जिन सड़कों के निर्माण से देश के विकास को गति मिलती है। इससे लोगों के एक से दूसरी जगह पहुंचने और माल ढुलाई में सुगमता आती है। बाजार और व्यापार को रफ्तार मिलती है। मगर तेजरफ्तारी के इस जमाने में यही सड़कें मौत की वजह बन रही हैं। फर्राटा दौड़ने वाले वाहनों का चलन बढ़ा है, तो सड़कें भी उनके मुताबिक बनने लगी हैं। ऐसे में रफ्तार के दीवाने युवा कभी नशे में, कभी जोश में, तो कभी मोबाइल फोन के मोहपाश में संतुलन खो बैठते हैं और हादसा कर बैठते हैं। आंकड़े बताते हैं कि भारत जैसे देश में जितने लोग आतंकी घटनाओं में नहीं मारे जाते, किसी बीमारी से जान नहीं गंवाते, उससे अधिक सड़क हादसों के शिकार हो जाते हैं। सड़क हादसों की वजहों का विश्लेषण कर रही हैं नाज खान।
न सड़कों के सहारे युवा तरक्की का सफर तय करते हैं, उन्हीं रास्तों पर हादसे उनकी रफ्तार पर लगाम लगा रहे हैं, यानी देश की एक बड़ी आबादी को सड़कें लील रही हैं। वही सड़कें, जो हमारी सहूलियत के लिए बनाई गई हैं, उन्हीं पर पिछले एक दशक में करीब बारह लाख लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, इससे दस गुना अधिक लोग गंभीर रूप से घायल और अपंग हो चुके हैं। कोई तो वजह है कि इतनी बड़ी तादाद में लोगों की जानें सड़क हादसों में जा रही हैं। लोग हर बार हादसों को किस्मत का लिखा मान कर सब्र करके बैठ जाते हैं। सवाल है कि लोग इस ओर जागरूक क्यों नहीं होते, आखिर खामी कहां है? इसके लिए गड्ढों से भरी मुंह चिढ़ाती सड़कें जिम्मेदार हैं या यातायात नियम-कायदों की अनदेखी इतने बड़े स्तर पर मौत का कारण बन रही है या फिर चिकनी, सपाट सड़कें युवाओं की रफ्तार में जोश भर रही हैं और वे हादसों का शिकार हो रहे हैं?
साल-दर-साल बढ़ते हादसों को गंभीरता से लेते हुए पिछले वर्ष सर्वोच्च न्यायालय ने भी सड़क हादसों पर टिप्पणी करते हुए अपनी चिंता इन शब्दों में व्यक्त की थी कि देश की सरहद पर गोलीबारी में या आतंकवादी घटनाओं में जितने लोग मरते हैं, उससे कहीं अधिक लोग देश की सड़कों पर गड्ढों की वजह से होने वाली दुर्घटनाओं में मौत का शिकार हो जाते हैं। हादसों की बढ़ती संख्या और भयावहताका अंदाजा विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट से भी लगाया जा सकता है। इसमें कहा गया है कि भारत में अधिकतर बच्चे और युवा बीमारी से नहीं, बल्कि सड़क हादसों की वजह से अपनी जान गंवाते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में 2016 में सड़क दुर्घटना में 13.5 लाख लोगों की मौत हुई और मरने वाले हर नौ लोगों में से एक भारतीय है। वहीं 5-29 वर्ष के लोगों की मौत की बड़ी वजह सड़क हादसों में घायल होना है। पूर्व न्यायाधीश केएस राधाकृष्णन की अध्यक्षता में बनी समिति की रिपोर्ट में भी स्पष्ट कहा गया है कि 2013-17 बीच देश में सड़क के गड्ढों की वजह से हुए हादसों में 14,926 लोगों की मौत हुई। वहीं सड़क सुरक्षा पर आधारित वैश्विक स्थिति रिपोर्ट में भी भारत की स्थिति सबसे खराब बताई गई है। 2018 में जारी विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में होने वाली बीस मौतों में से एक की मौत का कारण शराब है और भारत में तो शराब पीकर वाहन चलाना आम बात है।
हमारे देश में सड़कें बनती हैं, मगर कुछ ही दिनों बाद उनमें गड्ढे पड़ जाते हैं। यानी कहीं न कहीं सड़कें बनाने में लागत में कटौती की जाती है, मानक के अनुरूप लागत का इस्तेमाल नहीं होता, यानी भ्रष्टाचार होता है। केएस राधाकृष्णन समिति की रिपोर्ट में भी कहा गया है कि सड़कों पर इतनी अधिक हुई मौतों के आंकड़े सड़कों की देखरेख के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की लापरवाही के संकेत हैं। यही वजह है कि एक बार की बारिश में ही सड़कें गड्ढों से भरी और सरकारी दावों को मुंह चिढ़ाती नजर आती हैं। वहीं यातायात नियमों की अनदेखी की जाती रही है। यातायात अमले में भ्रष्टाचार व्याप्त है। इसी का फायदा उठा कर लोग यातायात नियमों का उल्लंघन करते और पैसे देकर छूट जाते हैं। वहीं हादसे के शिकार लोगों की मदद के लिए पुलिस के पचड़े से बचने की वजह से भी लोग घायलों की मदद करने सामने नहीं आते। हालांकि अब हालात कुछ बदले हैं। मगर अब भी सख्ती से यातायात नियमों का पालन कराने और इस ओर लोगों को जागरूक करना लंबी कवायद है। दरअसल, बढ़ते सड़क हादसों को लेकर सवाल कई हैं और कारण भी कई, मगर यातायात नियमों के सख्ती से पालन के साथ खुद लोगों को भी अपनी जिम्मेदारी तय करनी होगी और अपने जीवन का मोल समझना होगा।
