तारा निगम

एक जंगल था। वहां सब पशु-पक्षी रहते थे। वहीं एक कोयल भी रहती थी। वह बड़ी शैतान थी। उसे सबको तंग करने में बड़ा मजा आता था। किसी को यह बात पसंद नहीं थी, इसलिए सब उसे शैतानी करने से मना करते, पर वह नहीं मानती थी। उसकी शैतानी के कुछ उदाहरण जैसे एक दिन की बात है, दो चिड़ियां बैठी आपस में बात कर रही थीं। कोयल आकर उनके पास बैठ गई और बोली, ‘क्या कर रही हो?’

‘हम गप्पें कर रहे हैं।’
‘अच्छा, तुम दोनों यहां बैठी गप्पें कर रही हो। वहां देखो, सब दावत उड़ा रहे हैं।’
‘कैसी दावत? हमें भी बताओ, ताकि हम भी दावत का मजा ले सकें।’
‘वह गेहूं का गोदाम है न, वहां से गेहूं बाजार जा रहा है। तो बोरों को उठाते-रखते गेहूं गिर रहा है। बस, सबके मजे हो गए हैं।’
चलो चलो- चिड़ियां तुरंत तैयार हो गर्इं। जब तीनों गोदाम पर पहुंचीं तो गोदाम के दरवाजे पर बड़ा-सा ताला पड़ा मुंह चिढ़ा रहा था।
‘यह क्या है कोयल?’ चिड़िया गुस्से से बोली।
‘बुद्धू बनाया बड़ा मजा आया’, बोल कर कोयल ताली बजाती हंसती-हंसती फुर्र हो गई।
दोनों चिड़ियां खिसिया गर्इं- यह क्या तरीका है। दोनों उसे कुछ भला-बुरा बोल पातीं उसके पहले ही कोयल यह जा वह जा।
एक दिन बंदर बैठा फलाहार कर रहा था। कोयल इतराती आई- ‘ऐ बंदर भाई, तू यहां फल खाने में व्यस्त है। सामने से शेर आ रहा है।’
हे भगवान! बंदर हड़बड़ा गया। क्या करूं, कहां जाऊं! वह हड़बडाहट में पेड़ से गिरा धम्म से और उसे चोट लग गई। कहां है शेर- कहते-कहते वह रोने लगा।
कोयल ही ही करते हुए हंसने लगी और बोली- ‘बुद्धू बनाया बड़ा मजा आया।’
बंदर को बहुत गुस्सा आया, पर उसका गुस्सा देखने से पहले ही कोयल फुर्र हो गई।
कोयल की ये हरकतें किसी को पसंद नहीं आ रही थीं। वह हर किसी को इसी तरह बुद्धू बना रही थी, पर करें तो क्या करें।
एक दिन तो कोयल ने हद ही कर दी। राजा शेर को जाकर बोल दिया- ‘महाराज, दूसरे जंगल के शेर ने हमारे जंगल पर हमला बोल दिया हैं। आप सावधान हो जाइए!’

शेर घबरा गया अब क्या करें! वह चिंता में पड़ गया और चिंता के कारण बेहोश् हो गया।
शेरनी भी बहुत घबरा गई। कोयल दूर से चिल्लाई- ‘बुद्धू बनाया बड़ा मजा आया।’
वन में सबको जब यह बात पता चली तो सबने कोयल को बहुत भला-बुरा कहा। सबको लगा, अब तो अति हो गई। यह कोयल महाराज को भी तंग करने लगी है। उनसे भी नहीं डरती है।
‘हां यह सच है। इसके मन से डर ही खत्म हो गया है, जो राजा को भी बुद्धू बनाने लगी है।’ सब सोचने लगे कि कैसे इसको सबक सिखाएं।
एक दिन कौए ने सबको एक योजना समझाई और तोते को यह काम सौंपा कि वह योजनानुसार काम करे।
तोता मौके की तलाश में रहने लगा। एक दिन कोयल जैसे ही उसके पास आई कि उसे बुद्धू बनाएगी। वह कुछ कह पाती, इससे पहले ही तोता बोला- ‘हाय कोयल, आज तो गजब ही हो गया! कौए को ऐसा नहीं करना था।’
‘क्या हुआ, कौए ने क्या किया है?’

‘तुम तो उस पर बड़ा विश्वास करती हो, पर वह इतना बड़ा विश्वासघात करेगा, हमने कभी सोचा न था।’
‘क्या हुआ, कौए ने ऐसा क्या कर दिया, कुछ बताओगे या फिर पहेलियां बुझाते रहोगे?’
‘सुनो, कौए ने तुम्हारे अंडे पहचान लिए हैं और उन्हें अपने घोंसले से बाहर फेंक दिया है। कुछ तो टूट गए और कुछ वहीं पड़े हैं।’
‘हे भगवान, कौए ने यह क्या किया, हाय! मेरे अंडे…’ कह कर कोयल रोने लगी।
‘अब जाओ, जाकर खुद देख लो।’
कोयल फुर्र उड़ी और कौए के घोंसले पर पहुंची, तो वहां सब बैठे थे। उसे देख ही ही करके सब हंसने लगे।
कोयल गुस्से से बोली- मेरे अंडे फेंक कर सबको बड़ी हंसी आ रही है।
सब एक साथ बोले- ‘बुद्धू बनाया बड़ा मजा आया।’
‘तो, तोते ने मुझसे झूठ बोला!’
कौवा बोला- ‘और तुम रोज क्या करती हो? आज जब वही तुम्हारे साथ हुआ, तब दर्द समझ में आया है!’
कोयल का सिर शर्म से झुक गया, क्योंकि उसके अंडे सुरक्षित थे।