एक लंबे अंतराल के बाद जब मुझे डेरोथी का पत्र मिला, तो मैं बहुत खुश हुआ। उसने मुझे अपने बेटे गोल्डी के जन्मदिन पर बुलाया था। पत्र पढ़ते हुए बीती बातें मेरे मन मस्तिष्क पर किसी हथौड़े की तरह चोट करने लगी थी। डेरोथी… मैं बड़बड़ाया। मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि डेरोथी इतनी बड़ी हो चुकी होगी। मैं बक्से में रखी पुरानी तस्वीरों में डेरोथी की तस्वीर ढूंढ़ने लगा, तो मुझे उसकी तस्वीर मिल गई। यह तस्वीर उस वक्त की थी, जब वह तीसरी कक्षा में पढ़ती थी। अपनी पीठ पर भारी बस्ता लिए वह बस स्टैंड पर आकर मुझे कहती, ‘नमस्ते अंकल।’
‘नमस्ते बिटिया, कैसी हो?’
‘अच्छी हूं अंकल।’
वह मुझे अंकल कहती और मैं उसे बेटी कह कर बुलाता। हम दोनों एक ही बस में जाते। मैं दिल्ली गेट तक जाता और वह घौलाकुआं में उतर जाती।
कभी-कभी ऐसा भी होता जब डेरोथी मुझे दिखाई नहीं देती। तब मैं उसके इंतजार में अपनी पहली बस छोड़ देता। उसके बाद भी जब डेरोथी नहीं आती तब मैं दूसरी बस पकड़ता और आॅफिस पहुंचता। देर से पहुंचने पर मुझे बॉस की डांट सुननी पड़ती। सारे दिन मैं आॅफिस में यह सोचते हुए बेचैन रहता कि डेरोथी क्यों नहीं आई होगी? लेकिन कभी-कभी पहली बस छूटने के बाद जब वह आती तो मैं कहता, ‘बस निकल गई है बिटिया।’
‘आज देर हो गई अंकल।’
‘कैसे…?’
‘होेमवर्क ज्यादा मिला था। रात देर से सोई।’
मैं उसकी बातें सुन कर मुस्कराने लगता। उसका गोल-गोल गोरा चेहरा बहुत प्यारा था। उसकी पलकें बोझिल और हमेशा झुकी-झुकी सी रहतीं। बातें करते वक्त वह बात-बात पर अपने हाथों को हिलाते हुए अपनी भौहें मटकाया करती।
रोज जिस बस में हम जाते उस बस में सवारियों के साथ-साथ बहुत सारे स्कूली बच्चे भी होते थे, जिनमें से ज्यादातर बच्चे पालम मोड़ से आगे जयजवान सिनेमा के स्टैंड पर उतर जाते, जबकि डेरोथी घौलाकुआं में उतर जाती।
मुझे वह दिन आज भी अच्छी तरह याद है जब ड्राइवर ने बस को स्टैंड से काफी दूर ले जाकर रोका, तो सवारियां बस के पीछे दौड़ पड़ीं। पीठ पर भारी-भरकम बस्ता होने के कारण डेरोथी दौड़ नहीं पा रही थी। सबसे पीछे होने के कारण वह दरवाजे के पायदान पर ही रह गई।
‘अंकल आगे निकलो, मैं गिर जाऊंगी।’ उसने अपने से आगे खड़े एक मोटे आदमी से कहा।
‘आगे जगह नहीं है।’ उस व्यक्ति ने दो टूक शब्दों में कहा।
डेरोथी चुप हो गई। मैंने उसे दरवाजे के अंतिम पायदान पर भयभीत खड़े देख कर अंदाजा लगा लिया था कि वह किसी भी समय बस से गिर सकती है। इसलिए मैंने उसके साथ ही पायदान पर अपना एक पैर जमाते हुए डेरोथी से आगे खड़े आदमी से कहा, ‘भाई साहब, आपके पीछे बच्ची खड़ी है, आगे बढ़ो…।’
‘आगे जगह नहीं है। बच्ची का इतना ही ध्यान है तो स्कूली बस क्यों नहीं लगा लेता?’
‘सरकार ने भी तो यह बस लगाई है? चल, आगे निकल…।’ कहते हुए मैंने अपना दूसरा पैर मोटे के पैर के ऊपर रख दिया।
‘पैर हटा…।’ उसने अपने पैरों की ओर देखने की कोशिश करते हुए कहा।
‘अब क्या हो गया…? तेरे जूते का फीता खुल गया या फिर कोई कनखजूरा तेरी जुराब के अंदर चला गया?’
वह चुप रहा। ड्राइवर बस को बड़ी तेजी से भगा कर ले जा रहा था। एकाएक बस स्पीडब्रेकर पर बड़ी तेजी से उछली, तो डेरोथी गिरते-गिरते बची। जैसे ही वह फिसली, मैंने उसे अपने दोनों पैरों से जकड़ते हुए एक हाथ से उसका एक हाथ कस कर पकड़ लिया था।
‘अंकल मुझे बचाओ…।’ याचना तथा भयभीत स्वर में वह बोली।
‘रोको…लड़की गिर गई है।’ मैं जोर से चिल्लाया। मेरे चिल्लाने के साथ ही डेरोथी के आगे खड़ा वह मोटा भी चिल्लाते हुए बोला, ‘बस रोक ओय, लड़की गिर गई है, रोक स्साले…।’
ड्राइवर ने जैसे ही बस रोकी, मैंने डेरोथी को बस से नीचे उतारते हुए कहा, ‘चोट तो नहीं लगी बिटिया?’
वह रोने लगी। बस के पायदान पर फिसलने से उसकी पीठ पर चोट लग गई थी। क्योंकि उसकी वर्दी पर खूने के धब्बे साफ नजर आ रहे थे।
‘क्यों बे, मरणे का इरादा है के? बालिका ने ले के तू इस भीड़ वाली बस में चढ़े है, के चावे तू…? भाई रे गजब हो ग्या था, बालिका गिर गी थी। अरे तन्ने दिखाई ना दिया के? दूसरी में आ जाता। और तन्ने भी शरम कोई ना रे मोटे, बालिका ने अपणे से आगे क्यों ना की तन्ने? अगर छोरी गिर जाती तो?…’ ड्राइवर गुस्से में जोर-जोर से चिल्लाते हुए बोला, ‘ऐ छोरी, घणी चोट तो ना लगी तन्ने?’
तभी कुछ लोगों ने मुझे समझाते हुए कहा, ‘इतनी भीड़ में आप लड़की को लेकर क्यों चढ़े थे भाई साहब? अगर बच्ची को कुछ हो जाता, तो आप घर पर अपनी पत्नी को क्या जवाब देते?’
‘अरे, चल कौन समझाए ऐ ने। खुद तो गलती करे सै, और कहे सै कि ड्राइवर ने बस चलाणी ना आवै सै।’
‘क्यों, तुझे बस चलानी आती है क्या? इतनी तेज क्यों दौड़ा रहा है।’ किसी ने कहा।
‘बस ठीक से चला ले भाई, तू तो बस को इस तरह भगा रहा है जैसे तूने रेलवे स्टेशन पर बस खड़ी करके राजधानी एक्सप्रेस पकड़नी है।’
‘अरे यार बस की बोनट पर वो बैठी है न। रोज ही वह बस के बोनट पर बैठ कर आईटीओ तक गप्पे लड़ाती हुई जाती है।’ एक आदमी ने अपनी सीट पर बैठे-बैठै कहा।
‘कौन है बे?… काण पे मारूंगा साले के।’ कहते हुए ड्राइवर बस लेकर निकला, तो मैंने डेरोथी से कहा, ‘बिटिया, चोट ज्यादा लगी है?’
‘उसने रुआंसी आवाज में कहा, ‘मेरी पीठ में दर्द हो रहा है।’
मैंने उसका बस्ता पकड़ा और उसे डाक्टर के पास ले जाकर उसकी मरहम-पट्टी करवाने के बाद उसे छोड़ने उसके घर जाने लगा तो मन में बार-बार एक ही सवाल उठता कि कहीं उसके घर वाले मेरे प्रति कोई गलत बात न सोचें। वैसे भी आजकल इस तरह से किसी बच्ची के घर जाना खतरे से खाली नहीं है। कई बार आप किसी की मदद करना चाहते हैं, लेकिन लोगों की गलत सोच आपको थाने के चक्कर लगवा देती है। शायद यही कारण है कि आजकल सड़कों पर होने वाली दुर्घटनाओं को देखते हुए भी लोग अनदेखा कर जाते हैं। ऐसा लगता है जैसे कि आजकल किसी की मदद करना या फिर किसी को सड़क के किनारे से उठा कर अस्पताल पहुंचाना पुण्य नहीं, बल्कि कोई भयंकर अपराध हो। अगर डेरोथी बस से गिर जाती या उसे कुछ हो जाता तो? बार-बार मन में यही खयाल आर रहा था।
मैं डेरोथी के साथ उसके घर पहुंचा, तो उसकी मम्मी दरवाजे के पास ही खड़ी थी। डेरोथी के एक हाथ में पट्टी देख कर उसने घबराए स्वर में कहा, ‘क्या हुआ डेरोथी, तेरे हाथ में ये चोट कैसे लगी, और ये तेरे साथ?…’ उसने डेरोथी से एक ही बार में कई प्रश्न कर डाले।
‘मम्मी मैं गिर गई थी।’
‘ज्यादा चोट तो नहीं लगी?’
‘नहीं मम्मी। अगर आज अंकल न होते तो मैं बस से गिर गई होती। अंकल ने ही डाक्टर के पास ले जाकर मेरी मरहम-पट्टी करवाई है।’
‘अंदर आइए न…?’ उसने दरवाजे से एक ओर हटते हुए कहा। मेरे सामने कुर्सी रखी और पानी का गिलास मुझे पकड़ाते हुए कहा, ‘मरहम-पट्टी पर कितना खर्चा आया?’
‘रहने दीजिए।’
‘मम्मी डाक्टर ने अंकल से पचास रुपए लिए।’
रूमाल के कोने पर बंधी गांठ खोल कर उसने पचास रुपए का नोट मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘लीजिए…।’
‘इसकी जरूरत नहीं है।’
‘क्यों…?’
‘ये रुपए डेरोथी से बढ़ कर नहीं हैं।’
‘नहीं, आपको ये रुपए तो लेने ही पड़ेंगे।’ कहते हुए उसके चेहरे पर एक जबर्दस्त खिंचाव आ गया था। जैसे ही मैंने उसके हाथ से पचास का नोट लिया उसने कहा, ‘जब तक डेरोथी घर नहीं पहुंचती है, तब तक मैं बहुत डरी-सहमी रहती हूं। इसके पापा होते तो…।’ कहकर वह चुप हो गई थी।
‘पापा नहीं हैं।’ डेराथी बीच में ही बोल पड़ी थी।
‘क्या हो गया था उन्हें?’ मैंने चाय का घूंट भरते हुए पूछा।
‘कुछ भी नहीं, रात को खाना खाकर सोए तो फिर उठे ही नहीं।’
चाय का कप खाली करने के बाद मैं उठ खड़ा हुआ था। डेरोथी की मां ने दरवाजे के पास आकर अपने हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘डेरोथी को बचाने के लिए आपका शुक्रिया।’
अगले दिन से डेरोथी फिर स्कूल जाने लगी थी। एक दिन डेरोथी ने मुझसे कहा, ‘अंकल मैं आपके घर चलूंगी।’
मैंने एक बार उसके चेहरे की ओर देखा। मन में खयाल आया, डेरोथी को घर आने के लिए साफ मना कर दूं, क्या करेगी वह मेरे कमरे पर आकर? घर में अगर मेरी पत्नी होती तो मैं उसे आने के लिए खुद ही कह देता। वैसे भी अगर मैं डेरोथी को अपने साथ अपने कमरे में ले जाता हूं, तो आस-पड़ोस वाले क्या सोचेंगे? पता नहीं लोग बिना सोचे-समझे मेरे बारे में क्या कहेंगे? शायद कहेंगे कि यह लड़की कौन है, जिसे यह अपने साथ लाया है। फिर भी मैंने कहा, ‘चलो बिटिया…।’
वह खुशी-खुशी मेरे साथ चल पड़ी थी। मेरे कमरे की हालात देख कर वह बोली, ‘अंकल, आपने झाड़ू कबसे नहीं लगाई?’
‘पता नहीं बिटिया।’
उसने दरवाजे के पास रखा झाड़ू उठाई और कमरे में झाड़ू लगाने लगी। कमरे में जगह-जगह बीड़ी और सिगरेट के टुकड़े बिखरे पड़े थे। डिब्बे जगह-जगह फैले हुए थे। सुबह के जूठे चाय के बर्तनों पर चीटियां रेंग रही थीं।
झाड़ू लगाने के बाद वह कमरे की छोटी-मोटी चीजों को करीने से सजाने लगी। मैं चुपचाप काम में लीन उस नन्ही बच्ची को देखता रहा।
‘अंकल, बर्तन धो दूं?’
‘नहीं बिटिया।’
‘आप चिंता मत करो अंकल, मैं धो दूंगी।’
‘अपने घर में भी बर्तन धोती हो बिटिया?’
‘हां अंकल, लेकिन कांच के बर्तन नहीं धोती।’
‘क्यों?’
‘क्योंकि कांच के बर्तन मेरे हाथों से फिसल जाते हैं। एक बार कांच के गिलास धोते समय मेरे से कांच का गिलास टूट गया था। मेरे हाथ से खून बहने लगा। तबसे मां मुझे कांच के बर्तन नहीं धोने देती।’
‘जब मैं तुम्हारे साथ तुम्हारे घर में आया था तो तुम्हारी मां ने मेरे बारे में कुछ कहा था?’
‘हां…।’
‘क्या कहा था?’
‘कह रही थी, तुम्हारे अंकल बहुत अच्छे हैं।’
‘और…?’
‘कह रही थी, उन्हें अब कभी फिर से घर मत लाना।’
‘क्यों…?’
‘जब मां ने मेरे गिरने से लेकर आपका मेरे साथ घर पर आने की बातें जोजफ अंकल को बताई तो जोजफ अंकल बहुत गुस्सा हुए थे।’
‘ये जोजफ कौन हैं बिटिया?’
‘वे हमारे घर में आकर रात को ठहरते हैं। मां कहती है कि वे हमारे दूर के रिश्तेदार हैं, और तुम्हारे अंकल लगते हैं। जब वे आते हैं, मम्मी उनके साथ हंस-हंस कर बातें करती है। जोजफ अंकल मम्मी को रुपए भी देते हैं।’
‘तुम्हें जोजफ अंकल कैसे लगते हैं बिटिया?’
‘जब वे मम्मी को रुपए देते हैं तो वे अच्छे लगते हैं, लेकिन जब वे मम्मी के साथ जोर-जोर से हंसते हुए बातें करते हैं तो बहुत बुरे लगते हैं।’
कह कर वह बर्तन धोने लगी। मैं बर्तनों पर उलझे उसके नन्हे-नन्हे खूबसूरत हाथों को देखता रहा। कुछ ही देर बाद जब वह घर जाने लगी तो उसने मुझसे कहा, ‘अंकल, आपके घर का पता क्या है?’
मैंने कागज के एक टुकड़े पर उसे अपना पता लिख कर देते हुए कहा, ‘लेकिन तुम मेरा पता लेकर क्या करोगी बिटिया? मैं तो यहां किराए पर रहता हूं।’
‘अंकल मैं आपका पता अपनी कॉपी में लिख कर रखंूगी। कई बार जोजफ अंकल मम्मी से कहते हैं कि वे अब दिल्ली में नहीं रहेंगे।’ कहते हुए वह मुस्कराती हुई चली गई। परीक्षा होने के बाद जब स्कूल की छुट्टियां पड़ीं तो फिर मेरा और डेरोथी का एक दूसरे से मिलना ही नहीं हो सका। इस बीच मुझे दो महीनों के लिए दफ्तर के काम से दिल्ली के बाहर जाना पड़ा। वापस लौटने के बाद डेरोथी मुझे फिर कभी नहीं मिली। मैं डेरोथी को भुलाने में असमर्थ था। वह मेरी सगी बेटी नहीं थी, लेकिन बेटी जैसी थी। मैं उसके नन्हे-नन्हे हाथों से सजाए डिब्बों को देखता, जो अब भी उसी तरह लाइन में लगे थे जैसे डेरोथी लगा गई थी। उन्हें चूमते हुए मेरी आंखें गीली हो आतीं। एक दिन मैंने डेराथी के घर गया, तो पता चला कि वे लोग दिल्ली छोड़ कर चले गए हैं। कहां गए कुछ पता नहीं। मैं निराश होकर वापस लौट आया था। उस रात मैं सो नहीं सका। सारी रात मुझे डेरोथी की याद आती रही। मैं सोचने लगा, जाने से पहले वह मेरे कमरे पर जरूर आई होगी। लेकिन कमरे पर ताला देख कर वह बहुत निराश हुई होगी। शायद वह बड़ी देर तक वहां पर मेरा इंतजार करती रही होगी। शायद वह रोई भी होगी।
उसके बाद मुझे डेरोथी की कोई सूचना नहीं मिली। मकान मालिक के कहने पर एक दिन मुझे वहां से कमरा खाली करना पड़ा। इस घटना को बरसों बीत गए थे। मैं भूल गया था कि डेरोथी नाम की भी कोई लड़की थी, जिसे मैंने बस में से गिरने से बचाया था, और जो मुझे अंकल कहा करती थी। जिसने मेरे घर में आकर अस्त-व्यस्त डिब्बों को करीने से सजा कर रख दिया था।
घर से दफ्तर और दफ्तर से घर लौटना ही मेरी दिनचर्या थी। एक दिन जब मैं दफ्तर से घर लौट रहा था, बस में मुझे मेरा पहला मकान मालिक मिला। उसने मुझे बताया कि उसके घर पर मेरा एक पत्र आया हुआ है। उसके घर से पत्र लेने के बाद मैंने वह पत्र लेकर खोल कर देखा, वह पत्र डेरोथी का था। उसमें पत्र के साथ-साथ एक जन्मदिन का कार्ड भी था। पत्र देखते ही डेरोथी का चेहरा मेरी आंखों के आगे तैरने लगा। दिन कितने जल्दी पर लगा कर उड़ गए, कुछ पता ही नहीं चला। उसने पत्र में लिखा था, ‘अंकल आपको मैं अपने पुत्र गोल्डी के जन्मदिन का कार्ड भेज रही हूं, गोल्डी के जन्मदिन पर मेरा अपना कोई नहीं है। मम्मी ने जोजफ अंकल से शादी कर ली है, छोटी बहिन सोफिया एक हिंदू लड़के से शादी करके बाहर चली गई है। आपको याद है न अंकल, आपने मुझे गिरने से बचाया था। उस वक्त लोेगों ने यही सोचा था कि मैं आपकी बेटी हूं, और आप मेरे पिता। मैंने आपको अपनी शादी का कार्ड भी भेजा था। आप मेरी शादी में आते तो मुझे लगता कि मेरे पिता मेरे सामने खड़े हैं। लेकिन आप नहीं आए, मैं बहुत रोई थी अंकल। इस बार मुझे मत रुलाना अंकल। मैं गोल्डी के जन्मदिन का केक तभी काटूंगी, जब आप हमारे साथ रहेंगे। आप आएंगे न अंकल?’ मैंने दो-तीन बार डेरोथी का पत्र पढ़ा। आंखों में गीलापन तैर आया था। उस रात मैं सो नहीं सका और फिर सुबह होते ही कोलकाता की टिकट बुक करवाने के लिए रेलवे स्टेशन की ओर चल पड़ा।
