प्रारंभिक जीवन
विष्णु प्रभाकर का जन्म उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के गांव मीरापुर में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा मीरापुर में ही हुई, बाद में उनकी माता ने उन्हें हिसार भेज दिया। दसवीं की परीक्षा उन्होंने वहीं से दी। घर की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण उन्होंने दसवीं के बाद सरकारी नौकरी शुरू कर दी। नौकरी के साथ आगे की पढ़ाई भी जारी रखी। उन्होंने हिंदी में प्रभाकर और हिंदी भूषण की उपाधि के साथ ही संस्कृत में प्रज्ञा और अंग्रेजी में बीए की डिग्री हासिल की। नौकरी के साथ-साथ उनकी रुचि साहित्य में भी जगी और हिसार में एक नाटक कंपनी के साथ जुड़ गए। उनकी पहली कहानी ‘दिवाली की रात’ 1931 में लाहौर से निकलने वाले समाचारपत्र ‘मिलाप’ में छपी थी, तब वे केवल उन्नीस वर्ष के थे। उसके बाद उनके लेखन का सिलसिला छिहत्तर साल की उम्र तक चलता रहा। आखिरकार उन्होंने लेखनी को अपनी पूर्णकालिक करिअर बना लिया था। विष्णु प्रभाकर का नाम उनके जीवन काल में कई बार बदला। उनके माता-पिता ने उनका नाम विष्णु दयाल रखा था, पर प्राथमिक कक्षा में शिक्षक ने उनका नाम विष्णु गुप्त दर्ज कर दिया। जब वे सरकारी नौकरी में आए तो उनके अधिकारी ने उनका नाम बदल कर विष्णु धर्मादत्त कर दिया। पर वे लेखन विष्णु नाम से ही करते रहे। फिर उनके संपादक ने कहा कि क्यों न तुम आपना नाम बदल कर विष्णु प्रभाकर कर दो। तभी से उनका नाम विष्णु प्रभाकर हो गया।
प्रमुख रचनाएं
विष्णु प्रभाकर ने प्रचुर लेखन किया था, पर उन्हें अपने दो उपन्यासों ‘आवारा मसीहा’ और ‘अर्धनारीश्वर’ से काफी प्रसिद्धि मिली। ‘आवारा मसीहा’ बांग्ला कथा-शिल्पी शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के जीवन पर आधारित है। यह जीवनी होते हुए भी किसी रोचक उपन्यास से कम नहीं है। इसे लिखने में विष्णु प्रभाकर ने चौदह साल लगा दिए। ‘आवारा मसीहा’ की सबसे खास बात यह है कि इसमें कोई भी घटना काल्पनिक नहीं है। विष्णु प्रभाकर ने उन व्यक्तियों के साक्षात्कार लिए, जो किसी न किसी रूप में शरत चंद्र चट्टोपाध्याय से संबंधित रहे। इसके अलावा उन्होंने उनके समकालीन मित्रों के लेख संस्मरण और अपनी रचनाओं में बिखरे प्रसंगों को लिखा। इसके अलावा ‘ढलती रात’, ‘स्वप्नमयी’, ‘धरती अब भी घूम रही है’, ‘क्षमादान’, ‘दो मित्र’, ‘पाप का घड़ा’, ‘होरी’, ‘नव प्रभात’, ‘प्रकाश और परछाइयां’, ‘बारह एकांकी’, ‘अब और नहीं’, ‘मेरा वतन’, ‘आदि और अंत’, ‘पंखहीन’ उनकी प्रसिद्ध रचनाएं हैं।
सम्मान और पुरस्कार
कहानी, उपन्यास, नाटक, एकांकी, संस्मरण, बाल साहित्य सभी विधाओं में प्रचुर साहित्य लिखने के बावजूद ‘आवारा मसीहा’ उनकी पहचान का पर्याय बन गई। आवारा मसीहा के लिए उन्हें सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार से सम्मनित किया गया। ‘अर्द्धनारीश्वर’ के लिए उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्हें 1995 में महापंडित राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार और 2004 में देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।
निधन: लंबी बीमारी के बाद 2009 में उनका निधन हो गया।
