राजकुमार आत्रेय

शाम होने को थी। हर्ष की मम्मी मनोरमा किचन में काम कर रही थी। उसके चेहरे पर खुशी के भाव थे। हाथ फटाफट चल रहे थे। तभी हर्ष किचन में घुसा। वह ट्यूशन से अभी-अभी लौटा था। मम्मी को ढूंढ़ता हुआ वह किचन में पहुंचा- ‘मम्मी, जरा ड्रार्इंग-रूम में आना।’ ‘ड्रार्इंग रूम में क्या होगा? यहीं कह दो बेटा। कुछ खाने को चाहिए क्या?’ मम्मी ने अपने हाथों को विराम देते हुए कहा। ‘आप अभी ड्रार्इंग रूम में आइए, बस। मुझे एक मीटिंग करनी है। दीदी भी वहीं आ रही हैं।’ हर्ष ने कहा। ‘मीटिंग! तू मीटिंग करेगा?’ मम्मी ने पलट कर आश्चर्य से पूछा था।

‘हां मम्मी, मुझे मीटिंग ही करनी है। प्लीज, एक बार आप वहां आ जाओ।’ कहते हुए हर्ष किचन से निकल कर ड्रार्इंग-रूम की तरफ चला गया।
मनोरमा भी पीछे-पीछे चल पड़ी। अभी तक उसकी आश्चर्य भरी जिज्ञासा शांत नहीं हुई थी। वे ड्रार्इंग-रूम में पहुंची। टेबल के दूसरी ओर रखी कुर्सी पर हर्ष बैठा हुआ था। मानो कोई बड़ा अधिकारी अपने से छोटे अधिकारियों की मीटिंग लेने के लिए तैयार बैठा हो। सामने के सोफे पर हर्षिता बैठी थी। हर्षिता तीन वर्ष बड़ी थी हर्ष से। इससे पहले कि हर्ष अपनी बात शुरू करता, मम्मी ने उससे पूछा- ‘बेटा, यह तो बता कि तूने मीटिंग वाली बात कहां से और कैसे सीखी? तू तो अभी बहुत छोटा है। ‘मम्मी, अब मैं छोटा नहीं हूं। छठी कक्षा में पढ़ रहा हूं। अगर मैं बहुत छोटा होता, तो हमारे प्रिंसिपल सर मुझे मीटिंग में नहीं बुलाते। समझीं न मम्मी जी!’ हर्ष ने कहा।

‘किस तरह की मीटिंग में बुलाया था तुम्हें, प्रिंसिपल सर ने?’
‘पिछले महीने स्कूल में वन महोत्सव मनाया गया था। उसमें टीचर्स के साथ-साथ अपनी-अपनी कक्षा में प्रथम आने वाले स्टूडेंट्स को भी मीटिंग में बुलाया गया था। मैं अपनी कक्षा में प्रथम आता रहा हूं, यह तो आपको मालूम है ही, मम्मी।’
मरोरमा मन ही मन बहुत खुश हुई। फिर बड़े प्यार से उसने बेटे से कहा- ‘ठीक है, बेटा। अब तुम कहो, तुमने यह मीटिंग क्यों बुलाई है?’
हर्ष ने किसी बड़े आदमी की तरह कहना शुरू किया- ‘रेस्पेक्टेड मम्मी जी, प्यारी दीदी, आप सभी को शायद पता ही होगा कि कल पापाजी का जन्मदिन है। निश्चय ही आप इस अवसर को बड़ी शान से मनाना चाहती होंगी। मैं भी चाहता हूं कि हम इस दिन को इस तरह से मनाएं कि उन्हें हमेशा याद रहे। मैं आप दोनों से अनुरोध करता हूं कि इस विषय में अपने कीमती सुझाव दें। सबसे पहले मम्मी जी, आप बताएं कि कल का दिन आप किस तरह से मनाना चाहेंगी?’
आनंदित स्वर में मनोरमा ने कहा, ‘बेटा कल मैं तुम्हारे पापा का मनपसंद भोजन बनाऊंगी। खाने की जो-जो चीजें उन्हें पसंद हैं, वे सब कल हमारे यहां बनेंगी। अगर तुम कोई बात अलग से बताना चाहो तो वह भी बता दो।’
हर्ष ने अपनी ओर से कोई सुझाव न देकर, अपनी बहन से पूछा- ‘हां तो हर्षिता दीदी, आप कहें, कल का दिन आप किस तरह मनाना पसंद करेंगी? क्या आप पापा को कोई प्रेजेंट देना पसंद करेंगी? अगर हां तो, कौन-सा प्रेजेंट देंगी?’
हर्षिता को हर्ष की बातों में बहुत मजा आ रहा था। वह चहकते हुए बोली- ‘पापा रोज डायरी लिखते हैं। मैंने कल रात देखा था, उनकी डायरी समाप्त होने वाली है। मैं किसी बुकसेलर से अच्छी-सी डायरी खरीद कर लांऊगी। साथ में एक पेन भी लाऊंगी। ये दोनों चीजें मैं पापा को भेंट करूंगी।’
‘शाबाश! बहुत बढ़िया! कल का दिन निश्चय ही एक अच्छा दिन होगा। ठीक है, आप सब तुरंत तैयारियां शुरू कर दें। शुभकामनाएं आप सब के लिए।’ ऐसा कहते हुए हर्ष कुर्सी से उठ खड़ा हुआ।
‘अरे! तूने तो बताया ही नहीं कि तू कल का दिन कैसे मनाएगा?’ मरोरमा के साथ हर्षिता भी बोल उठी थी।
‘यह बात अभी पर्दे में रहनें दें। कल आप सभी को मालूम पड़ जाएगा कि मैं यह दिन कैसे मनाता हूं।’ इतना कह कर हर्ष बाहर निकल गया।
अगले दिन सुबह हर्ष पापा, मम्मी और दीदी के साथ अपने स्कूल पहुंच गया। रात में ही उसने पापा को उनके आॅफिस से छुट्टी लेने के लिए मना लिया था। प्रात:कालीन सभा में स्कूल के प्रिंसिपल ने हर्ष के पापा का परिचय कराया। उन्हें जन्मदिन की शुभकामनाएं दी। उनके हाथों से स्कूल के प्रांगण में आम का एक पौधा लगवाया गया। वह पौधा हर्ष के अनुरोध पर किसी नर्सरी से प्रिंसिपल सर ने मंगवाया था। हर्ष के पापा ने उसका खर्च चुकाया। बच्चों में अपने हाथ से उन्होंने मिठाई बांटी।

वे सभी घर लौटने लगे तो हर्ष ने वहीं रखा एक और पौधा, जो जामुन का था, साथ ले लिया। वह भी प्रिंसिपल सर ने मंगवाया था। हर्ष के घर के समीप सड़क के किनारे थोड़ी जगह खाली पड़ी थी। हर्ष ने पापा के हाथों से वह पौधा वहां लगवाया। पक्की र्इंटों की फेंस बनवाई गई, ताकि पौधा सुरक्षित रहे। हर्ष ने निश्चय किया कि वह जामुन के उस पौधे को पानी खुद दिया करेगा।
इसके बाद वे सभी अपने घर पहुंचे। हर्ष ने वहां मम्मी-पापा के पांव छूते हुए कहा- ‘पापा, पता नहीं, आपको अच्छा लगा कि नहीं, मैं तो आपको यही उपहार दे पाया। आपके हाथों से रोपे गए पौधों की छाया में लोग बैठेंगे। फल खाएंगे और आपको याद करेंगे। ठीक किया न, पापा?’
‘बिल्कुल ठीक किया बेटा, बिल्कुल ठीक। इतना बढ़िया उपहार तो आज तक मुझे किसी ने नहीं दिया बेटा।’ पापा ने ऐसा कहते हुए हर्ष को छाती से लगा लिया।
तब मम्मी और दीदी प्यार से उसके कंधों को थपथपा रही थीं।