इटली में एक गांव था मोराजा। गांव हजारों साल पुराना था। उसी गांव में रहती थी बहुत ही शरारती मैनियो। मैनियो की मम्मी उसको बार-बार समझाती रहती थीं कि जरा संभल कर रहा करो। इतनी शैतानी भी अच्छी बात नहीं है। मगर वह तो अपनी धुन में मगन रहती थी। एक बार तितलियों और भंवरों का पीछा करते-करते मैनियो काफी दूर निकल गई। जब उसके कदम जरा ठिठक गए, तो उसने गौर से देखा कि यह कोई नई जगह है। आसपास चट्टानें थीं और कंकड़ बिखरे हुए थे।
अब जैसी कि मैनियो की आदत थी, उसने कुछ कंकड़ बीन कर हथेली में भर लिए, और चट्टानों पर एक एक करके कंकड़ फेंकने शुरू कर दिए। तभी एक कंकड़ वहां चट्टान पर आराम कर रही बिल्ली के सिर पर लग गया। बिल्ली सकपकाई और गुर्राने लगी। बिल्ली ने आंखें लाल करके मैनियो की तरफ घूरना शुरू किया। मैनियो डर गई। डर के मारे उसे लगा कि जैसे वह बिल्ली एक चुड़ैल बन गई है। चुड़ैल को देख कर मैनियो घबरा गई और वहां से भागने लगी। मगर चुडैल ने उसको एक कंकड़ बना दिया।
कंकड़ बन कर मैनियो बहुत डर गई। उसको अपनी मम्मी और पापा बार-बार याद आने लगे। वह दहाड़ें मार-मार कर रोने लगी। मगर चुड़ैल का दिल नहीं पिघला। वह अट्टाहास करती हुई वहां से चली गई। मैनियो काफी देर तक यों ही पड़ी रही। चुड़ैल के जाते ही एक कबूतर आया और कंकड़ बनी हुई मैनियो के कान में कुछ कहने लगा। मैनियो पहले ही इतनी डरी हुई थी कि कबूतर को देख कर लुढ़कने लगी। कबूतर फिर उसके पास आकर बोला, ‘अरे, मैं दोस्त हूं, डरो नहीं। चुड़ैल अब कल सुबह तक यहां नहीं आने वाली। वह चमगादड़ों की कॉलोनी में चली गई है। रात भर वहीं रहेगी।’
यह सुन कर मैनियो की जान में जान आई।
‘मैं हर शाम को तुम्हें वापस पहले जैसी लड़की बना सकता हूं, मगर सुबह होते ही अपने आप तुम कंकड़ बन जाओगी।’ ‘ओह, अच्छा!’ मैनियो ने एक लंबी सांस भरी ही थी कि वह वापस मैनियो बन गई। वह निश्शब्द हो गई और कबूतर को अपना सिर झुका कर बार-बार शुक्रिया अदा करने लगी। कबूतर ने गर्दन मटका कर उसके धन्यवाद का जवाब दिया। उसके बाद मैनियो ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। वह लगातार दौड़ती गई और अपने घर पहुंच गई। घर पर मम्मी बहुत परेशान थी। पापा तीन दिनों के लिए दौरे पर गए हुए थे।
मैनियो मम्मी से लिपट गई और रोने लगी। उसने रोते-रोते मम्मी को पूरी कहानी सुना दी। मम्मी को बहुत अजीब-सा लगा। खैर! वो मैनियो के लिए खाना परोस कर ले आर्इं। मैनियो ने भरपेट खाना खाया और गहरी नींद मे सो गई। अगले दिन स्कूल की छुट्टी थी और मैनियो को मम्मी ने नहीं जगाया। सुबह बहुत देर बाद मैनियो खुद ही जाग गई, मगर वह बिल्कुल वैसी की वैसी ही थी। मैनियो ने अपने हाथ पैर बार-बार छूकर देखे। वह मन ही मन बहुत हैरान थी।
वह भाग कर मम्मी के पास गई और गिड़गिड़ा कर बोली, ‘मम्मी आज सारे काम छोड़ कर मुझे उसी चट्टान पर ले चलो, वरना कबूतर की शामत आ जाएगी।’ मम्मी ने उसको खूब प्यार किया। पहले उसे गरम दूध पिलाया और चट से उसके साथ चल दी। चलते-चलते वे दोनों उस चट्टान के पास पहुंच गर्इं। मैनियो ने वह जगह पहचान ली। अब वह कंकड़ बनने को तैयार थी। मगर न तो कोई कबूतर आया और न ही वह कंकड़ बनी थी। मैनियो अब खुद चल कर उस चट्टान पर जा पहुंची। मम्मी भी उसके पीछे-पीछे चली आई।
वहां पर कुछ महिलाएं जंगली घास काट रही थीं। मैनियो को देख कर वे मुस्कराने लगीं। मैनियो को अजीब लगा, तो हंसती हुई एक महिला कहने लगी, ‘कल भी यह बच्ची यहां पर दौड़ते-दौड़ते थक गई और बिल्ली के पास ही गहरी नींद में सो गई। फिर खुद ही उठ कर चली गई।’ ‘कल क्या हो गया था, जो नींद में ही बड़बड़ा कर जागी और उठ कर भाग गई?’ ओह, अब समझ में आया। मैनियो मन ही मन सोचने लगी। मम्मी ने सभी महिलाओं का धन्यवाद किया और फिर दोनों वापस घर लौट चलीं। लौटते हुए मैनियो के चेहरे पर बहुत खुशी थी। रास्ते में रामू काका का ढाबा था। मम्मी ने मैनियो को आलू का गरम-गरम परांठा खिलाया।
