कृष्ण कुमार रत्तू

मणिपुर यानी रत्नों की जमीन आजादी के इतने वर्षों बाद भी अलगाव और बेगानेपन के अभिशाप से ग्रस्त है। राजधानी इंफाल से लेकर सुदूर पूर्वी जिलों तक फैले प्राकृतिक सौंदर्य के अलौकिकदृश्यों से भरपूर इस राज्य में वर्षों से खून-खराबा और अलगाव का भाव लोगों के मन में गहरे तक पैठ चुका है। नवंबर 2016 से लगातार चल रही हड़ताल के साथ नाकेबंदी ने लोगों का जीना दूभर कर रखा है। सुरक्षा बलों से आए दिन होती मुठभेड़ों में कितने ही युवक-युवतियां और साधारण नागरिक मारे जा चुके हैं? इसका कोई प्रामाणिक आंकड़ा अभी तक उपलब्ध नहीं हैं?

इन दिनों मणिपुर में भी चुनाव का मौसम है। चार और आठ मार्च को यहां पर मतदान होगा। सभी राजनीतिक पार्टियों ने अपनी-अपनी सरगर्मियां शुरू कर दी है। पिछले पंद्रह वर्षों से सत्ता पर काबिज मुख्यमंत्री एकराम इबॉबी सिंह की कांग्रेस सरकार के लिए यह चुनाव कड़ी परीक्षा है। अफस्पा कानून यानी आर्म्ड फोर्सिस पावर एक्ट के विरुद्ध सोलह साल तक भूख हड़ताल कर चुकी और लौह-महिला के नाम से चर्चित इरोम शर्मिला और उनका समर्थक दल पीआरजी भी दस प्रत्याशियों के साथ मैदान में उतरा है। खुद शर्मिला इरोम मुख्यमंत्री इबाबी सिंह के सामने थोबाल और खुराई से चुनाव लड़ रही हैं। नगा समर्थक नगा पीपुल्स फ्रंट (जो इन दिनों नागालैंड में सताधारी दल है)पंद्रह प्रत्याशियों के साथ नगा बहुल क्षेत्र में ताल ठोंक रहा है।

मणिपुर समूचे भारत में अकेला ऐसा राज्य है, जहां पर महिलाओं का वर्चस्व है। जनसंख्या अनुपात में यहां 1000 के बरक्स 987 महिलाएं हैं और 41 प्रतिशत महिलाएं रोजगार से घर चला रही हैं। 71 फीसद महिलाएं साक्षर हैं। राजधानी इंफाल में सबसे बड़ा बाजार मैती महिलाओं के हाथों में है। एक रोचक पहलू यह भी है कि मणिपुर में चलने वाले सरकार विरोधी अभियानों के साथ जनजागृति अभियानों का समूचा नेतृत्व महिलाओं के हाथ में है। मुख्यमंत्री इबॉबी सिंह के पीछे उनका बहुसंख्यक मैती समाज है। मणिपुर की कुल जनसंख्या का 65 प्रतिशत मैती समाज है, शेष नगा बहुल और जनजातीय पहाड़ी जिले हैं, जिनमें महिलाओं का वर्चस्व है। मैरीकॉम जैसी महिला मणिपुर से ही खेल के जरिए संसद तक पहुंची हैं। मणिपुर की महिलाएं पिछले पच्चीस बरसों से आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक कठिनाइयों का सामना कर रही हैं । वे अपनी बहादुरी के लिए जानी जाती हैं। इस बार के चुनाव में पहली बार महिला प्रत्याशियों की संख्या बढ़ी है, जिससे राजनीतिक समीकरण बदलने के भी आसार हैं।

इंफाल की सडकों पर मुंह पर कपड़ा बांधे युवा रिक्शा चलाते हुए देखे जा सकते हैं। त्रासदी यह है कि पढ़े-लिखे होने के बावजूद बेरोजगारी ने उन्हें हलाकान कर रखा है। राजनीतिक शून्य भी किसी समाज को किस तरह से मनोवैज्ञानिक त्रासदी में धकेल सकता है, यहां का युवा वर्ग इसकी मिसाल है। समूचे मणिपुर में एक बड़ा उभार मुसलिम जनसंख्या का भी हुआ है। मणिपुर पूर्वोतर का एकमात्र हिंदू संस्कृति का गवाह राज्य रहा है और यहीं पर मौरांग में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध का बिगुल बजाया था। आज पर्यटन की दृष्टि से भी यह राज्य पिछड़ा हुआ दिखाई देता है। कहने को इस राज्य में वह सब कुछ है, जो किसी राज्य की आर्थिक व्यवस्था के लिए सहायक सिद्ध हो सकता है, लेकिन अलगाववादियों और सुरक्षा बलों के टकराव के कारण आम लोगों का जीवनयापन कठिन हो गया है। मोरे से लेकर नगालैंड के सीमांत गांव और म्यांमां के साथ जुड़ने वाला तौमू तक का पहाड़ी प्रदेश अब उतना ही पिछड़ा हुआ है, जितना स्वतंतत्रा के समय था।

इं फाल के साथ अन्य जिले, जिन समस्याओं से दो चार हो रहे हैं उनमें नशीली दवाएं, शराब, हिरोइन से लेकर म्यामां और पूर्वी देशों में हो रही तस्करी एक बड़ी समस्या है। इस राज्य में दूसरी बड़ी समस्या एड्स का फैलाव है, जो शराब के साथ सबसे बड़ा खतरा बना हुआ है। शराब के विरोध में मैती और नगा महिलाएं आगे आई हैं, लेकिन उनकी आवाज अभी धीमी है। वर्तमान परिदृश्य में मणिपुर का समूचा जनजीवन उस बिंदु पर आकर खड़ा हो गया है जहां पर दो रास्ते साफ दिखाई दे रहे हैं। सामजिक विघटन और मुख्य धारा से अलगाव में फंसा समाज और नया रास्ता चुनने का संकल्प। सुरक्षा बलों के विरोध में युवा आक्रोश विकराल रूप धारण करता जा रहा है। खेल में मणिपुरी युवा अपना वर्चस्व कायम किए हुए हैं। विकास और रोजगार के मामले में पिछड़ा यह क्षेत्र और समाज सांस्कृतिक धरोहर को संजोए हुए है। त्रासदी है कि गौरवशाली अतीत, मणिपुरी नृत्यशैली और गीत गोविंद से रचे-बसे मणिपुर को हम खोते जा रहे हैं।

मणिपुर में चुनाव का शोर जल्दी थम जाएगा। राज्य बदलेगा तो देश भी बदलेगा। जाहिर बात है कि मणिपुर पहले भारतीय समाज का अटूट हिस्सा है, इसके बाद और कुछ। क्या हम इन चुनावों के जरिए राजनीतिक मोहरों को नई तरह से बदल सकते हैं क्योंकि इस बार नेशनल डेमोक्रेटिक एंलाइस से गठबंधन करने वाली राजनीतिक पार्टियां मणिपुर के इतिहास को बदल सकती हैं। इरोम शार्मिला का संघर्ष भी एक नई इबारत लिख सकता है। इस पूर्वोत्तर राज्य में अब भी बहुत कुछ बचा हुआ है। बस इस सीमांत राज्य को पहचानने और उसे मुख्यधारा में जोड़ने की जरूरत है। यही समय है जब उसे मुख्य धारा में लाया जा सकता है।