वंदना शुक्ल

तूने की है न नगर पालिका में बड़े बाबू को शिकायत?’ बबलू ने अपने दोस्त टीका से कहा।

‘हां की है… गलत है क्या? अपनी आंखों से देखा है, कोई झूठ थोड़े ही कहा…।’ टीका ने छाती ठोंक कर कहा।

‘मगर गिनती तो सही ही थी न… खुद कारपोरेशन ने की थी और अखबार में फोटू भी आया था।’ बबलू ने सफाई दी।

‘फोटू देख के ही तो पोल खुली। सब जानते हैं हम… अब हमसे ये नौटंकी तो ना करो।’ टीका ने हंसते हुए कहा।

‘कौन-सी नौटंकी भाई… पूरी दुपहरिया मारे-मारे फिरते हैं एक कॉलोनी से दूसरी और फिर उन्हें पकड़ना कोई हंसी-खेल है क्या। हम पर ही हमला कर दें।…’ बबलू कहते हुए उदास हो गया।

‘हां, वह सब ठीक है, लेकिन बेईमानी तो की ही है न। फिर टीका लल्लू की तरफ देख कर बोला- ‘और तो और भैया, ये बबलू काका इत्ते लालची निकले कि अपना पालतू कुत्ता भी जमा करा आए आवारा कुत्तों की गाड़ी में… पचास रुपैया के लालच में… छि: छि:।’

सुन कर बबलू की देह में सिहरन-सी दौड़ गई। लगा मानो अचानक चलते-चलते जोरों की ठोकर लगी हो। बोला, ‘हओ करा दिए जमा अपने कल्लू को भी। अरे तो घर का पूरा पैसा औरत की दवा-दारू में खर्चा हो रहा हो, खाने को न हो तो का करें? बच्चों को भूखे मरने दें?’

बबलू के दिल का दर्द चेहरे पर उतर आया। पैदा हुए से पाला था उसने कल्लू को। बच्चे भी उससे कितने हिले थे। दिल पर पत्थर धरके उसने अपने प्रिय पालतू कुत्ते को जमा कराया म्युनिसिपालिटी में। इतना समझदार, प्यारा और घर भर से हिला कुत्ता आवारा कटखने कुत्तों के साथ…। उस दिन गाड़ी में बस दो कुत्ते फंसे और बीवी दो दिनों से बिना दवाई के पड़ी थी। दमा उखड़ रहा था, क्या करता? मर जाती तो उन जवान छोरियों की देखभाल कौन करता? उसकी आंखें भर आर्इं।

नीम के नीचे चबूतरे के एक कोने में तीनों दोस्त उकडूं बैठे थे। बीच में नमकीन की पुड़िया और ‘गुलाब’ की बोतल रखी थी। तीनों की उंगलियों में जलती हुई बीड़ी फंसी थी।

तीसरे दोस्त, जिसका नाम लल्लू था, ने पूछा, ‘अरे लेकिन हुआ क्या हमें भी तो बताओ कुछ?’

टीका ने कहा, ‘अरे लल्लू भैया, अभी कुछ दिन पहले नगर पालिका ने दीवालों पे नोटिस चिपकाए थे कि शहर में कटखने आवारा कुत्तों का प्रकोप बढ़ रहा है। कई लोगों को बुरी तरह घायल कर चुके हैं। जनता का सड़कों पर निकलना दूभर हो गया है। जो आदमी इन कुत्तों को पकड़ कर लाएगा, उसे प्रति कुत्ता पचास रुपए दिए जाएंगे। खबर सुन के अपने बबलू भैया ने कुत्तों को पकड़ना शुरू किया है। लेकिन…’

बबलू ने उसे बीच में टोका, ‘टीका, तू जानता है उससे पहले कित्ता पैसा खत्म किया हमने अपनी गांठ से? एक दोस्त जिसके पास कूड़ा ढोने वाली दो काठ की गाड़ियां थीं उससे एक किराए पर ली और उसमें लोहे की जाली लगवाई। तू ही सोच टीका, अपन सफाई कर्मचारियों को कितना पगार मिलता है। उसमें से भी कागद पर सही कितने पर कराए और…। फिर मेरी जिम्मेदारियां तो देख, दो लौंडिया ब्याहने को, औरत सदा बीमार। तेरे तो दो छोरे हैं, ऊपर से तेरी मेहरारू भी तो सड़क बुहारने में तेरा हाथ बंटाती है। रोजाना सौ रुपैया खीसे में दाब कर घर जाते हो दोनों मियां बीवी। और यहां तो…’

‘अरे वो सब ठीक, लेकिन धोखाधड़ी तो आज तक नहीं ना की। दोनों धनी लुगाई मेहनत से पैसा कमाते हैं।’ टीका के चेहरे पर गर्व था।

‘ठीक है चलते हैं अब, दवाखाने भी जाना है घरवाली की दवा लेने।’ कह कर बबलू उठ खड़ा हुआ।

अगले दिन नगरपालिका कार्यालय में ठीक ग्यारह बजे हाजिर होना था बबलू को। शिकायत ऊपर तक पहुंच गई थी। अखबार में छपने के बाद तो जैसे खबर के कई मुंह उग आए थे- ‘छि: छि:… जानवर पे अत्याचार करके अपनी तिजोरी भर रहा है…’ उसके अड़ोसी-पड़ोसी सफाई कर्मचारी ताने दे रहे थे, तो कोई कह रहा था- ‘देखो आदमी को जरा-सा कहीं मौका मिल जाए, वहां भी बेईमानी खोज लेता है। पांच कुत्तों को रोज पकड़ता है और दस का पैसा लेता है… बेईमान कहीं का।’

ठीक साढ़े दस बजे बबलू नगरपालिका दफ्तर में हाजिर हो गया और दरवाजे पर ही उकडूं बैठ गया। कार्यवाही पूरी होने तक उसे रोजनदारी से दो दिन के लिए निलंबित कर दिया गया था। हर आने-जाने वाला आदमी उसकी ओर सशंकित दृष्टि से देख रहा था। कोई उसे देख कर कनखियाते हुए हंसता, कोई एकाध जुमला फेंक निकल जाता। वह चुपचाप जमीन में सिर गड़ाए अपराधी भाव से बैठा रहा। एक बाबू अचानक रुक गया।

‘क्यों बे, तू तो यहां सफाई कर्मचारी है न?’

बबलू उठ खड़ा हुआ, ‘जी सर… कॉलोनी में बुहारू करता हूं।’

‘हां, कल तेरी फोटू अखबार में भी तो छपी है? क्या घपला कर दिया रे?’ बाबू हंस कर बोला।

‘कुछ नहीं सर…।’ कह कर बबलू ने आंखें नीची कर लीं।

‘चल मजे कर…।’ कह कर बाबू कार्यालय में घुस गया।

बारह बज गए, लेकिन बड़े साहब अभी तक नहीं आए, जिनके सामने पेशी होनी थी।

कुछ देर में साहब अपनी गाड़ी से उतरे, खुद चेयरमैन साहब आए थे। उन्हें देख बबलू का दिल जोर से धड़कने लगा। उसने झुक कर साहब को प्रणाम किया, लेकिन वे उसे अनदेखा कर अपने अन्य सदस्यों के साथ अंदर चले गए।

करीब आधा घंटे बाद एक आदमी बाहर आया। उसने कहा, ‘चल बे, साहब बुलाते हैं… पेशी है तेरी।’

बबलू उठा और कांपते पैरों से कमरे का दरवाजा खोला, ‘सलाम साब…’ उसने हाथ माथे तक ले जाकर धीरे से कहा।

चेयरमैन सहित अंदर चार लोग कुर्सी पर बैठे थे। कल का अखबार उनके सामने टेबल पर खुला रखा था। अखबार के एक कोने में बबलू की तस्वीर सहित एक छोटी-सी खबर थी। खबर पर लाल गोला खिंचा था। बबलू का जी हलक को आ गया। गला बुरी तरह सूख गया। वह हाथ जोड़ कर ऐसे खड़ा हो गया जैसे इसी मुद्रा में खड़े होने की उसे सजा मिली हो। चार-पांच लोग फाइलें लेकर खड़े थे।

‘सर वो आदमी आ गया… ए बबलू…’

साहब ने अनजाने से भाव से देखा, ‘सर, वही कुत्ते पकड़ने वाला आदमी… ये देखिए सर, कल अपने ऑफिस की खबर छपी है न अखबार में…’ कह कर कर्मचारी ने अखबार साहब के सामने रख दिया।

‘हां हां खासतौर पर इसी की तफ्तीश करने यहां आए हैं…’

‘जी सर यही है…’ सामने खड़े बबलू की ओर इशारा करते हुए उस कर्मचारी ने कहा।

चेयरमैन साहब ने अपने गोल्डन फ्रेम के चश्मे में से उसे घूर कर देखा।

‘यहां… इधर आ सामने…’ उन्होंने कहा।

‘जी सर…’ बबलू उसी तरह झुका हुआ हाथ जोड़ कर सामने आकर खड़ा हो गया।

‘तो, आजकल नोट छाप रहा है बे, क्यों?’

‘नहीं सर… वो आवारा कुत्तों को पकड़ने का नोटिस लगा था आफिस में तो…’ बबलू हकलाता-सा बोला।

‘अच्छा काम कर रहा है, लेकिन अखबार में क्या छपा है जानता है?’

‘हओ सर, लेकिन बेईमानी जरा भी नहीं की। सर सच्ची… आप विशवास करो… मैं जानबूझ कर दस कुत्तों को नहीं पकड़ रहा… मैं अकेला बूढ़ा आदमी कैसे दस, वो भी आवारा कटखने कुत्तों को पकड़ सकता हूं?’

‘अरे दद्दू, यही तो लिखा है अखबार में कि एक अकेला आदमी वो भी टूटी-फूटी सी रेहड़ी पर दस-दस कटखने कुत्तों को पकड़ कर जमा करा रहा है और ईनाम के रोज पांच सौ रुपए बेईमानी से कमा रहा है। शिकायत यह भी मिली है कि कुछ बंगले वालों ने धमकी दी है कि उनके पालतू कुत्तों को भी तूने पैसे के लालच में पकड़ लिया। वे मुआवजा मांग रहे हैं।’

‘सरासर गलत है सर ये। पट्टे वाले कुत्तों को मैंने कभी नहीं पकड़ा। वो तो जो…’

‘अच्छा बता, और किस-किस की मिलीभगत है इसमें? कमीशन…’

जब तक बबलू कुछ बोल पाता साहेब ने पलट कर बाबू से कहा, ‘कुत्ता भर्ती’ में कौन लोग हैं उन्हें भी तलब करो… ये सब चोट्टे हैं साले।’ ‘जी सर…’ कह कर कर्मचारी लगभग भागता हुआ बाहर चला गया।

‘सर इससे पूछिए यह किस तरीके से पकड़ता है दस कुत्ते? या मिलीभगत से खाली पीली पेपरों में संख्या दर्ज है, बस। अभी दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।’ एक कर्मचारी ने साहब के कान में फुसफुसाते हुए कहा।

‘हां भाई, बोल क्या जादू है तेरे हाथ में, कि तू बाहुबली है जो हर मुहल्ले से आठ-दस कुत्ते अकेले पकड़ कर जमा करा आता है… बता?’

बबलू ने पूरी बात उन्हें बताई।

‘नहीं, यह अविश्वसनीय है सर… यह झूठ बोल रहा है।’ वहां खड़े दो-तीन चापलूस कर्मचारियों ने कहा।

साहब कुछ देर मेज पर रखा पेन गोल-गोल घुमाते कुछ सोचते रहे, फिर बोले, ‘ठीक है, तू कुत्ते पकड़। हम तेरी बात पर विशवास कर रहे हैं। अब जा फूट यहां से…’

बबलू को यकीन नहीं हुआ कि मामला इतनी जल्दी कैसे सुलट गया। उसने मन ही मन साहब को धन्यवाद दिया और ऊहापोह में डूबते-उतराते घर चला गया।

साहब ने संबंधित अधिकारियों से कहा, ‘मीडिया को यह यकीन दिलाना जरूरी है कि क्या सही है, क्या गलत, नहीं तो वह रोज इस मामले को उठाएगा और तूल देगा। इससे हमारे विभाग की किरकिरी होगी। हम देखेंगे कि यह सही कह रहा है कि झूठ।’ साहब ने बाबू से कहा, ‘कल फोटोग्राफर को बुलाओ। पूरी रिपोर्ट तस्वीर सहित पेश करो।’ कह कर साहब उठ कर चले गए।

तीसरे दिन :

साहब के ऑफिस में पत्रकार, फोटोग्राफर, संबंधित मामला अधिकारी मौजूद थे। एक कर्मचारी ने बताया- ‘सर, कल हम लोग छिप कर देखने गए थे कि ये कुत्ते पकड़ता कैसे है। रिपोर्ट तो सर इस फाइल में पूरी दर्ज है और सर वीडियो और तस्वीरें ये हैं।’ कह कर अधिकारी ने मय मोबाइल के पूरी रिपोर्ट सामने रख दी। साहब वीडियो को गौर से देखने लगे। उसमें बबलू पसीने से लथपथ गली-मुहल्ले में रेड़ी लेकर घूम रहा था। उसने रेहड़ी में कुछ खाने का सामान रख दिया और छिप कर खड़ा हो गया। गली के कुत्ते रेहड़ी में घुसने लगे और रखा हुआ भोजन खाने लगे। बबलू ने झट से रेहड़ी का गेट बंद कर दिया और ताला लगा दिया। कुत्ते उसमें कुलबुलाने लगे। बुरी तरह भौंकने लगे। उनकी आवाज सुन कर आसपास के मुहल्ले के कुत्ते वहीं रेहड़ी के पास सिमट आए और वे भी अपने साथियों के बचाव में भौंकने लगे। अंदर-बाहर कुत्तों की फौज ।

ऐसे भौंक रहे थे जैसे सवाल-जवाब कर रहे हों, या फिर बाहर खड़े कुत्ते अंदर कैद कुत्तों को अपने होने का हौसला दे रहे हों। पूरा मुहल्ला कुत्तों के भौंकने से गूंज गया। पेड़ की ओट में छिपा बबलू एक बड़ा डंडा लेकर वहां आया। बाहर भौंकते हुए कुत्तों को उसने उस डंडे से हड़काया और रेहड़ी के हैंडल हाथ से पकड़ कर उसे खींच कर ले जाने लगा। बाहर भौंकने वाले कुत्ते कुछ देर अपने साथियों को छुड़वाने के लिए बबलू पर हमला करने की कोशिश करते रहे। एक कुत्ते ने उछल कर उसके हाथ पर भी वार किया, लेकिन बबलू ने फुर्ती से खुद को उसके पंजे से छुड़ा लिया और खरोंच को सहलाते रेहड़ी खींचने लगा। हार-थक कर कुत्ते खामोश हो गए और सिर झुकाए ऐसे उस रेहड़ी के पीछे-पीछे चलने लगे जैसे किसी जनाजे के साथ जा रहे हों। बहुत भगाने पर भी बंद कुत्तों के साथी वापस नहीं लौटे और रेहड़ी के पीछेपीछे चलते हुए ‘कुत्ता जमा केंद्र’ तक आ गए और उन्हें भी अन्य कुत्तों के साथ पकड़ लिया गया।

यह सब दृश्य देख-सुन कर चेयरमैन साहब जोर-जोर से हंसने लगे। इतने कि उनका थुलथुल पेट उछलती गेंद की मानिंद जोर-जोर से हिलने लगा। हंसी थी कि रुक ही नहीं रही थी। सब कर्मचारी भी साहब की हंसी में अपनी हंसी मिलाने लगे। कुछ हंसी रुकी तो साहब बोले, ‘कमाल है, अपने बंद साथियों को बचाने सब बेवकूफ चले आए और खुद भी…’ कह कर साहब फिर हंसने लगे। ‘जानवर में सचमुच अकल नहीं होती…’ कह कर फिर हंसने लगे। ‘साहब, तभी तो वे जानवर हैं।…’ एक कर्मचारी के कहने पर सब लोग फिर ठठा कर हंस पड़े।