जहीर कुरेशी
छायावादी कविता के बाद के कवियों में गुलाब खंडेलवाल एक विशिष्ट कवि हैं। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने अपने जीवन-काल में गीत, मुक्त छंद, प्रबंध-काव्य, गीति नाट्य, सॉनेट, कता, रुबाई और गजल पूरे अधिकार के साथ लिखा। हिंदी गजल के प्रमुख कवि दुष्यंत कुमार ने भी उनसे गजल-प्रभाव ग्रहण करने की बात स्वीकार की थी। सत्तर के दशक से थोड़े पहले दैनिक ‘आज’ (वाराणसी) के एक नियमित साप्ताहिक स्तंभ में गुलाब खंडेलवाल की गजलें छपती थीं, जिन्हें उस समय दुष्यंत कुमार लगातार पढ़ते और आत्मसात करते रहे। वहीं से दुष्यंत के मन में गजल कहने के प्रति तीव्र ललक पैदा हुई। इस प्रकार, गुलाब खंडेलवाल दुष्यंत के पूर्ववर्ती गजलगो सिद्ध होते हैं।
गुलाब जी के पहले गजल-संग्रह ‘सौ गुलाब खिले’ की देवनागरी में लिखी एक सौ नौ गजलें उर्दू प्रकृति की गजलें नहीं हैं। इनका स्वभाव उर्दू से अलग, नितांत हिंदी का है। ‘हमने गजल का और भी गौरव बढ़ा दिया/ रंगत नई तरह की जो भर दी ‘गुलाब’ में।’
चूंकि गुलाब खंडेलवाल मुक्तक, कता, रुबाई, सॉनेट से गुजर कर, हिंदी काव्य में गजल तक आए थे, इसलिए उनके शेरों में वांछित सांकेतिकता मिलती है, जो गजल का अपरिहार्य अंग है। मसलन, ‘मेहंदी लगी हुई है उमंगों के पांव में/ सपने में भी तो आपसे आया न जाएगा।’ ‘हम किनारे से दूर जा न सके/ एक चितवन बंधी थी नाव के साथ।’
इन गजलों में गुलाब खंडेलवाल ने उर्दू कविता की परंपरागत प्रतीक योजना से अपने आप को यथासंभव बचाया है। कथ्य के लिहाज से ‘सौ गुलाब खिले’ की गजलें उर्दू की परंपरागत रूमानी गजलों से बिल्कुल अलग नहीं हैं। उन गजलों के विषय में, इतना अवश्य कहा जा सकता है कि गजल की सुपरिचित भूमि पर रह कर भी शायर ने हिंदी के स्वीकृत सौंदर्यबोध को निरंतर उच्च से उच्चतर बनाने की कोशिश की है। खंडेलवाल के दूसरे गजल संग्रह ‘पंखुड़ियां गुलाब की’ में भी एक सौ नौ गजलें हैं, जिनकी भाषा से लेकर भावभूमि तक लगभग वही है, जो पहले गजल संग्रह की है। अपने एक शेर में जब गुलाब जी कहते हैं- ‘सिर्फ आंचल के पकड़ लेने से नाराज थे आप/ अब तो खुश हैं कि ये दुनिया ही छोड़ दी हमने!’
पढ़ कर अतिवादी उर्दू शेर ‘गली हमने कही थी, तुम तो दुनिया छोड़े जाते हो’ की याद आती है। इसी कुल के अनेक शेरों में उनका यह शेर भी है-
‘तू मेरे प्यार की धड़कन तो समझता है जरूर/ मैं भले ही कभी होंठों से तेरा नाम न लूं।’
प्रणय-निवेदन, विरह, तड़प, मिलन-आकांक्षा और विवशता से पगे पचीसों शेरों के बीच जब गुलाब खंडेलवाल सामाजिक मनोविज्ञान का एक ऐसा शेर कहते हैं तो बहुत अच्छा लगता है-
‘हर नजर खामोश है, हर घर से उठता है धुंआ/ यह शहर का शहर ही लूटा हुआ लगता है आज।’
उनका उपनाम ‘गुलाब’ उनके कुछेक मकतों में अतिरिक्त चमक पैदा करता दीखता है। जैसे-
‘बनके खुशबू बाग की हद से निकल आए ‘गुलाब’/ लाख अब कोई मिटाए, मिट सकेंगे हम नहीं!’ ‘सिर पे कांटे भी बड़े शौक से रखते हैं ‘गुलाब’/ ताजपोशी तो बिना ताज नहीं होती है।’
उनके शेरों में उर्दू गजल जैसा सहज शब्द-विन्यास, बांकपन और तेवर मिलता है। हालांकि उनका वर्ण्य विषय एक ही है- लौकिक और अलौकिक प्रेम। प्रेम और सौंदर्य का पारस्परिक संबंध गुलाब जी के शेरों में भरपूर और सटीक है। जैसे-
‘अंधेरा था दिल में, अंधेरा था घर में/ कोई रूप की चांदनी लेके आया।’
कई बार विरह और वियोग में भी आनंद की अनुभूति होने लगती है, शायद संयोग से भी अधिक। गुलाब जी की एक ऐसी ही भाव-भूमि का उम्दा शेर-
‘यों तो खुशी के दौर भी आए तेरे बगैर/ आंसू निकल ही आए, मगर हर खुशी के साथ।’
मुहावरों की चाशनी और जुबान की लताफत से ऊपर उठ कर गुलाब जी जब जीवन के विरल गंभीर प्रश्नों पर नजर डालते हैं, तो अच्छा लगता है। जैसे-
‘धोखा कहें, फरेब कहें, हादसा कहें/ इस जिंदगी को क्या न कहें और क्या कहें!’
गुलाब खंडेलवाल के चौथे गजल-संग्रह ‘हर सुबह एक ताजा गुलाब’ तक आते-आते उनकी गजलों की कुल संख्या तीन सौ साठ हो जाती है, यानी ‘हर सुबह एक ताजा गुलाब’। लेकिन, गजलों की इस संख्या तक आने के लिए उन्हें 1971 से 1981 तक का लंबा समय लगा। मार्मिक संवेदना और सहज अभिव्यंजना से सजे गुलाब खंडेलवाल के चौथे संग्रह की गजलों में भी प्रेम का वैभव दिखाई देता है। गजल की अपनी परंपरा और भंगिमा को उन्होंने समस्त विशेषताओं सहित हिंदी में उतारने की संपूर्ण कोशिश की है।
‘नहीं विराम लिया है’ गुलाब खंडेलवाल की 1990 से 1998 के बीच कही गई गजलों का अंतिम गजल संग्रह है। इस संग्रह की आठ ‘नई गजलों’ तक आते-आते गुलाब जी की प्रणय-आकुलता में थोड़ा ठहराव, थोड़ी संजीदगी के दर्शन होते हैं। जैसे-
‘कैसे फिर से शुरू करें इसको/ जिंदगी है, कोई किताब नहीं!’
इसी गंभीरता के तहत गुलाब जी स्वीकार करते हैं कि अब वे उम्र-रसीदा हो गए हैं। अब उन्हें अपनी नौजवानी के साथ-साथ और क्या कुछ याद आता है, मुलाहिजा फरमाएं-
‘फिर इस दिल के मचलने की कहानी याद आती है/ मुझे फिर आज अपनी नौजवानी याद आती है।’
‘कभी गाने को कहते ही, लजा कर सिर झुका लेना/ ‘गुलाब’, अब भी किसी की आनाकानी याद आती है!’
कुल मिला कर, गुलाब खंडेलवाल दुष्यंत पूर्व के एक ऐसे गजलकार थे, जो भाषिक रूप से सचमुच हिंदी के रचनाकार थे। भाषाई स्तर पर, उन्हें मध्यमार्गी हिंदी का गजलकार माना जा सकता है- जिन्होंने गजल के चरित्र और मिजाज को समझा। पहली बार गुलाब खंडेलवाल ने हिंदी को वे गजलें प्रदान कीं, जो हिंदी की अपनी हैं और उसकी अपनी भावभूमि पर खड़ी हैं। गुलाब जी की गजल का प्रमुख वर्ण्य-विषय प्रेम है और प्रणय की भिन्न-भिन्न भूमिकाओं का जैसा सूक्ष्म और सजीव वर्णन उनके शेरों में मिलता है, वह विरल है।
गुलाब जी कमोबेश दुष्यंत से थोड़े पहले के गजलगो थे। उनके लगभग सभी गजल संग्रह 1971 से 1981 के बीच छपे हैं। यह वही कठिन समय था जब देश में ‘आपात-काल’ लगा और अमानवीय प्रतिबंधों के बीच बहुत सारे नागरिकों ने अपार कष्ट सहे। जिस काल-खंड में दुष्यंत सहित सैकड़ों गजलकारों ने गजल छंद में भारतीय राजनीति, उसकी कुटिलता, उसके प्रति जन-आक्रोश के यादगार शेर कहे। उस दुस्वप्न जैसे कालखंड में भी गुलाब खंडेलवाल जैसे प्रतिभाशाली गजलगो का समग्र रूप से प्रेम, सौंदर्य और मोहक रूप की गजलें भर कहते रहना, आश्चर्यचकित करता है!

