दुनियाभर में सैर-सपाटे के लिए सबसे पसंदीदा ठिकाने और ‘बिजनेस डेस्टिनेशन’ के रूप में सिंगापुर का नाम पूरी दुनिया में है। तीन दशक पहले जब पूरी दुनिया में ‘डिजिटिलाइजेशन’ का जोर बढ़ा तो दुनिया भर की कंपनियों ने अपने उत्पाद को यहीं से पूरी दुनिया में भेजना और प्रचारित करना सबसे बेहतर माना। पर जैसा कि आज वहां के युवाओं को भी लगता है कि सिंगापुर की एक दूसरी पहचान भी है, जो ज्यादा प्रेरक है, ज्यादा मौजू है। एक ऐसे दौर में जब जल प्रबंधन को लेकर पूरी दुनिया में तमाम तरह के उपायों की बात हो रही है, उसमें सिंगापुर की चर्चा खासतौर पर होती है। विश्व में जल प्रबंधन के जितने भी मॉडल हैं, उसमें सिंगापुर का मॉडल अव्वल है।
आने वाले चार दशकों के लिए आज सिंगापुर के पास पानी के प्रबंधन को लेकर ऐसा ब्लूप्रिंट है, जिसमें जल संरक्षण से जल शोधन तक पानी की किफायत और उसके बचाव को लेकर तमाम उपाय शामिल हैं। निस्संदेह भारत भी सिंगापुर से जल प्रबंधन को लेकर सबक ले सकता है। सिंगापुर की खास बात यह भी है कि उसका जल प्रबंधन शहरी क्षेत्रों के लिए खास तौर पर मुफीद है।
सिंगापुर के सामने लंबे समय तक यह सवाल रहा कि एक शहर-राष्ट्र जिसके पास न तो कोई प्राकृतिक जल इकाई है, न ही पर्याप्त भूजल भंडार है, जिसके पास इतनी भूमि भी नहीं कि वह बरसात के पानी का भंडारण कर सके, आखिर वह अपनी 50 लाख से ऊपर की आबादी की प्यास को कैसे बुझाए। दक्षिण पूर्वी एशियाई देश सिंगापुर का जोहार नदी (अब मलेशिया का हिस्सा) से जुड़ा 50 वर्ष पुराना अनुबंध समाप्त हो चुका है। गौरतलब है कि सिंगापुर अपनी कुल जल आपूर्ति का 40 फीसद पड़ोसी देश मलेशिया से आयात करता है। आयातित पानी का मूल्य बहुत ही कम है, क्योंकि मलेशिया ने पिछले पांच दशकों में पानी के दाम ही नहीं बढ़ाए।
इस बीच, सिंगापुर की राष्ट्रीय जल एजंसी ‘पब्लिक यूटिलिटी बोर्ड’ (पीयूबी) 2060 तक पानी की मांग की स्वयं पूर्ति कर पाने के लिए चौबीसों घंटे कार्य कर रही है। इसका लक्ष्य है कि वह सिंगापुर की मलेशिया पर पानी की निर्भरता को सिर्फ कम ही न करे, बल्कि उसे समाप्त भी कर दे। इसके लिए उसने जल प्राप्ति की तीन पद्धतियों पर कार्य करने का निश्चय किया है। ये हैं- गंदे पानी का पुन: शुद्धिकरण, समुद्री जल का खारापन कम करना और वर्षा जल का अधिकतम संग्रहण।
सिंगापुर में प्रतिवर्ष औसतन 2400 मिलीमीटर वर्षा होती है जो कि कुल वैश्विक औसत से दोगुनी है। इसके बावजूद यहां पानी की कमी का कारण है भंडारण के लिए स्थान की कमी। अत: पीयूबी व्यापक निवेश कर महंगे जलस्रोत विकसित कर रहा है। सत्तर के दशक में सिंगापुर ने गंदे जल का पुनर्शोधन प्रारंभ कर दिया था। वर्षा जल का अधिकतम प्रयोग करने हेतु पीयूबी ने अपनी तरह का पहला संयंत्र समुद्र तट पर लगाया है, जो कि छोटी धाराओं के माध्यम से आने वाले पानी के शोधन में सक्षम है।
2003 में सिंगापुर का एक नागरिक प्रतिदिन 165 लीटर पानी का इस्तेमाल करता था। 2009 में यह घटकर 155 लीटर पर आ गया। जागरूकता अभियान के माध्यम से पीयूबी चाहता है कि अगले तीन साल में इसमें आठ लीटर की और कमी आ जाए। सिंगापुर का लक्ष्य है कि वह 2060 तक पानी के मामले में आत्मनिर्भर बन जाए तब तक मलेशिया उसके लिए पानी का मुख्य स्रोत बना रहेगा।
