वेदमित्र शुक्ल
अभी तक तो टिकट मांगने वाली महिलाओं में आपके ही होर्डिंग-बैनर दिखते रहे हैं। पार्टी के ही लोग कहते सुने गए कि महिला क्या चुनाव लड़ेगी? जबसे परिसीमन घोषित हुआ और सीट महिला के लिए सुरक्षित हो गई, चुनाव लड़ने वाले सब प्रत्याशियों ने अपनी-अपनी पत्नियों के फोटो और नाम वाली होर्डिंग लगा दिए।… मम्मी, राजनीति में मौसम कितनी जल्दी बदल जाता है।’
साधना सहाय के सत्रह वर्षीय बेटे सत्यम ने नाश्ते की टेबल पर बड़े गंभीर अंदाज में यह बात कही। चूंकि पेशे से महिला महाविद्यालय में प्राध्यापिका साधना को सुबह की कक्षा के लिए जल्दी निकलना था, इसलिए वे अपना नाश्ता खत्म करके सत्यम की बातों से सहमति जताती, एक मुस्कराहट के साथ कुर्सी से उठ खड़ी हुर्इं। साधना के पति और बेटा भी अपने-अपने काम पर जाने की तैयारी में अपना नाश्ता निपटाने में लग गए।
महाविद्यालय के लिए निकल चुकी साधना कार की पिछली सीट पर बैठे-बैठे सोचने लगीं कि क्या उन्होंने नगरपालिका चुनाव के लिए संगठन से टिकट मांग कर सही निर्णय किया? खुद से पूछे गए प्रश्नों का कोई सटीक उत्तर कहां मिल पाता है? इस प्रश्न का जवाब तलाशते हुए वे उस समय में चली गर्इं, जब कई वर्ष पहले उन्होंने सक्रिय राजनीति में कदम रखा था। जिस राजनीतिक दल में वे उस समय शामिल हुर्इं, उसी दल में आज भी थीं। पार्टी में छोटी-बड़ी जिम्मेदारियों वाले पद तो आते-जाते रहे, लेकिन लोगों के बीच में वे एक वरिष्ठ और समर्पित कार्यकर्ता के रूप में ही विख्यात थीं। शायद ऐसा इसलिए संभव हो पाया था, क्योंकि उन्होंने किसी राजनेता के प्रभाव में दल का चयन नहीं किया था। अवसरवादिता और व्यक्ति-पूजा उनके राजनीतिक जीवन में नहीं थे। उन्हें तो पार्टी का सांगठनिक ढांचा भा गया था, इसलिए वे पार्टी में आई थीं।
पार्टी में ऊपर से निर्देश था कि जिला स्तर पर बनने वाली कोर टीम में तीस प्रतिशत महिलाओं का स्थान होगा। राजनीतिशास्त्र की प्राध्यापिका और स्वभाव से तेजतर्रार साधना को पार्टी से जिले की टीम में एक पद स्वीकार करने का न्योता मिला और उन्होंने बिना देर किए स्वीकार भी कर लिया। वे पार्टी में आर्इं तो दिमाग में यह बात लिए कि पार्टी में उनसे महिलाओं के हित में कार्य करने की अपेक्षा है, पर ज्यों-ज्यों समय बीता, उन्होंने पाया कि बड़े नेता चाहते हैं कि वे केवल पार्टी में महिलाओं की भागीदारी का एक मुखौटा बन कर रहें। ऊपर से तो पार्टी में चाहे महिला हो या कोई और, हाशिए का समाज उनका प्रतिनिधित्व दिखाया जा रहा था, पर भीतर स्थानीय स्तर पर पार्टी में वही धनबल, बाहुबल और न जाने कौन-कौन से छल हावी थे, जो अन्य दलों में ऊपर और भीतर दोनों स्तर पर थे। फिलहाल, उन्हें अब किताबी ज्ञान के बाद तल्ख जमीनी सच्चाइयों से दो-चार होना पड़ रहा था।
नगरपालिका चुनाव में पार्टी से टिकट मांग कर उन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर राजनीति में सही किया या गलत, पर उन्हें इतना भरोसा जरूर था कि उन्होंने महिलाओं की हिस्सेदारी पर समाज में अपनी भूमिका रखी।
कार महाविद्यालय पहुंच चुकी थी। ड्राइवर की आवाज, ‘मैम, कॉलेज आ गया’, से साधना का ध्यान टूटा। वे पार्किंग लॉट से होते हुए अपने कक्ष में पंहुचीं। हाजिरी रजिस्टर आदि लिए और फिर तय कक्षाएं लीं। महाविद्यालय से वापस लौटने से पहले वे प्राचार्य के कक्ष में गर्इं। वह कुर्सी पर बैठे उससे पहले ही प्राचार्य महोदय बोल पड़े, ‘साधना जी, मेयर की सीट महिला के लिए सुरक्षित होने से पहले भी प्रत्याशियों की लाइन में हरिहर बाबू का नाम आगे ही था। अब उनको नहीं, तो उनकी पत्नी को।’
कुर्सी पर बैठते हुए साधना ने पूछा, ‘क्या कोई नई खबर है?’
टेलीविजन पर चल रही खबर के अनुसार प्राचार्य ने सूचना देते हुए कहा, ‘आपकी पार्टी ने आपका टिकट काट कर हरिहर बाबू की पत्नी सुशीला को दे दिया है। यह मुझे ठीक नहीं लगा। पार्टी के कार्यक्रम, धरना-प्रदर्शन में तो महिलाओं की भागीदारी के नाम पर हमारे कॉलेज की प्रोफेसर साधना जी और जब टिकट-वितरण की बात आए तो किसी और महिला कार्यकर्ता को भी नहीं, बल्कि किसी बड़े नेता की पत्नी को। आप कुछ करती क्यों नहीं?’
‘प्राचार्य जी, आपका ऐसे बोलना ही तो हमें एक लंबी लड़ाई के लिए तैयार रखता है। हम भी कहां पीछे हट रहे हैं? आज नहीं तो कल…। यथाशक्ति जुटे हैं। फिलहाल जिस दल में हूं उसे छोड़ कर भी तो बहुत कुछ नहीं किया जा सकता। संगठन में रह कर कैसे भी प्रतिवाद तो कर ही सकती हूं।’
साधना ने प्राचार्य से बातचीत करते हुए टिकट न मिलने पर उनकी प्रतिक्रिया की बावत जो पॉलिटिकिली करेक्ट बातें हो सकती थीं, करने की कोशिश की थी।
घर वापस आते-आते साधना थक सी गई थीं। मानसिक रूप से यह सोच कर कुछ ज्यादा ही कि सामाजिक न्याय, नारी सशक्तिकरण आदि तो नाम भर हैं। गांव से लेकर बड़े-बड़े शहरों तक सब जानते हैं कि महिला के नाम पर कुर्सियां तो प्रधान पति, विधायक पति, सांसद पति या कोई और पुरुष ही हथिया चुका होता है। सरकारी स्तर पर किए सामाजिक सुधारों का तोड़ खोजने में तो चार कदम आगे ही रहता है रूढ़िगत समाज। साधना यह भी भली-भांति जानती थीं कि इन सबसे थक-हार कर पीछे हटना रूढ़िगत बीमारियों का इलाज बिल्कुल नहीं है।
दूसरे ही दिन साधना ने हरिहर बाबू और उनकी पत्नी सुशीला को फोन करके बधाई दी। चुनाव की तैयारी को लेकर शाम को हुई बैठक में नगरपालिका चुनाव का प्रभारी साधना को सर्वसम्मति से बनाया गया। चुनाव की तारीख ज्यादा दूर नहीं थी, इसलिए पार्टी स्तर पर कई टोलियां सुशीला को जिताने में लग चुकी थी।
साधना भी अपने स्तर पर प्राण-पण से जुट गई थीं। उन्हें इस बात की तो तसल्ली थी कि सुशीला जी जीतेंगी या फिर कोई अन्य महिला, पर इन सबसे जीत आखिर में सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों की होगी।
मतदान का दिन ज्यों-ज्यों नजदीक आ रहा था, दलीय-निर्दलीय सभी प्रत्याशियों की सांसें फूलने लगी थीं। कारण था मतदाताओं की चुप्पी। ऊंट किस करवट बैठेगा? कहना मुश्किल हो रहा था, लेकिन ऐसे चुनावी समय में लगभग सभी प्रत्याशियों के पास जीतने के अपने-अपने समीकरण होते हैं, जो उनमें दम भर देते हैं। सुशीला की पार्टी से ही प्रदेश में मुख्यमंत्री होना एक जिताऊ कारक था, तो अन्य प्रत्याशियों के भी अपने-अपने फार्मूले थे।
पर, सुशीला के पति हरिहर बाबू जिस प्रत्याशी के जिताऊ समीकरण से ज्यादा चिंतित थे, उसे राजनीतिशास्त्र की प्राध्यापिका और वर्तमान में चुनाव प्रभारी साधना बस एक मजाक मान रही थीं। मजाक ही तो था ‘परवीन पत्नी भाई अनीश साह’ नाम से जिनका पोस्टर पूरे शहर में चस्पां था, उसमें परवीन का तो कहीं फोटो ही नहीं था और न ही परवीन को पूरे शहर में किसी ने देखा था। क्योंकि परवीन के समुदाय में महिलाएं परदे में रहती थीं। अनीश साह और उसके समर्थक पूरे शहर में विशेष रूप से अपने समुदाय के लोगों के बीच में प्रत्याशी परवीन को साथ लिए बिना ही घूम-घूम कर वोट मांग रहे थे। साधना ऐसे प्रत्याशी की जीत की बात सोचने-समझने को तैयार नहीं थीं।
मतदान में आखिरी चार दिन बचे थे। हरिहर बाबू ने चुनाव में एक समुदाय विशेष की परवीन के लिए एकजुटता को ध्यान में रखते हुए धार्मिक कार्ड खेलने का मन बना लिया था। चुनावी बैठक में साधना से जब इस संबंध में हरिहर बाबू ने बात की तो उन्होंने ऐसे चुनावी हथकंडे अपनाने से अपनी असहमति जता दी। फिलहाल सभी चुनावी रणनीतियां चुनाव प्रभारी होने के बावजूद साधना के हाथों में नहीं थीं। हरिहर बाबू को जो भी जिस हद तक करना था उन्होंने किया।
वह दिन भी आया जब मतदान संपन्न हो गया। मतगणना होनी बाकी थी। जैसा कि कहते है, क्रिकेट में अंतिम गेंद फेंके जाने और लोकतंत्र में आखिरी मत के गिने जाने तक किसी को उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए। सो, सुशीला और हरिहर बाबू सहित अधिकतर प्रत्याशी और उनके पति चुनाव में जीत की उम्मीदों से लबरेज थे। साधना भी लोकतंत्र के चुनावी पर्व में महिलाओं की सौ प्रतिशत भागीदारी के नाम पर जितनी भी भागीदारी हो पाई थी, उससे बहुत हद तक संतुष्ट थीं। पार्टी ने मतगणना के लिए एक दूसरी टीम तैयार की थी। साधना चुनावी व्यस्तता के कारण पूरे न हो पाए अपने पारिवारिक और पेशेगत अपेक्षाओं को पूरा करने में जुट गई थीं।
प्रदेश भर में एक साथ मतगणना का दिन भी आया। साधना के नगरपालिका क्षेत्र में शुरुआती दौर में तो सुशीला पति हरिहर बाबू और परवीन पति भाई अनीश साह के बीच आगा-पीछा चला, पर मतगणना के अंतिम चक्र के रुझान को देखते हुए साधना ने टीवी बंद कर दिया था। उसे लगा कि अपनी कक्षाओं में जिस लोकतंत्र का वह पठन-पाठन करवाती रही है, उसकी सांसें उखड़ रही हैं। बिना चेहरे वाली महिला प्रत्याशी ने चेहरे वाली महिलाओं को हरा दिया है। उससे भी बड़ी बात यह थी कि हराने वाली भी कहां जीत पाई थी? जीता तो कोई और ही था।
