सरिता कुमारी

वे घर के पीछे बरामदे में उदास बैठी थीं। सोच रहीं थीं, नाम तो शांति है पर क्यों यही बार-बार खो जाती है। हर बार कुछ न कुछ ऐसा घट जाता है कि वे निराश हो जाती हैं।
सामने बिखरे पीलेपन पर फिर उनकी नजर गई और उदासी मन को अवसाद के रंग में रंग गई। वे चुपचाप सामने मरणासन्न अपने दिल के टुकड़े को देख रही थीं। पीला, मुरझाया, अचानक न जाने क्या हो गया था उसे। लगभग सारे पत्ते कुम्हला कर झड़ चुके थे और कोई कुछ नहीं कर पाया था। अच्छा-भला स्वस्थ था। तीन-चार साल में ही कैसा लंबा-चौड़ा निकल आया था कि वे खुद अब उसके आगे नन्ही गुड़िया जैसी दिखती थीं। जब पहली बार इस नन्ही जान को लाकर अपने छोटे, पर हरे-भरे बाग में रोपा था तो मानो साथ का हर पेड़-पौधा किलक उठा था। ऐसा सचमुच था या शांति के मन के आह्लाद से विह्वल तार हर ओर बज कर उन्हें बस यही धुन सुना रहे थे, विश्वास की, स्नेह की, सुंदर-सुनहले भविष्य की। एक दिन बड़ा होगा यह, खूब बड़ा। इसका हरा-भरा तन कितनों का सुंदर घर बनेगा। इसके फूल आत्मा महकाएंगे और फल जीवन ज्योति जगाएंगे। उसके कोमल-कोमल किसलय को सहलाती वे आत्मविभोर थीं यह सोच कर कि यह आम का पौधा उनके बाग का सबसे अनमोल रत्न होगा एक दिन।

कितना अरमान था उन्हें कि एक आम का भी खूबसूरत पेड़ हो उनकी हरी-भरी दुनिया में। अचानक कैसे उनका बरसों का सपना पूरा हो गया था बस ऐसे ही। सावन की हरियाली में यह बस ऐसे ही उग आया था सड़क के किनारे गीली-गीली मिट्टी में। उनकी नजर उस पर पड़ गई थी। सड़क किनारे पड़ी आम की गुठली से सावन का अमृत पीते ही जाग उठा था।
शांति को अपने बचपन के दिन बरबस याद हो आए थे, जब वे बच्चे ऐसे अनायास ही उग आए आम के पौधों को निर्ममता से सिर्फ इसलिए उखाड़ लेते थे कि उसकी अंकुराई गुठली को घिस कर बाजा बना कर पीं-पीं बजा सकें। शांति ने अपने बचपन की ऐसी कारगुजारियों के लिए मन ही मन माफी मांगी और बड़ी नजाकत से उस नन्हे पौधे को लाकर अपने घर के पीछे बाग में रोप दिया था। उसे रोज पानी देतीं, सारी व्यस्तताओं के बीच भी समय निकाल कर उससे ढेरों बातें करतीं। प्यार से वे उसे चंचल बुलाने लगीं थीं, क्योंकि उन्हें न जाने क्यों लगता कि वह उन्हें देखते ही हिलने-डुलने लगता था। उसकी पत्तियां सरसरातीं और कोमल डालें उन्हें पास पाकर लचक-लचक जातीं। चंचल था वह, बहुत चंचल, बिल्कुल उनके चंचल की तरह।

‘सुबह से यहां बैठी-बैठी क्या सोच रही हो?’ माधव ने पूछा।
‘आं….क… कुछ नहीं!’ उन्होंने चौंकते हुए जवाब दिया था। माधव का यह सवाल उन्हें मन की दुनिया से स्थूल दुनिया में खींच लाया। ‘क्या सोचूंगी अब? अपना सोचा होता ही कब है?’ मन की उदासी शब्दों में उतर आई थी।
‘आज छुट्टी है तो मुझे लगा कुछ स्पेशल नाश्ता मिलेगा इस नाचीज को अपनी सुघड़ पत्नी के हाथों का बना।’ सब समझते हुए भी माधव बात बदलना चाहते थे। शांति का उदास घबराया चेहरा उनका भी सीना चाक किए रहता था। वे तो बाग की तरफ नजर उठा कर देखना भी नहीं चाहते थे।
‘क्या खाएंगे, बताइए तो जल्दी से बना देती हूं… सुबह से इन बातों पर ध्यान ही नहीं गया।’ शांति झेंपते हुए बोलीं।
आज कॉलेज की छुट्टी थी। हमेशा से वे छुट्टी वाले दिन अपने हाथ से कुछ विशेष बना कर खिलातीं थीं अपने परिवार को। उन्हें बहुत अच्छा लगता था, नहीं तो घर, कॉलेज की भागदौड़ में यह जिम्मेदारी घर पर काम करने वाली के जिम्मे ही रहती थी। बेटा तो घर की दहलीज पार कर पढ़ाई-लिखाई, नौकरी के सिलसिले में कब का बाहर निकल चुका था। घर पर वे दोनों ही बचे थे अब।
वे किचन में खड़ी सोच ही रहीं थीं कि माधव किचन में चले आए, जैसे उसके मन का दर्द उन्हें भी कहीं चैन नहीं लेने दे रहा था। ‘मैं कुछ मदद करूं?’
वे मुस्करा दीं और बदले में पूछ बैठीं, ‘क्या कह रहे थे अमर? क्या कोई भी उपाय नहीं, जिससे चंचल बच जाए!’
शांति के इस सवाल पर माधव ने बेबसी में सिर हिलाते हुए कहा, ‘तुम्हें क्या लगता है, अगर कोई उपाय होता तो अमर हमारे कुछ कहने की प्रतीक्षा करता?’
शांति की पल भर को आशा से चमकती आंखें भक से फिर बुझ गर्इं और वे हताश किचन की खिड़की से अलविदा कहते अपने लाड़ले को निहारने लगीं।
अमर उनके साथ ही कॉलेज में वनस्पति विज्ञान के प्रोफेसर हैं। वनस्पति विज्ञान पर उनके अनगिनत शोधपत्र देश-विदेश की प्रतिष्ठित जर्नल्स में छप चुके हैं। माधव और शांति के वे बहुत पुराने, गहरे मित्र हैं। उनके हर सुख-दुख के साथी। शांति और माधव की नन्ही-सी बगिया के हर पेड़-पौधे से वे भली-भांति परिचित हैं। इनके बारे में उन्हें बातें करते कोई अनजान अगर सुन ले तो शायद समझ ही न पाए कि वे पेड़-पौधों की बातें कर रहे हैं या जीते-जागते मनुष्यों की।
चंचल का असमय जीवन से अलगाव उनके जीवन भर के वनस्पति विज्ञान के गहरे ज्ञान पर पीड़ादायक करारा प्रहार था। मिट्टी से लेकर, छाल-पत्ते हर संभावित बात की गहरी जांच परख करने-कराने के बाद भी वे समझ नहीं पा रहे कि अच्छा-खासा स्वस्थ आम का पौधा आखिर अचानक सूखने कैसे लगा? शांति के दर्द से भीगे सवालों का जवाब है ही नहीं उनके पास। अपने मरते हुए बच्चे को देखने की पीड़ा वे शांति और माधव की आंखों में सहन नहीं कर पा रहे थे। आजकल उनके मन में बस यही विचार जलता-बुझता रहता कि मनुष्य खुद को कितना भी विद्वान और ज्ञानी क्यों न समझ ले, पर सच तो यह है कि वे कुदरत के सामने अबोध शिशु ही है।
एक समय जब शांति और माधव दर्द की अथाह नदी में डूब-उतरा रहे थे तब अमर ने उन्हें इन्हीं पेड़-पौधों के प्यार-दुलार में जीवन के अमृतमयी रस का रास्ता सुझाया था।
हुआ यह था कि करीब पंद्रह बरस पहले शांति और माधव के जुड़वा बेटे अपने विद्यालय की ओर से पास ही के एक हिल स्टेशन पर पिकनिक मनाने गए थे। शांति ने अलसुबह उठ कर उनकी पसंद का ढेरों सामान बनाया था कि बच्चे मिल-बांट कर खूब खाएंगे, मस्ती करेंगे।

उस दिन हंसती-खिलखिलाती सुबह की शुरुआत शाम को जलजला बन कर लौटी थी। पिकनिक से आते समय बच्चों से भरी बस एक पहाड़ी मोड़ पर संतुलन खोकर नीचे नदी में गिर गई थी। उस दुर्घटना में उनका बेटा चंचल हमेशा के लिए खो गया था। कुदरत का चमत्कार ही था कि चंचल का जुड़वा राघव न जाने कैसे बस की खिड़की से छिटक कर पहाड़ की ढलान में एक पेड़ में उलझ कर अटक गया था। लोग बताते हैं कि पेड़ की लचीली डालियों में उलझा वह ऐसे बेहोश पड़ा था, जैसे मां की गोद में मीठी नींद सो रहा हो। उसी की तरह कुछ और बच्चे न जाने कैसे पेड़ों में उलझ कर बच गए थे, पर उनका चंचल इतना भाग्यशाली नहीं था। पहाड़ी नदी के तेज बहाव में कई अबोध जीवन बह गए थे, उनका चंचल भी।
इस हादसे ने शांति और माधव को बुरी तरह तोड़ दिया था। उनके नासूर से टपकते घाव पर अमर ने मलहम लगाते हुए एक बार कहा था, ‘अपने राघव को जीवनदान तो पेड़ की डालियों ने दिया है। चंचल भी खोया नहीं है, पेड़ की डालियों में पुकार रहा है। नए पौधे लगाओ, उन्हें पालो, देखो एक नहीं सैकड़ों चंचल तुम्हारे आसपास खिलखिलाएंगे।’
शांति और माधव के दिल में अमर की यह बात इतना गहरा असर कर गई कि साल भर के अंदर उनके घर के पीछे की जमीन पेड़-पौधों से गुलजार हो गई थी। शांति को तो बागवानी पहले से पसंद थी, पर इन सब से उदासीन रहने वाले माधव भी अब फूल-पौंधों में रच-बस गए थे। अब वे दोनों सैकड़ों चंचल पाल रहे थे और उनकी अठखेलियों में जीवन का अमृत-रस घूंट-घूंट पी रहे थे। आस-पड़ोस हर जगह वे उपहार में मौके-बेमौके पौधे ही देते थे।

चंचल नाम उन्होंने अब तक सिर्फ इस आम के पौधे को दिया था। शांति को बेइंतहा लगाव था इससे। उन्हें न जाने क्यों अपने बेटे चंचल की झलक मिलती थी इसमें। कभी-कभी अपनी इस विचित्र भावना पर वे स्वयं बहुत हैरान होती थीं, पर इस पर यकीन न करने का कोई कारण उन्हें समझ में नहीं आता था।
अब फिर कुदरत की अबूझ माया एक नया खेल खेल रही थी, उनका यह चंचल भी उन्हें छोड़ कर जा रहा था। फिर से किसी को समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर क्यों?
दिन ढला, रात हुई, पर शांति की आंखों में नींद का नामो-निशान नहीं। अचानक भोर की बेला में उनके जेहन में एक विचित्र भाव पनपा और वे चौंक कर झटके से उठ बैठीं।
‘क्या हुआ, ऐसे बुरी तरह चौंक कर क्यों उठ गर्इं? कोई बुरा सपना देखा क्या?’ चिंतित माधव पूछ रहे थे।
‘जिन आंखों में नींद ही नहीं, उनमें सपना कहां से उतरेगा?’ शांति ने बेचारगी से कहा।
‘फिर? क्या बात है बताओ न?’
‘माधव आप भौतिक विज्ञान के प्रोफेसर हैं, शायद आपको मेरी बात बहुत अजीब लगे, पर इस नई सुबह के साथ यह बात बड़ी संजीदगी से जेहन में उतरी है।’
‘पर क्या बताओ तो?’ माधव अधीर हो रहे थे।
‘माधव, आपने ध्यान दिया कि जिस रात अपने राघव के रेल दुर्घटना में बाल-बाल बचने की खबर मिली थी, उसके बाद से ही अपना हरा-भरा, एकदम स्वस्थ चंचल अचानक सूखने लगा? मां कहती थीं ये मूक पेड़-पौधे चेतना के जिस स्तर पर समझते-बूझते हैं इंसान उसकी थाह भी नहीं पा सकते… शायद सच ही है… हम मानें न मानें क्या फर्क पड़ता है!’ शांति ने झिझकते हुए अपने घुटते मन की खिड़की खोली।
माधव शांति की बात सुन कर गहरी सोच में डूब गए। इन दोनों बातों में कोई संबंध भी हो सकता है, वे मान नहीं पा रहे थे, पर शांति की बात में सच्चाई थी। ऐसा ही हुआ था। तो क्या सचमुच यह निर्दोष आम का पेड़ उनके राघव के लिए… खुद को… ओह क्या सचमुच ऐसा होता है?’ वे अवाक थे। उन्होंने कुछ कहने कि लिए चेहरा उठाया तो देखा शांति कमरे में नहीं थीं।
बाहर बाग में आकर देखा तो उनकी आंखें छलक पड़ीं। शांति सूख कर ठूंठ हो चुके चंचल के तने से लिपट कर मुस्करा रहीं थीं। उनकी आंखों में कृतज्ञता के बड़े-बड़े मोती तैर रहे थे। धीरे-धीरे वे कुछ ढंूढती-सी सूखे पेड़ की जड़ों के पास बैठ गई थीं। अचानक वे उत्साह से लबरेज आवाज में उन्हें पुकार रहीं थीं। पास जाकर उन्होंने जो देखा वह उन्हें बुरी तरह हैरान कर गया। एक नन्हा आम का पौधा सूखी जड़ों के पास फूट रहा था।
‘यह यहां कब… कैसे आया?’ उन्होंने अटकते हुए पूछा।
‘पता नहीं।’ शांति ने बेहद संतुलित आवाज में जवाब दिया।
माधव ने देखा, उगते सूरज की सुरमई रोशनी में शांति के चेहरे पर अगाध वात्सल्य और सुकून झिलमिला रहा था। उसकी मुलायम अगुंलियां उस नवांकुर को कोमलता से सहला रहीं थीं। ०