बोधिसत्व
लक्ष्य देखना
अर्जुन को
बहुत दूर से दिखी चिड़िया की आंख
उसने सफलता से किया लक्ष्य संधान।
अर्जुन को खौलते जल में दिख गई
ऊपर चक्र में घूमती मछली की आंख
उसने फिर सफलता पाई
भेद कर आंख।
किंतु लक्ष्य और सफलता के लिए विकल
धनुर्धर वह कभी झांक नहीं पाया
द्रौपदी की डबडबाई आंखों में।
हर स्थिति में जीतने की सोच
अक्सर बड़ी पराजय के कुरुक्षेत्र में
उस कुचक्र तक पहुंचा देती है जहां निहत्थे सूतपुत्र को
उसके रथ का चक्र निकालते समय भी मार देने
को धर्म मान लेता है मन।
सिर्फ लक्ष्य संधान ही रह जाता है जीवित।
हम भूल जाते हैं कि
किसी की नम आंखों में झांकने के लिए
अपनी आंखों में भी पानी आवश्यक होता है
और उलझन की बात यह है कि
पानी भरी आंखें
लक्ष्य संधान में
व्यवधान कर जाती हैं।
चिड़ियों मछलियों की आंखों पर
निशाना साधने वाला अर्जुन
जीवन भर लक्ष्य से भटकता रहा
मछली की आंख में लगा बाण
द्रुपदसुता को जीवन भर खटकता रहा।
चूक जाए निशाना भले
असफलता का खतरा उठा कर भी
देखना तो आंखों में देखना
झांकना तो मन में झांकना।
पीठ पर साबुन
तुम कहती हो
साबुन लगा दो पीठ पर
हाथ नहीं पहुंचते हैं।
तुम्हारी पीठ पर साबुन लगा कर
प्रार्थना करता हूं
सबके हाथ छोटे ही रहें
न पहुंचे खुद की पीठ पर
किसी भी युग में कभी।
पीठ थपथपाना हो धप्पा जमाना हो
या लगाना हो साबुन
किसी और के हाथ की प्रतीक्षा रहे सभी को।
जैसे रहती है मुझे
तुम्हारे हाथ की प्रतीक्षा
मेरी पत्थर पीठ पर।
पीठ पर साबुन लगवाना या लगाना
किसी दूसरे के हाथ को अपना बनाना होता है
कभी किसी दूसरे का हाथ बन जाना होता है।
यह अपनी पीठ पर पराए हाथ का आग्रह ही
पाणि ग्रहण है।
पौधे का पिता
एक मुरझाया पौधा दिखा
राह के किनारे।
उसे पानी दिया
उसकी धूल से रंगी
पत्तियों को धोया उसे नहलाया
इस तरह
पौधे का पिता होने का सुख पाया।
