रवि डे

हर कोई चाहता है कि उसका बड़ा घर हो, घर के बाहर लॉन हो, पेड़-पौधे हों। मगर शहरों, खासकर महानगरों में भला कितने लोगों के पास अपने इस सपने को पूरा कर पाने की क्षमता होती है। और फिर जिन लोगों के पास बड़े घर हैं, क्या वास्तव में वे उनका रखरखाव ठीक से कर पाते हैं। आजकल जिस तरह महानगरों में असुरक्षा बढ़ रही है, उससे जिनके पास बड़ा घर बनवा सकने की क्षमता है, वे भी सोसाइटियों में रहना इसलिए पसंद करते हैं, क्योंकि वहां उन्हें सुरक्षा मिल जाती है। सामुदायिक सहयोग आसानी से मिल जाता है। बड़े घरों और कोठियों में हर तरह के काम के लिए सुविधाएं खुद जुटानी पड़ती हैं, जबकि सोसाइटियों में बिजली-पानी, साफ-सफाई, सुरक्षा गार्ड वगैरह की साझा व्यवस्था उपलब्ध होती है। इसलिए भी बहुत से लोग कोठियों के बजाय सोसाइटियों में रहना पसंद करने लगे हैं।

मगर सोसाइटियों में भी तीन-चार-पांच बेडरूम वाले घरों की साफ-सफाई, रखरखाव आसान काम नहीं होता। खासकर नवविवाहित और कुंआरे नौकरीशुदा लोगों, ऐसे बुजुर्गों, जिनके बच्चे उनके साथ नहीं रहते, कहीं दूसरे देश में रहते हैं, बड़े फ्लैटों का रखरखाव उनके लिए कठिन होता है। बड़े घर देखने में जितने आरामदेह लगते हैं, रखरखाव के मामले में उनकी दुश्वारियां भी उतनी हैं। जिन बड़े घरों में दो-तीन लोग रहते हैं, वे आमतौर पर दो बेडरूम और एक बैठक का इस्तेमाल करते हैं। बाकी के कमरे और जगहें लगभग बंद और अनुपयोगी पड़ी रहती हैं। हर रोज उनकी साफ-सफाई नहीं हो पाती। इसलिए उनमें सीलन, धूल-धक्कड़, जाले वगैरह जमा होते रहते हैं। उनमें हर काम के लिए आदमी रखने पड़ते हैं। यानी बड़े घरों का रखरखाव खासा खर्चीला भी है। इसलिए बड़े फ्लैट और कोठी खरीदने-बनवाने की क्षमता होने के बावजूद बहुत-से लोग छोटे घरों में रहना पसंद करने लगे हैं। ऐसे लोग, जो शादीशुदा नहीं हैं या फिर शादीशुदा हैं, पर बच्चे नहीं हैं और बड़े घर का खर्च उठाना नहीं चाहते वे छोटे घरों का चुनाव करते हैं। ऐसे ही लोगों को ध्यान में रखते हुए सिंगल अपार्टमेंट और स्टूडियो अपार्टमेंट्स का चलन बढ़ रहा है।

सिंगल और स्टूडियो अपार्टमेंट

स्टूडियो अपार्टमेंट और सिंगल अपार्टमेंट छोटी जगहों में रहने की सभी सुविधाएं उपलब्ध कराते हैं। छोटे घरों के प्रति लोगों के बढ़ते आकर्षण को ध्यान में रखते हुए अब महानगरों में सिंगल अपार्टमेंट और स्टूडियो अपार्टमेंट्स वाले बहुमंजिला भवन बनाए जाने लगे हैं। कई बार लोग वन बेडरूम फ्लैट, सिंगल अपार्टमेंट और स्टूडियो अपार्टमेंट में अंतर नहीं कर पाते। वन बेडरूम का चलन विकास प्राधिकरणों ने निम्न आयवर्ग को ध्यान में रख कर शुरू किया था। तमाम शहरों के विकास प्रधिकरण आमतौर पर घरों का नक्शा आयवर्ग के मुताबिक तैयार करते हैं। इसीलिए एचआईजी, एमआईजी और एलआईजी जैसी श्रेणियां आज तक चली आ रही हैं। वन बेडरूम एलआईजी यानी लोअर इनकम ग्रुप के लोगों को ध्यान में रख कर बनाए जाने वाले फ्लैटों को कहते हैं। इनमें एक बेडरूम, एक किचेन, एक बाथरूम और छोटी-सी बैठक होती है।

सिंगल और स्टूडियो अपार्टमेंट का चलन भारत में पश्चिमी देशों की नकल से शुरू हुआ। स्टूडियो अपार्टमेंट को कई देशों में बैचलर अपार्टमेंट, सेल्फ कंटेंट्ड अपार्टमेंट या एफीसिएंसी अपार्टमेंट भी कहा जाता है। सिंगल अपार्टमेंट की बनावट भी लगभग वन बेडरूम फ्लैट जैसी होती है, जिसमें एक बेडरूम, एक बैठक, रसोई और बाथरूम होता है। मगर इसमें रहने वालों की जरूरतों को ध्यान में रख कर उनकी सुविधा का हर सामान उपलब्ध कराने का प्रयास किया जाता है। इसे कलात्मक ढंग से बनाया जाता है। आमतौर पर इसकी बालकनी बड़ी होती है। स्टूडियो अपार्टमेंट में इस तरह रसोई और सोने के कमरे या बैठक का कोई बंटवारा नहीं होता। उसमें रहने वाले अपनी जरूरत के मुताबिक इन सबके लिए उसमें जगहें निर्धारित करते हैं। सिंगल और स्टूडियो अपार्टमेंट्स वाले परिसरों में आमतौर पर सामुदायिक सुविधाएं अधिक उपलब्ध कराई जाती हैं, जैसे क्लब हाउस, स्वीमिंग पूल, खेलने की जगहें, जरूरत के सामान की दुकानें और सबसे अहम सुरक्षा व्यवस्था का खास ध्यान रखा जाता है। विकास प्राधिकरणों के वन बेडरूम फ्लैटों को बनाते समय इन सब चीजों का ध्यान नहीं रखा जाता। सिंगल अपार्टमेंट और स्टूडियो अपार्टमेंट चूंकि निजी भवन निर्माता तैयार करते हैं, इसलिए सुविधा के लिहाज से अलग-अलग भवनों में इनका आकार और सुविधाएं अलग-अलग होती हैं। अब बहुत सारे मॉलों के ऊपरी हिस्से में भी सिंगल और स्टूडियो अपार्टमेंट बनाए जाने लगे हैं।

जो लोग छोटे घरों का रोना रोते रहते हैं, उन्हें समझना चाहिए कि छोटे घर की साज-सज्जा में बड़े घर की अपेक्षा अधिक कल्पनाशक्ति का इस्तेमाल किया जा सकता है। इनका रखरखाव बहुत आसान होता है। साफ-सफाई के लिए मेड न भी रखें तो वैक्यूम क्लीनर आदि से बहुत कम समय में आसानी से सफाई की जा सकती है। स्टूडियो अपार्टमेंट की साज-सज्जा में कल्पनाशक्ति के इस्तेमाल की पूरी गुंजाइश होती है। उसमें चूंकि आप अपने ढंग से सोने-बैठने, खाना पकाने, जरूरत की चीजें रखने वगैरह के लिए जगह खुद तय करते हैं, इसलिए उसे कलात्मक रूप दे सकते हैं। यों भी छोटे घरों की साज-सज्जा के मामले में कुछ बातों का ध्यान रखें, तो बड़ा घर न होने का मलाल मन में नहीं रह जाएगा।

कैसे करें रखरखाव

’ छोटे घरों में अधिक से अधिक खुलापन रखें। मसलन, बालकनी और बैठक के बीच र्इंट की दीवार खड़ी करने के बजाय कांच का इस्तेमाल करें या फिर लकड़ी या एल्यूमीनियम के फोल्डिंग फ्रेम लगवाएं, जिसमें छत से लेकर फर्श तक कांच लगा हो और जरूरत पड़ने पर उसे खिसका कर पूरी तरह खोला जा सके। इस तरह घर का आकार बड़ा लगता है।
’ छोटे घरों में फर्नीचर कम से कम रखें। भारी सोफे से परहेज करें। अगर सोफा रखना ही हो तो फोल्डिंग रखें, जिसे जरूरत पड़ने पर खोल कर बेड का आकार दिया जा सके। डाइनिंग टेबल भी ऐसा ही रखें, जिसका खाने के अलावा दूसरे कामों, जैसे पढ़ने-लिखने, में भी उपयोग किया जा सके।
’ सोने वाले कमरे में बिस्तर और टेबिल वगैरह ऐसे रखें, जिनका इस्तेमाल विविध रूपों में किया जा सके। बिस्तर के अगल-बगल की दीवारों पर किताबों की रैक बनवाई जा सकती है। इसी तरह किताबों की रैक के बीच में ही टीवी रखने की जगह बनाई जा सकती है।
’ किचेन और डाइनिंग को साथ रखें। जिस प्लेटफार्म का इस्तेमाल खाना बनाने के लिए किया जाता हो, बाद में उसी को डाइनिंग टेबिल की तरह इस्तेमाल किया जाए, तो काफी जगह बच जाएगी।
’ बैठक को सिर्फ बैठक न बनाएं, जैसा कि बड़े घरों में होता है। उसे कुछ इस तरह हिस्सों में बाटें कि उसका उपयोग बेडरूम के रूप में भी किया जा सके। अगर कभी कोई मेहमान आ जाए, तो उसे ठहराने में मदद मिलेगी।
’ छोटे घरों में रोशनी की व्यवस्था में कलात्मकता की जरूरत पड़ती है। ऐसे उपकरणों का उपयोग करें, जो न सिर्फ छोटी जगहों में पर्याप्त रोशनी दे सकें, बल्कि सजावट को आकर्षक बनाएं। रोशनी की समुचित व्यवस्था से भी छोटी जगह को बड़ा दिखाया जा सकता है।
’ रंग-रोगन के मामले में रंगों का चयन कुछ इस तरह करें कि वे घर को भरा-भरा न दिखाएं। हल्के रंगों के इस्तेमाल से घर का आकार कुछ बड़ा दिखने लगता है।