुनते पक गया था। उसने इस पर तवज्जो नहीं दी। दो-चार मिनट आदि से और बातें हुर्इं। आज कल के बच्चे अपने कार्य अनुभव को बांटना पसंद नहीं करते हैं। देखा जाए, तो उन्हें दाना-पानी देकर दोहरी जिंदगी जीने के लिए हमने खुद ही पल्लवित-पुष्पित किया है। एक तरह से वह हमारे अधूरे सपनों और अपूर्ण महत्त्वाकांक्षाओं को अश्वत्थामा की तरह ढोने के लिए अनवरत रूप से दिन-रात भटक रहे हैं, जिसकी वजह से यह आधुनिक अश्वत्थामा हमारे जैसे द्रोणाचार्यों की महत्त्वाकांक्षाओं का बोझ ढोने के लिए न जाने कितने समय तक के लिए अभिशप्त हो गए हैं। यूरोप में स्थित बहुराष्ट्रीय कंपनियों की जरूरतों को पूरा करने, उनकी समस्याओं को दूर करने के लिए उल्लू की तरह जागने की फितरत पैदा करने के लिए हमने ही तो उन्हें सांचे में ढाला है। अगर हम उन पर प्रकृति एवं समाज से किनारा करने की तोहमत लगाते हैं, तो इसके लिए हम खुद ही जिम्मेवार हैं। इन बच्चों को विदेशी भाषा के ज्ञान, उसके लहजे की पकड़, उसके वाक-चातुर्य एवं अभिव्यक्ति कौशल में महारत हासिल करने के लिए हमने स्वयं ही तो कितने-कितने संस्थानों में भर्ती करवाया था- इस आशंका में कि कहीं हमारा जिगर का टुकड़ा इस अंधी दौड़ में पिछड़ न जाए। अपने सवालों-जवाबों से हैरान-परेशान होकर मैं अपने शयनकक्ष में चला जाता हूं। आदि दस-पंद्रह मिनट में टीवी का रिमोट दौड़ाने के बाद अपना लैपटॉप ले कर बैठ जाता है। मेरे माथे पर चिंता की लकीर-सी उभर आती हैं। कंपनी से आए हुए अभी इसे आधा घंटा भी नहीं हुआ है और यह फिर से गलाकाट प्रतियोगिता की रिले रेस में भागने लग गया है।

आदि को बोर्ड की बैठक के लिए प्रस्तुतीकरण तैयार करते-करते चार बज गए। चार बजे का अलार्म बजने पर मैं उठ गया तथा अपने शयनकक्ष से चल कर बैठक में आ गया। वहां पर मैंने देखा कि लगभग उसी समय पर आदि का काम संपन्न हुआ था। मेरी धर्मपत्नी अपनी नींद में गाफिल पड़ी हुई थी। बेटी भी सोई हुई थी। रात भर मुझे भी गहरी नींद नहीं आ पाई थी। दिमाग में अतीत के चलचित्र आते-जाते रहे थे। कहने को मेरी आंखें बंद थीं, पर मेरा दिमाग पूरी तरह से सक्रिय था। मुझे यह अहसास हो रहा था कि बैठक की बत्ती अभी जल रही है और उधर बैठ कर आदि योगी की तरह अपने काम में व्यस्त है। मेरा मन अतीत और वर्तमान के भंवर में फंसा पड़ा था। अतीत मुझे अपने कस्बे के छोटे से मकान की ओर बार-बार खींच कर ले जा रहा था। … मैं रात के बारह बजे थक-हार कर घर लौटा करता था। आज के महानगरों की तरह कस्बे के गली-मुहल्लों में रोशनी की व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त नहीं हुआ करती थी। बिजली हो भी, तो उसकी आपूर्ति हमेशा बाधित रहा करती थी। शायद ही कोई ऐसा दिन गुजरता हो, जब हमें पांच-छह घंटे के कट का सामना न करना पड़ता हो। रात में बस स्टॉप से उतर कर घर की दहलीज में सुरक्षित पहुंचने तक मां-पिताजी और बड़े भैया की नींद फाख्ता रहा करती थी। चोर-उचक्कों की बात तो छोड़ दीजिए, गली मुहल्ले के कुत्ते उस वक्त आदमखोर बाघ से कम नहीं लगा करते थे मुझे। छोटे मुहल्लों में प्रचलित जादू-टोनों और भूत-प्रेतों की कहानियां अनायास मेरे अंतस में उमड़ती-घुमड़ती रहा करती थीं तब। मेरा चेतन मन मुझसे कहा करता था कि यह सामने जो पीपल का वृक्ष दिखाई दे रहा है, वह वास्तव में पीपल का पेड़ ही है। जबकि मेरे अवचेतन मन में यह खबर हड़कंप मचाए रखती थी कि पिछले साल गोरखे चौकीदार ने अपनी गरीबी और कर्ज से तंग आकर इसी पीपल के पेड़ की शाखा पर फांसी लगा ली थी। यह वक्त भी आसुरी शक्तियों का होता है। आप यकीन करें या न करें, दूर से आम के पेड़ की टहनी या सफेदे के पेड़ का ठूंठ भी तब मुझे वेताल का कोई बिछड़ा हुआ साथी दिखाई देने लगता था और यह अहसास भर ही मेरे शरीर के रोंगटे खड़े कर देने और सिहरन-सी दौड़ाने के लिए पर्याप्त हुआ करता था।

मेरे बड़े भैया दारा सिंह तो न थे कि वे भूत-प्रेतों और राहजनों से मेरी रक्षा कर पाते, मगर जिम्मेवारी और भातृप्रेम का अहसास उनके हाथों को लाठी और टार्च लेकर बस स्टॉप तक आने के लिए विवश कर दिया करता था। मेरी झुकी हुई गर्दन, चिंतातुर चाल उन्हें यह अहसास करा देती थी कि उनका छुटका टीटू लौट आया है। वह लाठी की ठक ठक से मेरा ध्यान भंग किया करते। मैं उनसे बात तो क्या करता, बात करने के लिए कुछ होता ही नहीं था मेरे पास। वर्तमान नौकरी मेरे मन माफिक नहीं थी। घर की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी न थी कि बिना अगली सीढ़ी पर चढ़े, पिछली सीढ़ी से छलांग लगा दूं। हम लोग अपने कुनबे में लौट रहे हैं। बड़े भैया टार्च जला कर चलते हैं। गली के मोड़ पर टार्च की रोशनी में भूरी बिल्ली की बिल्लौरी आंखें दिखाई देती हैं- वह आक्रमण की मुद्रा में आ जाती है। भैया लाठी से उसे भगा देते हैं। रोशनी के घेरे से पड़ोस के कुत्तों को भी भनक लग जाती है कि बिल्ली आसपास है। उनका झुंड बिल्ली को पकड़ने के लिए भागता है। बिल्ली छलांग लगा कर शहतूत के पेड़ पर चढ़ जाती है। उसकी गुर्राहट और बिल्लौरी आंखें बड़ी भयावह लगती हैं। दो-चार कुत्ते पेड़ के नीचे खड़े होकर उस पर भौंकते रहते हैं। भैया के टार्च की रोशनी पड़ने पर डाल पर बैठे हुए कौओं की नींद उड़ जाती है। अचानक हुई रोशनी से उनको खतरे का अहसास होता है- उनके फड़फड़ाते डैनों से पंत्तियों में सरसराहट होने लगती है। वे उड़ कर नीम के पेड़ पर पहुंच जाते हैं। भूरी बिल्ली को भी टार्च की रोशनी पसंद नहीं आई। उसकी मिमियाहट में क्रोध है। गुर्राहट में आक्रोश है। उसका शिकार हाथ से निकल गया है। वह थोड़ा ऊपर चढ़ जाती है। कुत्ते अपनी पराजय स्वीकार कर बिखर जाते हैं। घर की दहलीज पर टार्च बंद हो जाती है। भैया दरवाजे के पीछे लाठी रख देते हैं। वे देगची में से खाना निकाल कर चूल्हे पर गर्म करने की कोशिश करते हैं। मैं उनके प्रयासों को विफल करता हुआ कह देता हूं- ‘मुझे भूख नहीं है।’ भैया मुझसे पूछना चाहते हैं कि कारखाने में कैसा चल रहा है। मैं उनकी किसी बात का जवाब नहीं देता हूं। मैं केवल अपनी गर्दन दाएं-बाएं, ऊपर-नीचे और हूं-हां करके अपना काम चलाता रहता हूं। फिर मैं चुपचाप आंगन में चारपाई बिछाने लग जाता हूं। मुझे मालूम है कि मां-पिताजी भी जाग रहे हैं। उनकी चुप्पी, उनकी इंतजार करती आंखें और चिंतातुर हृदय मुझसे दो बातें करने के लिए ललक रहा है। पर मैं पत्थर बना रहता हूं। भैया मुझे बताना चाहते थे कि कहीं से इंटरव्यू का लेटर आया हुआ है। शहर से बाहर जाना होगा, पर मैं खामोश ही बना रहता हूं।
आंगन में चारपाई मैंने डाल ली है। चारपाई पर तकिया के नीचे मैंने कुछ प्रतियोगी पत्रिकाएं रख ली हैं। एक पत्रिका नीम अंधेरे में उठा कर मैं पढ़ने लग जाता हूं। भैया अपने कमरे का दरवाजा बंद कर देते हैं। मैं पत्रिका को अपने चेहरे पर रख लेता हूं। धीरे-धीरे मैं भी नींद में गाफिल हो जाता हूं। …चार-सवा चार के करीब आदि अपना लैपटॉप बंद करके सोने का उपक्रम करने लगता है। मैं बैठक में आदि से कहता हूं- ‘आज तो तुम बिल्कुल सोए ही नहीं!’ इस स्वत: स्पष्ट प्रश्न के उत्तर में आदि कहता है- ‘हूं!’ …इस तरह नई सुबह में आदि रिले रेस की अपनी मशाल मुझे सौंप कर आराम करने लगता है।
चित्र: अशोक भौमिक