खेती-किसानी पर संकट लगातार गहराता गया है। इसकी वजह से गांवों से शहरों की तरफ पलायन बढ़ा है। कृषि क्षेत्र के विकास के दावे हर सरकार करती है, पर हकीकत यह है कि न तो किसानों को उचित मूल्य पर खाद-बीज उपलब्ध होता है और न उनकी फसल की माकूल कीमत मिल पाती है। इसके चलते किसान खुदकुशी का सिलसिला बना हुआ है। किसानी की दशा सुधारने की मांग को लेकर समय-समय पर आंदोलन भी होते रहे हैं, पर वे कारगर साबित नहीं होते। कृषि क्षेत्र की दुश्वारियों और किसान आंदोलनों की विफलता पर चर्चा कर रहे हैं राजकुमार।
भारतीय कृषि व्यवस्था, किसानी संस्कृति और किसान गहरे संकट के दौर से गुजर रहे हैं। इसका अंदाजा विदर्भ के मरहूम किसान श्रीकृष्ण कलंब के अनुभवों से गुजर कर लगाया जा सकता है- ‘अलग था मैं/ इसलिए अलग थी मेरी जिंदगी/ मेरी मृत्यु भी/ बेमौसम बारिश की तरह/ असामयिक/ कविताओं से प्यार है मुझे/ काली मिट्टी में कॉटन के पौधे की तरह है मेरा अस्तित्व/ जिसकी जड़ें मीठी हैं/ गन्ने की कठोर परतों के भीतर मिठास की तरह/ मेरी मृत्यु के बाद वे कहेंगे/ ऐसे टंगा है यह/ जैसे फूलों से सजा हो चौखट।’
क्या हम इन पंक्तियों में एक किसान की अकाल मृत्यु की आहट सुन पा रहे हैं? व्यवस्थागत नीतियों और सत्ता की चट्टानी चुप्पी के बीच एक किसान के जिंदगी न जी पाने की गहरी नाउम्मीदी को पढ़ पा रहे हैं? पता नहीं इन पंक्तियों को लिखते हुए उसकी आत्मा कितनी दरकी होगी, अंगुलियों में कितनी थरथराहट हुई होगी, यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है। श्रीकृष्ण कलंब ने कर्ज और परिवार की जिम्मेदारियों के आगे समर्पण कर दिया और आत्महत्या कर ली। आत्महत्या के बाद उनकी डायरी में दर्ज ये कविताएं मिलीं। कविता में और असल जिंदगी में दोहरी आत्महत्या का ऐसा उदाहरण दुनिया में शायद ही मिले।
भारतीय अर्थव्यवस्था और समाज में केंद्रीकृत सत्तागत तथा सांस्थानिक नीतियों के कारण हो रहे परिवर्तन का ग्रामीण भारत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है- ऐसा उन्होंने अपनी डायरी में दर्ज किया। सरकारें गहरी नींद में सो रही हैं और किसान तबाह हो रहे हैं- ऐसे गहरे राजनीतिक मंतव्य उनकी कविताओं से निकलते और आर्तनाद सुनाई पड़ता है। मगर उनकी गूंगी चीखें बैंक कर्ज देने वालों, सूदखोरों और हुक्मरानों तक नहीं पहुंचती है। नब्बे के मध्य से 2014 तक तीन लाख से अधिक किसानों ने इस देश में आत्महत्याएं की हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक 2004 में अठारह हजार से अधिक किसानों ने आत्महत्या की। 2010 में लगभग सोलह हजार, 2011 में चौदह हजार से अधिक, 2012 में तेरह हजार से अधिक 2013 में ग्यारह हजार से अधिक, 2014 और 2015 में बारह हजार से अधिक किसानों ने आत्महत्या की। यह सिलसिला रुका नहीं है। यानी सत्ता-प्रतिष्ठान की नीतिगत विफलताएं स्पष्ट हैं। इससे यह भी साफ होता है कि किसानों और कृषि-व्यवस्था में बदलाव को लेकर सरकारों में कोई खास दिलचस्पी नहीं है। चूंकि वे चुनाव को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं, किसानों की मौत और सत्ता से बेदखली का डर उन्हें इतना सताता है कि वे हर तरह के छल करते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े वास्तविकता से ज्यादा सरकारों के बचाव को सामने रखते हैं। आंकड़ों की बाजीगीरी से सरकारें अपना मानवीय चेहरा सामने लातीं और समाज के कू्रर यथार्थ को छिपा लेती हैं।
पिछले तीन-चार सालों में अचानक किसान आत्महत्या के आंकड़ों में गिरावट दिख रही है। पी. साईनाथ ने उन आंकड़ों का अध्ययन किया तो पाया कि आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तेलंगाना, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में, जहां किसान आत्महत्या की खबरें ज्यादा थीं, वहां महज साल भर के अंदर चामत्कारिक रूप से किसान आत्महत्या की खबरें कम हो गई हैं। उन्होंने पाया कि इन्हीं राज्यों में ‘अन्य कारणों’ से लगभग सवा सौ प्रतिशत से अधिक आत्महत्याओं की खबरें बढ़ गर्इं। खेती पर निर्भर किसान के अलावा ‘खेतिहर मजदूर’ भी होते हैं, जिनकी आत्महत्या की खबरें गायब हैं। किसानों की आत्महत्याएं बीमारी, अवसाद, पारिवारिक समस्या के खाते में ढकेल दी गई हैं। सरकार ने यह कह कर अपनी पीठ थपथपाई की, किसानों की आत्महत्याओं में दस प्रतिशत की कमी आई है। पर सच्चाई यह है कि एनसीआरबी ने जो दूसरी एजेंसियों से औंचक सर्वेक्षण हासिल किए थे, उसकी एक बार भी जांच-पड़ताल करने की जहमत नहीं उठाई और सच पर भ्रम की एक और चादर चढ़ा दी। हकीकत यह है कि किसान सरकार के एजेंडे और प्राथमिकता के केंद्र में नहीं हैं। वे परिधि से बाहर छिटके हैं।
किसान लगातार छले जा रहे हैं। उनकी आवाजें अनसुनी हो रही हैं। उम्मीदों के सहारे जीना मुश्किल हो रहा है। वे किसानी के दुश्चक्र को तोड़ भी नहीं पा रहे और उससे कुछ बेहतर जीवन भी हासिल नहीं कर पा रहे। यही कारण है कि देश के अलग-अलग हिस्सों से लगातार किसानों के आंदोलन उठते रहे हैं। उनका असंतोष फन उठाता रहा है। कई राज्यों में प्रभुत्वशाली जातियां, जो खेती-किसानी से जुड़ी रही हैं, वे अब अचानक आरक्षण की मांग के लिए हिंसक हो उठी हैं। उसकी बड़ी वजह खेती-किसानी के धंधे का चौपट होना और हाड़-तोड़ मेहनत के बाद घाटे का सौदा होना है। किसान अपनी अगली पीढ़ी को खेती की तरफ जाने के लिए बिल्कुल प्रोत्साहित नहीं कर रहे। नई पीढ़ी भी खेती-बाड़ी के यथार्थ को समझती है। किसान और किसानी व्यवस्था से जुड़े लोग कई तरह से अपने आक्रोश प्रकट कर रहे हैं। कभी वे फसल और उत्पाद की सही कीमत न मिलने पर या कहें लागत मूल्य से भी बहुत नीचे बेचने पर मजबूर होने पर फसलों को या तो खेतों में ही नष्ट करते हैं, जोत देते हैं या ध्यानाकर्षण के लिए सड़कों, चौक-चौराहों पर, सरकारी दफ्तरों के बाहर फेंक आते हैं। शायद ही कोई छमाही गुजरती है जब किसी न किसी राज्य या क्षेत्र से ऐसी खबर न आती हो। अभी राजस्थान में लहसुन की इतनी पैदावार हुई कि उसे कोई तीन रुपए किलो भी खरीदने को तैयार नहीं है, जबकि उसे खेत से बाजार तक पहुंचाने का खर्च पांच रुपए प्रति किलो बैठता है। अमरोहा में किसानों ने टमाटर सड़कों पर फेंक दिया।
इसका एक कारण यह भी है कि खेतिहर मजदूर अन्य क्षेत्रों की देखादेखी अधिक मजदूरी मांगने लगे हैं। जबकि उत्पादन मूल्य न बढ़ने से किसान घाटे में जा रहे हैं। कई बार यह भी देखने में आता रहा है कि अगर पीछे के दिनों में किसी चीज की कीमत बढ़ी तो किसान लोभवश उसे ही उगाने लगते हैं, ताकि अच्छा बाजार भाव मिले। कर्ज लेकर या अधिक श्रमिक लगा कर फसल उगा लेते हैं। अगर फसल अधिक पैदा होती है तो कीमतें नीचे चली जाती हैं और किसानों को उचित कीमत नहीं मिलती है। वह कर्जदार बना रहता है। ऐसे में किसानों का गुस्सा और निराशा स्वाभाविक है।
किसानों की यह त्रासदी अभूतपूर्व इन अर्थों में है कि एक तरफ हम मध्यवर्ग के जीवनस्तर में सुधार की बात कर रहे हैं, साथ ही यह भी देख रहे हैं कि एक ऐसा उच्च वर्ग खड़ा है, जिसके पास इतना अकूत धन है कि बिना कमाए भी कई पीढ़ियां खर्च करती जाए तो भी जमा पूंजी खत्म नहीं होगी, दूसरी तरफ साठ फीसद से अधिक किसान कर्ज में डूबे हैं। वे लोन न चुका पाने की स्थिति में जीवन और परिवार खो रहे हैं। उनकी दुर्दशा सुधारने के लिए सरकार ने एमएस स्वामीनाथन की अगुआई में जो आयोग गठित किया, वह बारह वर्ष बाद भी लागू होने की बाट जोह रहा है।
हाल के वर्षों में किसान आंदोलन तीव्र होने का एक बड़ा कारण स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट भी है। किसानों द्वारा उत्पादित वस्तुओं, फसलों की सरकारी खरीद हो और किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य मिले, इसके लिए तमाम किसान संगठन जोर लगाए हुए हैं। किसानों को भी इसके लिए तैयार किया जा रहा है। आयोग की सिफारिश के मुताबिक उत्पादन लागत से पचास प्रतिशत अधिक समर्थन मूल्य निर्धारित किया जाए, ताकि किसानों को उचित दाम मिल सके और उसकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो। किसानी संस्कृति के क्षरण, घटती किसानी और कामगार की दृष्टि से देखें तो यह कदम बेहद सराहनीय लगते हैं और संगठनों की पहल भी। लेकिन यह तभी उचित और कारगर साबित होगा जब आयोग की सिफारिशों को पूर्णता में लागू किया जाए। केवल न्यूतम समर्थन मूल्य की लड़ाई लड़ना या इस पर जोर देना, किसानों के भीतर पहले से ही मौजूद वर्गीय खाई को और चौड़ा करना होगा।
इस देश में पचासी फीसद किसान छोटे या निम्न मध्यवर्ग के हैं। पंद्रह प्रतिशत किसानों के पास जमीन का कुल छप्पन प्रतिशत है। किसानों के नमूना सर्वेक्षण 2013 के आंकड़े भी कहते हैं कि तेरह प्रतिशत किसान ही न्यूनतम समर्थन मूल्य का फायदा उठा पाते हैं। पिछले तीन-चार वर्षों के आंकड़े देखें तो पता चलेगा कि यह दायरा सिमट कर छह फीसद तक आ गया है।
न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलने भर से किसानों का संकट दूर नहीं होगा। अगर न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ेगा तो जाहिर है उत्पादित वस्तुओं की कीमतों में उछाल आएगा। फर्ज कीजिए एक किसान जिसने आलू उगाया, उसे उसकी सही कीमत मिल जाएगी। लेकिन जब उसे टमाटर, प्याज, दाल या अन्य जरूरी चीजें खरीदनी पड़ेंगी तो तब वह बाजार से महंगी कीमत पर खरीदेगा। ज्यादातर किसानों की स्थिति यह है वे सभी तरह की फसलें नहीं उगा पाते या उनकी जमीन में सभी तरह की फसल नहीं होती। मिट्टी, मौसम, क्षेत्र या पानी आदि की उपलब्धता भी खेती के लिए सबसे अनिवार्य कारक हैं। यानी कुल मिलाकर स्थिति यह बनती है कि एक किसान जितना फायदा नहीं उठाएगा उससे ज्यादा घाटा सहेगा। किसानों की वर्गीय संरचना को ठीक से जाने बगैर हक की उचित लड़ाई भी उलटा पड़ सकती है। खेती को उद्योग की तरह इस्तेमाल करने वाले किसानों को इसका फायदा होगा, लेकिन इससे व्यापक स्तर पर नुकसान की संभावना है।
सरकारी खरीद का हिसाब-किताब भी ठीक नहीं है। कभी गोदाम की कमी आड़े आती है, तो कभी नौकरशाही, तो कभी लेटलतीफी। ऐसे में सरकार अक्सर कम खरीद कर पाती है। किसानों के पास रखने की जगह की कमी होती है, इसलिए बाजार में उतारना उनकी मजबूरी होती है। उत्पादन अधिक होने पर कम कीमत में बिचौलिए या आढ़तिए खरीदते और बढ़ी कीमत पर बेचते हैं। फायदा न सीमांत किसानों का होता है न आम उपभोक्ता का, बल्कि बिचौलिए और आढ़तिए मौज करते हैं। हाल की कुछ रिपोर्टें बताती हैं कि किसान से बेहतर स्थिति किसानी मजदूरों की हो रही है।
बीते मार्च के महीने में किसान आंदोलन का अद्भुत नजारा देखने को मिला। ऐसे दृश्य कम ही दिखते हैं। इसके पीछे भी स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करवाना ही माना जाता है। लेकिन जिस अभूतपूर्व दृश्य की तरह वह आंदोलन सड़कों पर दिखा, फिर पानी के बुलबुले की भांति विलुप्त हो गया। आंदोलन में उमड़े किसान अचानक बिखर गए, यह सुन कर कि सरकार ने उनकी मांगें मान ली है। हकीकत यह है कि अभी तक किसी भी राज्य सरकार ने इतनी इच्छाशक्ति नहीं दिखाई है कि उसे ठीक से लागू किया जा सके। स्वामीनाथन आयोग ने कई महत्त्वपूर्ण सिफारिशें की हैं। उन पर अमल होना बगैर लंबे संघर्ष, विद्रोह और क्रांति के संभव ही नहीं है। आयोग की सिफारिशें कृषि क्षेत्र में संरचनात्मक बदलाव की बात करती हैं। उसमें भूमि सुधार पर काफी बल है। भूमिहीनों में भूमि बांटना, बेकार जमीन देना, आदिवासी क्षेत्रों में पशु चराने के हक देना। फसल बीमा की सुविधा सभी किसानों तक पहुंचे, कम ब्याज पर कर्ज देना, महिलाओं को किसान क्रेडिट कार्ड देना, अच्छी गुणवत्ता के बीज कम कीमत पर उपलब्ध कराना, किसानों के लिए ज्ञान चौपाल बनाना, प्राकृतिक आपदा या फसल नष्ट होने की स्थिति से निपटने के लिए कृषि जोखिम फंड बनाना, लगातार प्राकृतिक आपदा या संकट की स्थिति में कर्ज वसूली से तब तक राहत दी जाए जब तक उस क्षेत्र में स्थिति सामान्य न हो जाए, फसल उत्पादन मूल्य से पचास फीसद कीमत किसानों को मिले और खेतिहर जमीन, वनभूमि को गैर-कृषि उद्देश्यों के लिए कॉरपोरेट को न दिया जाए।
इन सिफारिशों के साथ किसान आंदोलन को मिला कर पढ़ें तो असलियत समझ में आती है। किसान आंदोलन से जुड़े संगठनों के पास शायद ही इसका खाका हो कि देश में कितनी भूमि किस क्षेत्र में है, जो भूमिहीनों को दी जा सकती है। इसके लिए जरूरी है कि देश के सभी किसान संगठन एक साथ बैठ कर राज्यवार, क्षेत्रवार खाका उपलब्ध करा कर पूरे देश में एक साथ आंदोलन छेड़ें। सरकार ने पहले ही कल्याणकारी योजनाओं और नीतियों से हाथ खींच कर सब कॉरपोरेट घरानों और बाजार के हवाले कर दिया है ऐसे में कृषि जोखिम फंड, फसल बीमा और आपदा की स्थिति बनी रहने तक राहत देने की बात कितनी मुश्किल है, समझा जा सकता है। देश के नामी-गिरामी राजनेता खुद ही किसान बनने और उसके लाभ उठाने को तत्पर हैं। कॉरपोरेट घराना कृषि को उद्योग बनाने में लगा है। कॉरपोरेट घराने, कॉरपोरेट खेती के लिए सरकार से मुफ्त या मामूली टोकन मनी देकर खुद ही जमीन हथिया रहे हैं। वे परंपरागत रूप से खेती कर रहे किसानों को विस्थापित कर रहे हैं। ऐसे में गरीब किसानों, मजदूरों, भूमिहीनों को कौन पूछेगा? कॉरपोरेट घरानों ने जंगल, जमीन, पानी सब पर कब्जा जमाया हुआ है। खेतिहर जमीन पर पहले से ही उसकी निगाहें हैं। ऐसे में आयोग की रिपोर्ट धूल फांकने के अलावा क्या कर सकती है?
किसान क्रेडिट कार्ड या महिला किसान क्रेडिट कार्ड देना आसान था, जिसकी तरफ सरकार ने पहल की। इसमें भी ज्यादातर उन्हीं ने फायदा उठाया, जो बड़े किसान हैं और व्यावसायिक खेती करते हैं। किसानों के क्रेडिट कार्ड पर उन लोगों ने कर्ज ले लिया, जो उससे अधिक ब्याज पर कर्ज लेते थे। इसमें भी बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा हुआ है, लेकिन सरकार के आंकड़े में सुधार दिख रहा है। किसान संगठनों का उद्देश्य यह भी होना चाहिए कि जरूरतमंद किसानों तक उसका लाभ पहुंचाने में सफलता हासिल करे। वे ऐसा कर पाए हैं, यह साफ नहीं है।
किसान आंदोलन इसलिए भी सफल नहीं हो पा रहे, क्योंकि ज्यादातर किसान संगठन दरअसल किसी राजनीतिक पार्टी के ही संगठन हैं। वही किसानों को संगठित करते और आंदोलन को आगे बढ़ाते हैं। जिस संगठन का नेतृत्व पार्टियों के हाथ नहीं है वे पीछे छूट जाते हैं या ऐसे संगठनों का नेतृत्व एनजीओ किस्म की संस्थाएं करती हैं। राजनीतिक पार्टियों से जुड़े संगठन पार्टी की नीतियों के खिलाफ मुश्किल से जा पाते हैं। दबाव पड़ते ही वे झुकते हैं, हटते हैं या समझौते करते हैं। आंदोलन जब व्यापक, प्रभावी और कारगर होता है और राजनीतिक पार्टी उसे मानने को तैयार नहीं होती तो यह नौबत उन्हें झेलनी होती है। अक्सर ऐसा होता है कि जब पार्टी सत्ता से बाहर होती है तभी संगठन आंदोलन करता है। सत्ता में होने पर आंदोलन को तोड़ने का काम करते हैं या उभरे हुए आंदोलन के भीतर बिखराव उत्पन्न करते हैं। अलग-अलग राज्यों में अपनी सरकार का बचाव भी करते हैं, लेकिन दूसरी सरकार के खिलाफ आंदोलनरत होते हैं। ऐसे में उसकी विश्वसनीयता संदेहास्पद होती है। जब भी आंदोलन खड़ा होता है, किसानों को फौरी राहत के नाम पर सब्सिडी में तब्दील कर दिया जाता है। बिजली, डीजल, सस्ते बीज, खाद आदि से मामला आगे बढ़ नहीं पाता है। इन मांगों के लिए भी किसानों को चुनाव आने तक इंतजार करना पड़ता है। ऐसे में किसान और किसानी पर संकट के बादल अनवरत बने रहते हैं।
