मीना बुद्धिराजा
भाषा मानवीय चेतना और उसकी सामूहिक अस्मिता की अभिव्यक्ति का अनिवार्य माध्यम है। भाषा समस्त मानव सभ्यता की अमूल्य अनूभुति, व्यापक स्मृति और समस्त चिंतन के संप्रेषण का अपरिहार्य साधन है। इसमें हमारी संस्कृति, कला, ज्ञान, पंरपरा, समाज, इतिहास, अनुभव संपदा और संपूर्ण उपलब्धियां संचित होती हैं। निरंतरता और परिवर्तन की दृष्टि से भाषा जड़ता को छोड़ कर इस उपलब्धि को समृद्ध, मूल्यवान और आधुनिक बनाने की प्रक्रिया में सतत प्रवाहमान होती रहती है। अभिव्यक्ति के स्तर पर प्रत्येक कला का अपना माध्यम होता है, जो उस कला विशेष की संवेदनशीलता को संप्रेषित करने की शक्ति को अंतर्निहित करके चलता है। इस रूप में यह दोहरा कार्य करता है, एक तो साहित्य और कला के रचनात्मक संसार का निर्माण और और दूसरे पाठक और दर्शक तक संप्रेषण द्वारा नए रचनात्मक बिंब का अंकन करता है।
भाषा और साहित्य में बहुत गहरा संबंध है। साहित्य संवेदनापूर्ण कृतित्व है, जिसके अनुरूप सहज और साधारण भाषा को एक विशिष्ट और असाधारण भूमिका निभानी पड़ती है। भाषा ही साहित्य का सबसे विश्वसनीय आधार है, जिसकी रचना-प्रक्रिया में भाषा, कथ्य, वस्तु और अभिव्यक्ति के बीच घनिष्ठ संबंध बना कर उन्हें परस्पर पूरक बनाती है। इस प्रकार भाषा ही कृति, रचनाकार और पाठक के मध्य कलात्मक और भावात्मक सांमजस्य भी प्रस्तुत करती है। रचनाकार अपनी विशिष्ट अनुभूति, संवेदना और जीवन के यथार्थ को व्यापक जनसामान्य के समक्ष प्रकट करने की सहज प्रवृत्ति से प्रेरित होकर रचना को अधिक उपयोगी, रोचक, सार्थक और प्रभविष्णु बनाने का प्रयास करता है। इसके लिए भाषिक-संरचना और कला के विभिन्न उपकरणों की योजना का विधान वह अपनी रचना-प्रक्रिया और शिल्प में इस कौशल से करता है कि उसकी अनुभूति और विचारधारा अधिक स्पष्ट, सजीव, व्यवस्थित और निश्चित रूपाकार में अभिव्यक्त होकर पाठकों तक संप्रेषित हो सके।
साहित्य में सूक्ष्म अनुभवों को आत्मसात करने की संवेदन क्षमता अधिक होती है। इसलिए व्यक्ति, परिवेश, वातावरण और समकालीन परिस्थितियों को निकटता से देखने के कारण वह केवल शाब्दिक भाषा नहीं, बल्कि विरोधों के टकराव और सामंजस्य द्वारा वह अधिक जीवंत, कलात्मक और प्रतीकात्मक स्तर पर अभिव्यक्त होती है। रचनाकार की यह सर्जनात्मक विशेषता उसकी कृति की सार्थकता का भी मापदंड होती है कि व्यापक संदर्भों में वह समकालीन यथार्थबोध, सांस्कृतिक परिवेश और जीवन की कठोर वास्तविकताओं का साक्षात्कार कर वह अपनी संवेदनादृष्टि और विचारधारा के साथ उन्हें प्रभावशाली और पठनीय रूप कैसे देता है। रचना में वह संघर्ष तथा प्रतिरोध के स्वर में जनपक्षीय भाषा का आधार कैसे ग्रहण कर लेती है, जिससे वह आदर्श और शाश्वत कृति के रूप में इतिहास में दर्ज हो जाती है। प्रेमचंद, निराला, प्रसाद, मुक्तिबोध, नागार्जुन, धूमिल जैसे अनेक रचनाकार इसका प्रमाण हैं, जिनकी रचनाएं आज भी पाठकों के लिए एक नया पाठ बार-बार प्रस्तुत करती हैं। सार्त्र ने ‘वाट इज लिटरेचर’ पुस्तक में कहा है- ‘भाषा हमारा बारूदी गोला है और हमारा एंटेना भी, जो दूसरों से हमारी सुरक्षा करती है और उनके बारे में हमें सूचित करती है। भाषा हमारे संवेदनों का विस्तार है… हम भाषा में वैसे ही रहते हैं जैसे अपनी देह में।’
प्रत्येक रचनाकार की अपनी लेखन शैली, मौलिकता और भाषिक-संस्कार की विशिष्टता होती है, जो उसकी गहन अनुभूति से संचालित होती है। जीवन यथार्थ और सर्जनात्मक भाषा का समन्वय उसके रचनात्मक दायित्व के रूप में सामने आता है। इस व्यापक संरचना में शब्द, ध्वनि, प्रतीक, बिंब जैसे सभी तत्त्व एक-दूसरे से प्रभावित होते हैं, जिससे वह समसामयिक चेतना की अभिव्यक्ति का माध्यम बनती है। साहित्य में संवेदनशीलता और अनुभवों की भिन्नता भाषा को भी प्रभावित करती है। जैसे समकालीन स्त्री-लेखन में उनकी रचनाशीलता का स्वरूप पंरपरागत रूढ़िबद्ध साहित्य से अलग और स्वतंत्र होना स्वाभाविक है। एक नई भाषा निर्माण की यह प्रक्रिया मौजूदा भाषा और बोलचाल की सामान्य अर्थछवियों के बीच से ही स्त्री-भाषा के रूप में आधुनिक बन कर आई है। इस भाषा में स्त्री जीवन की समस्याएं, कठोर सच्चाइयां, अनुभवों की तीव्रता और अंत:संघर्ष अधिक सशक्त, गंभीर और परिपक्व रूप से संप्रेषित हुए हैं। इस प्रकार भाषा ही रचनाकार की निजता और सामाजिकता के बीच पाठकों तक सेतु का निर्माण भी करती है।
भाषा मानव संस्कृति का सर्वाधिक शक्तिशाली और समृद्ध उपकरण है, क्योंकि हमारी अस्मिता का जुड़ाव मूलभूत रूप से भाषा के साथ जुड़ा है। इसका प्रयोग जितना व्यापक स्तर पर होता है उतना ही वह समाज को समृद्धतर बनाती है। भाषा की परिकल्पना हमेशा लोकतांत्रिक, सार्वभौमिक और सार्वकालिक होती है। भाषा के जीवित रहने का अर्थ होता है उसका प्रयोग करने वाले समाज को भी बचाना। विश्व की प्रत्येक भाषा ही उस देश और समाज की सबसे प्राचीन और सच्ची मातृभूमि होती है। अपने दीर्घ विकास क्रम में भाषा अपनी विशाल चेतना में विविधता, बहुलता, समरसता और समन्वय की आकांक्षाओं के साथ सदियों से विकसित, सक्रिय, सजग, सशक्त, गतिशील और आधुनिकतम बनने की दिशा मे अंत:सलिला की तरह प्रवाहित होती रही है, जो उसके कालजयी होने की पहचान है। विश्व प्रसिद्ध आलोचक और समाजशास्त्री थियोडोर एडोर्नो ने ‘कल्चर इंडस्ट्री’ में लिखा है- ‘सब कुछ खत्म हुआ, भाषा खत्म नहीं हुई। लेकिन वह एक भयानक खामोशी से होकर गुजरी है, वह जीवन को पुकारने के स्वर में सहस्त्रों अंधकारों से होकर गुजरी है।’ अनेक आघातों, अवरोधों, चुनौतियों और जटिल संकटों का अतिक्रमण करके भाषा हमेशा मानवीय अस्मिता की पहचान के रूप में जीवित और आलोकित होती रही है।
आज की बाजारवादी प्रतिस्पर्धा और उपभोक्तावादी संस्कृति के युग में निस्संदेह रचननाकार पर भाषा का भी अतिरिक्त और जटिल उत्तरदायित्व है कि वह भाषा को मूल्यों के रचनात्मक अन्वेषण और वैचारिक संप्रेषण का माध्यम बना कर रख सके। बाजार की सत्ता संरचना ने भाषा की गरिमा और सर्जनात्मक सौंदर्य चेतना पर सर्वाधिक आघात करके उसे व्यावसायिक हितों के लिए प्रयोग किया है। संस्कृति और कला के इस उद्योग ने मानवीय हृदय की सबसे आत्मिक प्रतिक्रिया भाषा को बाजारवाद के बेतहाशा दबाव में जिस स्तर तक पहुंचाने का प्रयास किया है। उस नकारात्मक और वैचारिक अवमूल्यन से भाषा के अस्तित्व को बचाना समाज के लिए भी अनिवार्य है। हमारी संस्कृति की सबसे मूल्यवान उपलब्धि भाषा है और यह मानवीय अर्थवत्ता का आधार भी है। आज जब इतिहास चेतना और स्मृतियां नष्ट हो रही हैं, भाषा ही मनुष्य, रचनाकार और समाज के बीच जीवंत संबध और संवाद के रूप में सामूहिक अंत:करण की आशाओं-आकांक्षाओं को आत्मसात करके आगामी मानव जाति की धरोहर बन सकती है।

