मोहम्मद अरशद खान

अम्मा, ईद कल होगी या परसों?’ अब्दुल्ला ने खिड़की से आसमान निहारते हुए पूछा।

अम्मा सलमा को दवा पिला रही थी। दो साल की उस मासूम बच्ची की तबीयत खराब चल रही थी। अम्मा का सारा ध्यान उसे दवाई पिलाने में लगा था।

थोड़ा इंतजार करने के बाद अब्दुल्ला ने अम्मा की ओर देखा। उसे अपनी तरफ ताकता पाकर अम्मा ने लंबी सांस भरी और कहने लगीं, ‘जब अल्लाह की मर्जी होगी, तब होगी। अगर आज चांद निकल आया तो कल, नहीं तो परसों।’
‘अम्मा, मगरिब का वक्त हो रहा है। मैं नमाज पढ़ने जाऊं।’

‘हां बेटा, अल्लाह से खूब दुआ करना। अल्लाह मासूम बच्चों की दुआएं जरूर कुबूल करता है।’ अम्मा ने छलक आई आंखें छिपाते हए कहा।

फिर अब्दुल्ला मगरिब की नमाज के लिए मस्जिद चला गया।

अब्दुल्ला के अब्बा मजदूरी करते थे। साल भर पहले दो मंजिला इमारत पर सीमेंट की बोरी पहुंचाते हुए फिसल कर गिर पड़े थे। दो दिन अस्पताल में भर्ती रहने के बाद वह इस दुनिया को छोड़ गए। अब अम्मा ही घरों में झाड़ू-बर्तन करके दोनों बच्चों का पेट पाल रही थी।

नमाज खत्म होते ही लोग जल्दी-जल्दी घरों की ओर बढ़ लिए। घर की औरतें चांद देखने के लिए पहले से छतों पर जमा थीं। अब्दुल्ला भी मस्जिद से बाहर आकर आसमान निहारने लगा। वहां से आसमान का एक टुकड़ा भर दिखाई देता था। तभी महमूद उधर आया और कहने लगा, ‘अब्दुल्ला, तुम्हारी अम्मा दरवाजे पर परेशान खड़ी हैं। जल्दी जाओ वर्ना पानी चला जाएगा।’

चांद देखने की उत्सुकता में अब्दुल्ला आज भूल ही गया कि उसे सड़क पर लगे नल से पानी भी भरना है। अम्मा सलमा को छोड़ कर तो जा नहीं सकती थीं। वह तेजी से घर की ओर भागा।

घर का काम निपटा कर अब्दुल्ला ने मैदान का रुख किया। वहां से आसमान साफ दिखाई देता था। मैदान में भीड़ तो अब भी थी। पर अब लोग आपस में बैठे बातें कर रहे थे। कुछ दुकान पर खड़े चाय पी रहे थे और हंसी-चुहल कर रहे थे। उनका ध्यान अब आसमान की ओर नहीं था।

‘क्या चांद दिखाई दिया?’ अब्दुल्ला ने वहां खड़े एक आदमी से पूछा।

‘पता नहीं।’ उसने उपेक्षा से कंधे उचकाए।

अब्दुल्ला को उसके उत्तर पर हैरानी हुई।

तभी साथ खड़े दूसरे आदमी ने पान थूकते हुए कहा, ‘जाओ टीवी पर खबर देखो, वहीं पता चलेगा। यहां तो बादलों की वजह से किसी को नजर नहीं आया।’ और फिर दोनों वहां से चले गए।

अंधेरा गहराने लगा था। लाइट थी नहीं। लोगों ने अपनी दूकानों और घरों में रोशनी कर रखी थी, पर उसके बावजूद सड़कों पर अंधेरा था। अब्दुल्ला थके कदमों से घर की ओर बढ़ चला। तभी महमूद उधर दौड़ता हुआ आया और कहने लगा, ‘बजरंगी ने अपनी गुमटी पर छोटा टीवी लगा रखा है। चल, वहां पता करते हैं।’

‘नहीं यार, मुझे घर जाना है। अम्मा खाना बनाने के लिए बैठी होंगी। मुझे सलमा को देखना होगा।’ अब्दुल्ला मन मार कर बोला।

‘ठीक है तू जा, मैं पता लगा कर आता हूं।’ और महमूद भागता हुआ निकल गया।

अब्दुल्ला घर लौटा तो अम्मा सचमुच उसका इंतजार कर रही थीं। आते ही वह सलमा से बातें करके उसे बहलाने लगा।

खाना बनाने के बाद अम्मा ने ढिबरी बुझा दी। सामने वाले घर में जल रहे बल्ब से कोठरी में थोड़ी-बहुत रोशनी आ रही थी। अम्मा हाथ धोकर आर्इं तो अब्दुल्ला पूछने लगा, ‘अम्मा, अगर कल ईद हो गई तो?’

अम्मा कुछ न बोलीं। बस कंपकंपाती-सी आह भर कर रह गर्इं।

अब्दुल्ला ने फिर पूछा, ‘अम्मा, तुम तो कहती थी कि शाम तक दर्जी हमारे कपड़े दे जाएगा। पर अब तो उसकी दूकान भी बंद हो गई होगी। अगर कल ईद हो गई तो हम लोग क्या पहनेंगे?’

अम्मा की आंखें छलक आर्इं। उसके पास इतने पैसे ही कहां थे जो बच्चों के कपड़े सिलवाती। उसने तो झूठा दिलासा दे रखा था। पर अब उसका दिल यह सोच कर कांप रहा था कि जब झूठ खुलेगा तो बच्चों पर क्या बीतेगी। हालांकि मुहल्लेवालों ने उसकी मदद के लिए पैसे दिए थे। जिन घरों में काम करती थी, वहां से भी थोड़ी बहुत मदद मिली थी। पर सलमा को बीमारी क्या लगी कि पास की जमा-पूंजी भी उड़ गई। घर में दो जून खाना बन पा रहा था, यही बड़ा चमत्कार था। उसने हाथ फैला कर मन ही मन कहा, ‘या मेरे मालिक, इन बच्चों का दिल रख ले। मैंने झूठ के सहारे कब से इन दोनों को बहला रखा है। कल अगर ईद हो गई तो इन्हें क्या जवाब दूंगी, मौला।’ और अम्मा रो पड़ी। उस नीम अंधेरे में अब्दुल्ला अम्मा की आंखों में आंसू न देख पाया।

तभी दरवाजे पर किसी ने आवाज दी, ‘बड़ा सन्नाटा है, सब अभी से सो गए क्या?’

अम्मा लपक कर आर्इं तो देखा दयाराम खड़ा था। वह अब्दुल्ला के अब्बा के साथ मजदूरी करता था। उसके हाथों में कपड़ों की थैलियां थीं।

अब्दुल्ला चौंक कर उठ पड़ा और कहने लगा, ‘अरे वाह, मेरे कपड़े आ गए। चाचा, क्या दर्जी ने कपड़े आपके हाथ भिजवा दिए?’

‘हां मेरे बच्चे,’ दयाराम का स्वर भीग गया।

सलमा अपने कमजोर हाथों से कपड़ों को छूकर खुश हो रही थी और अपनी तोतली आवाज में कह रही थी, ‘अम्मा इतने अच्छे कपड़े क्या मेरे लिए हैं?’

अम्मा चुप थी। आंसुओं से उसका गला रुंधा जा रहा था। वह कुछ बोलने को हुई, पर दयाराम ने इशारे से उसे चुप करा दिया।

अब्दुल्ला कपड़े तन से लगा कर देख रहा था और कह रहा था, ‘अम्मा तुम तो कहती थीं कि दर्जी के पास वक्त नहीं है; उसे बहुत काम है; पता नहीं कपड़े सिल भी पाएगा कि नहीं? पर देखो उसने कितने अच्छे कपड़े सिले हैं।’

अब्दुल्ला दयाराम से आकर लिपट गया, ‘आप बहुत अच्छे हैं चाचा।’

दयाराम ने उसके सिर पर हाथ फेरा और बोला, ‘सिवइयां बनवा कर रखना। कल खाने आऊंगा।’

बच्चों को दुलार कर दयाराम बाहर निकल आया।

उधर मस्जिद में एलान हो रहा था, ‘हजरात, चांद देखे जाने की तस्दीक हो गई है। ईद इंशाअल्लाह कल मनाई जाएगी।