तरसेम गुजराल
रूसो जब कह रहे थे कि मनुष्य स्वतंत्र पैदा हुआ है, पर वह हर समय जंजीरों में जकड़ा रहता है, तब स्वतंत्रता का प्रश्न नया न होते हुए भी दिशाओं में गूंजने लगा था। रूसो हर प्रकार के दमन के विरोध में खड़े नजर आते हैं। उनकी अटूट मान्यता थी कि सभ्यता ने मनुष्य में स्वार्थवृत्ति, असमानता, अन्याय, शोषण और दमन की संस्थाओं और प्रवृत्तियों को पैदा किया है। इस धारणा को यह कह कर पुष्ट करते हैं कि सभ्यता की दृष्टि से कम विकसित समाजों में मनुष्य अधिक सुखी था। सभ्यता का विकास सहज व्यक्तित्व के विकास में बाधक रहा, जिससे कुंठाएं पैदा होती रही हैं और कई प्रकार की विकृतियों में अभिव्यक्त हुर्इं। रूसो ‘प्रकृति की ओर’ को चिंतनात्मक आधार देने वाले विचारक हैं।
दरअसल, कॉपरनिकस, गैलीलियो और पूनो नयापन ला रहे थे और धर्म सम्मत मान्यताओं पर प्रश्नचिह्न लगा चुके थे। पुरानी दुनिया से मोह न छोड़ने वालों को देकार्त ने मूल संकल्पना दी। ‘मैं चिंतन करता हूं, इसलिए मैं हूं’ बात जितनी सरल थी उतनी ही जटिल, क्योंकि वह उस वस्तु की वास्तविक सत्ता ही नहीं समझ रहे थे, जिसे विचार से स्पष्ट या यथातथ्य नहीं समझा जा सकता।
स्वतंत्रता को समझने की कोशिश में हम सार्त्र की उपेक्षा नहीं कर सकते। वे कहते हैं कि मनुष्य सिवाय इसके कुछ नहीं, जो वह बनता है। अर्थपूर्ण जीवन उन मूल्यों में है, जिनकी हम खोज करते हैं। मनुष्य स्वतंत्र होने पर विवश है। उसे किसी प्रकार भी नियति का गुलाम नहीं होना है। स्वतंत्र उत्तरदायित्व ही व्यक्ति के अस्तित्व का मापक है। उन्हें यह बुरा लगा कि मनुष्य अपनी स्वतंत्रता से आतंकित है, दूसरे को उसकी स्वतंत्रता से वंचित रखना चाहता है। संसार मनुष्य की रचना है। स्वयं अपना एक तंत्र रचती हुई रचना मनुष्य को केवल मुक्त नहीं करती, उसे परतंत्र भी बनाती है। परिणामस्वरूप मनुष्य को फिर अपनी स्वतंत्रता की एक नई भाषा गढ़ती है। थोड़े-थोड़े अंतराल पर, इतिहास के प्रत्येक मोड़ पर मनुष्य अपनी मुक्ति के लिए अपने संसार को पुनर्परिभाषित और उससे एक नया रिश्ता कायम करता है। परतंत्रता उसकी परिस्थिति है। मुक्ति उसका प्राप्तव्य।
मार्क्स और एंगल्स बड़ा परिवर्तन यह लाते हैं कि मानव चेतना नियामक नहीं। वास्तविक जीवन ही चेतना का नियामक है। वे मनुष्य की स्वतंत्रता की सार्थक कल्पना करते हैं। उनका दर्शन मनुष्य की गुलामी सामाजिक-आर्थिक कारणों में खोज रहा था। पूंजी की सत्ता को व्याख्या दी। श्रम और पूंजी के संबंधों को समझा और एक ऐसे समाज का निर्माण चाहा, जिसमें व्यक्ति की प्रतिभा का स्वत: विकास संभव है। अब व्यक्ति की स्वतंत्रता के सवाल को व्यक्ति और समाज के विरोध में नहीं, बल्कि शोषक और शोषित वर्गों के संघर्ष का और उत्पादन शक्तियों के नहीं उपयोग के सवाल के साथ जोड़ कर देखा गया। कहा गया कि व्यक्ति के अनुभव की विशिष्टता, सघनता और मूर्तता को बचाए रखने के संदर्भ में भी व्यक्ति और समूह के परस्पर विरोध की कल्पना तर्कसंगत नहीं है।
पूरी दुनिया में इस दर्शन के प्रचारित होने के बाद से मुख्यत: दो तरह के लोग नजर आए। एक जो संख्या में अधिक थे और नारकीय जीवन जीने को विवश थे, उन्हें यह रास्ता मानवोचित, मुक्तिकामी और दशा-दिशा बदलने वाला लगा, बेशक यह भी स्वप्न मात्र से तय नहीं होना था। दूसरा वर्ग, जो शोषण द्वारा या पुश्तों से चली आ रही जायदाद का वारिस था, इस रास्ते को खतरनाक और कभी न पूरा होने वाला सपना बता कर अपना हित छिनता देख कर कहीं न कहीं घबराहट में था। पर, एक तीसरा वर्ग भी था। इसने भूख नहीं देखी थी। आंखें आसमान पर थीं और पांव दलदल में। न बेहद गरीब था, न अमीर, पर आमूलचूल परिवर्तन की बात जब मुख्य लगी- साहित्य साहित्य के लिए, तो अपनी चिंतन परिधि तोड़ कर उसे बाहर आना पड़ा और वह साहित्य जीवन के लिए की बहस के केंद्र में आ गया। मक्सिम गोर्की ने रूस में और प्रेमचंद ने हिंदुस्तान में साहित्य को नई पहचान देने की कोशिश की।
क्रांति-उत्तर युग में महसूस किया जाने लगा कि लेनिन बड़े क्रांतिकारी होते हुए भी मार्क्स-एंगेल्स के सपनों को व्यावहारिक रूप देने में कहीं न कहीं भूल कर बैठे। अब यह समझा गया कि पतनकालीन स्थितियों में मार्क्स दर्शन नहीं हटा, हटा तो उसका वह रूप जो मूर्तिमान हो रहा था। बहुत से लेखकों ने अपनी प्रतिक्रिया स्वतंत्रता के रूप को लेकर प्रगट की। पिछले डेढ़ सौ सालों में सर्वहारा छला गया, बुद्धिजीवी स्वयं सत्ता के गुलाम हो गए। यह जन को भीड़ में बदल देने का काम था। प्रतिबद्धता साहित्य से ही होनी चाहिए। विचारधारा मन की उड़ान को बांध लेती है। वगैरह।
फूको ने मानव-विज्ञानों की भूमिका को ही दमनकारी बताया। कहा कि मानव विज्ञानों ने समग्रता का एक मिथक रचा है, लेकिन उसकी वास्तविक भूमिका दमनकारी है। समाज में जिन्हें हम मानक पद्धतियां कहते हैं, उनकी अपनी तानाशाही होती है। कैदखाना स्वतंत्रता के ऐन उलट है। फूको कहते हैं कि उन्नीसवीं सदी के कैदखाने पागलों के शरीर के बाहर नहीं, उनके शरीर के भीतर तैयार किए जा रहे थे। हमारे यहां कविता को (साहित्य को) पूर्ण स्वाधीनता देने की बात की गई। कहा गया कि कविता अगर कवि के अधीनस्थ हो जाए, तो सबसे पहले उसकी स्वतंत्रता प्रभावित होती है। कवि का स्वप्न है मनुष्य की स्वाधीनता की खोज, जो उसकी आंखों में मरीचिका की तरह समाया हुआ है।
दुनिया एक जगह टिकी नहीं रहती, नित बदलती है। हम भारतीयों ने साम्राज्यवाद को विदेशी कपड़ों की होलियां जला जला कर, यातनाएं झेलकर, लाठी-गोली खाकर बाहर धकेला था वह लौट आने की ताक में था, पर बदले हुए रूप में। पूंजी अपनी पहली विशेषता अतृप्त मुनाफाखोरी और विस्तार कभी नहीं छोड़ सकती। कूटनीतियों का जाल इसके लिए ठीक से तैयार किया गया कि किसी देश में स्पष्ट दखल दिए बिना, भू-भाग पर कब्जा किए बिना अधिकार किस तरह बढ़ाए जा सकते हैं। रणवीर सिंह कहते हैं कि साम्राज्यवाद और भूमंडलीकरण का पहला उसूल है कि जो देश अविकसित हैं, तिजारत के बहाने उन पर अपना राज्य कायम करो। कामयाबी हासिल करने के लिए यह जरूरी है कि वहां के बाशिंदों पर अपनी संस्कृति, अपनी भाषा, अपनी पोशाक, रहन-सहन, खानपान, अपनी तालीम थोपो। यहां तक कि उनके दिमाग पर कब्जा करो। इतने शातिराना तरीके से कि पांव तले से कालीन छिन जाए और मालूम भी न हो।
एडोर्नो इस परिणाम तक पहुंचे कि हमारे समय में मोटर कारें, बम और लोकप्रिय सिनेमा समाज के तमाम तरह के बिखराव को आपस में जोड़े रखने का काम करना चाहता है। इस तरह संस्कृति-उद्योग की टेक्नोलाजी सिर्फ मानकीकरण और विराट उत्पादन की टेक्नालॉजी बन कर रह गई है। वे बातें कहीं छूट गर्इं हैं, जब कला मनुष्य के काम करने के तर्क और सामाजिक व्यवस्था के बीच की किसी फांक को उघाड़ती थी। आजादी और गुलामी को लेकर उनकी धारणा यह बनी कि यह पूरी दुनिया एक कैदखाना है। लोगों को लगता है कि वे मुक्त हो रहे हैं और वे गुलामी की स्थितियों को खुद आगे बढ़ कर खुशी-खुशी स्वीकार कर रहे हैं।
हमें किस तरह की स्वतंत्रता चाहिए। हम क्यों वृहद मानवीय मूल्य विकसित नहीं कर पाए? हमारे पास मूल्यों की धरोहर तो थी, उसे दीमक के हवाले कर दिया? क्या हम इस मोड़ पर खड़े हैं कि स्वतंत्रता को नए सिरे से परिभाषित करें? स्वतंत्रता क्या आज भी धरती पर दुर्लभ है? क्या एक स्वतंत्र पथ सन्मार्ग पर चलने का, खुद जीने का दूसरों को जीने देने का अब भी प्रशस्थ नहीं हो सकता? हम मिल-बैठ कर सोचेंगे तो रास्ता भी निकलेगा। हमें कौन-सी स्वतंत्रता चाहिए? इसका रूपाकार हम मिल कर क्यों न तय करें?

