एक अकेली औरत महसूस कर रही है
अनजानी पदचापों को
टोह लेती आकृतियों को
और बेनाम परछाइयों को
अपने अकेलेपन को महसूस करती
वह औरत बन गई है साथिन
अपने ही अकेलेपन की
रात को खामोश लम्हों में
अकेली औरत सुनती है अपनी धड़कनें
और कोशिश करती है
कविता के शब्दों में सांस लेने की
अकेली औरत
मुस्कराती है
और बादाम की मंजरी का लहराना
याद करती है अकेलेपन में
अपने स्याह बालों का रेशमी अंधेरा सुलझाते हुए
देख लेती है वह
रोशनी की लकीरें
और पढ़ती है बीते दिनों को
कभी-कभी
जब पूछती है अकेली औरत अपने आप से
कितनी खुश है वह?
तो बिजली की एक कौंध
मन के आसमानों में खो जाती है
अपने भीतर के बीहड़ों में भटकती
अकेली औरत खो गई है
मन के तहखाने में
और डर रही है, अधटूटे खामोश बुतों से
अपने आसमान के टुकड़ों को निहारते
अकेली औरत तहा रही है स्मृतियां
बुन रही है सपने
और समेट रही है
अतीत का सुहानापन
गर्मियों की तपती हुई सूनी दोपहर में
अकेली औरत देख रही है
अमलतास का लचकना
गुलमोहर का दहकना
और फानूस का झूमना
अपने होठों का कंपन महसूस करती
वह अकेली औरत
भयभीत है फानूस के झूमने से
उसकी आंखों में तैर रहे हैं
दहशत के कतरे
अपनी सिसकी को दबाती
अकेली औरत डूब रही है
आंसुओं के दरिया में
भीतर के शांत पानी में
उठ रहा है ज्वार।
पिंजरा
गरमी की दोपहरें
भले ही खुश्क होती हों
पर सुबहें मुलायम होती हैं
इन मुलायम सुबहों में
एक औरत
ताकती है आसमान
सोचने लगती है अपने बारे में
यों तो काफी कुछ है उसके पास
बढ़िया घर, अच्छा पति
पति की शानदार नौकरी
प्यारे-प्यारे बच्चे
और भी बहुत कुछ
पर!
भीतर ही भीतर
बार-बार
सालता है कुछ
खुश्क दोपहर की खुश्की को
भीतर की मुलायमियत में जज्ब कर
अचानक
देख लेती है वह
तोते का पिंजरा
सोचती है पल भर कुछ
फिर
भरती है एक ठंडी सांस
लग जाती है अपने काम में
खामोश, चुपचाप।
…. रश्मि रमानी
