श्रीशचंद्र मिश्र
पहला लक्ष्य ओलंपिक खेलों में पदक पाने का था। वह पूरा नहीं हुआ तो मुक्केबाज अखिल कुमार और जितेंदर कुमार पेशेवर दुनिया में चले गए। देश के लिए बहुत खेल चुके, अब पैसा कमाने के लिए मुक्के चलाएंगे। बैडमिंटन स्टार पीवी सिंधू और साइना नेहवाल ने आखिरी समय में एशियाई स्तर की टीम स्पर्धा से नाम वापस ले लिया। वजह बताई कि वे ऑल इंग्लैंड चैंपियनशिप समेत इनामी मुकाबलों के लिए खुद को फिट रखना चाहती हैं। यह कोई नया सिलसिला नहीं है। पिछले कुछ समय से यह आम चलन हो गया है कि स्टार खिलाड़ी राष्ट्रीय प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं लेते। अक्सर चोट या बीमारी का बहाना बना कर उससे किनारा कर लेते हैं। हालांकि, यही खिलाड़ी राष्ट्रीय प्रतियोगिता के दौरान या उसके तत्काल बाद किसी इनामी टूर्नामेंट में नजर आ जाते हैं। इस लुकाछिपी के खेल के पीछे खिलाड़ियों का अपना तर्क है। उनका कहना है कि वे कई बार राष्ट्रीय चैंपियन हो चुके हैं। वे मैदान में उतरेंगे तो प्रतियोगिता एक तरफा हो जाएगी और नए उभरते हुए खिलाड़ियों को आगे बढ़ने का मौका नहीं मिलेगा।
हालांकि, उनका यह कथित त्याग खेलों के विकास में बाधक साबित हो रहा है। उभरते हुए खिलाड़ियों से मुकाबला करने को नहीं मिलेगा तो कैसे तो उनका स्तर सुधरेगा और कैसे उनमें आत्मविश्वास आएगा। स्टार खिलाड़ियों की अनुपस्थिति की वजह से कई खेलों की राष्ट्रीय प्रतियोगिता निर्धारित समय पर नियमित रूप से नहीं हो पाती। अनुभवी खिलाड़ियों को आकर्षित करने के लिए कुछ खेलों की राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में इनाम राशि रखने की व्यवस्था हुई है। क्रिकेट को छोड़ कर अन्य किसी खेल में इसका सकारात्मक असर देखने को नहीं मिला है। क्रिकेट की राष्ट्रीय प्रतियोगिता रणजी ट्राफी में हिस्सा लेने पर अब इतना पैसा मिलने लगा है कि अगर कोई खिलाड़ी एक सीजन में फाइनल तक खेल जाए तो बीस पच्चीस लाख कहीं नहीं गए। अन्य खेलों में अलग तरह की समस्या है। स्क्वैश खिलाड़ी दीपिका पल्लिकल ने तो कुछ समय पहले पुरुष और महिला खिलाड़ियों की इनामी राशि में फर्क पर एतराज किया था।
स्टार खिलाड़ियों की एक दलील यह भी है कि राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में उन्हें रेटिंग अंक नहीं मिलते। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी रैंकिंग नहीं बन पाती। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में हिस्सा लेना जरूरी होता है। एक हद तक उनकी दलील सही मानी जा सकती है लेकिन क्या खिलाड़ी सिर्फ रेटिंग अंक की चिंता करते हैं या उन अंकों के बल पर इनामी मुकाबलों का हिस्सा बनना उनका लक्ष्य होता है? वजह कुछ भी हो, पिछले कुछ सालों से खिलाड़ियों की प्राथमिकता बदली है। वे वहीं खेलने को ज्यादा उत्सुक रहने लगे हैं जहां से उन्हें भारी भरकम पैसा मिलने की आस हो। 2010 के एशियाई खेलों में सोमदेव देवबर्मन ने टेनिस की सिंगल्स और डबल्स स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता था।
2014 में वे भारत के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी थे। इंचियोन (दक्षिण कोरिया) में हुए एशियाई खेलों में वे पदक के सबसे मजबूत दावेदार हो सकते थे। पर उन्होंने अपना नाम वापस ले लिया। वजह बताई कि दुनिया के सौ खिलाड़ियों की सूची से जुड़ना चाहते हैं। उनका दांव उलटा पड़ गया लेकिन कोशिश तो उन्होने की ही उसे गलत भी नहीं कहा जा सकता। दुनिया के चोटी के सौ खिलाड़ियों को चारों ग्रैंड स्लैम मुकाबलों में सीधे प्रवेश मिल जाता है। चारों ग्रैंड स्लेम स्पर्धा आस्ट्रेलिया, फ्रांस, इंग्लैड और अमेरिका में होती है। इनमें से एक में भी प्रविष्टि का मतलब हो जाता है पैंतालीस हजार डालर मिल जाना यानी चारों स्पधाओं के मुख्य ड्रा में जगह बनाना ही एक करोड़ रुपए से ज्यादा दिला देता है।
इंचियोन में अगर सोमदेव शुरू में हार जाते तो उन्हें कुछ नहीं मिलता। स्वर्ण पदक जीत लेते तो इनाम के रूप में पांच-सात करोड़ रुपए कहीं नहीं गए थे। फिर भी उन्होंने जो रास्ता चुना वह भविष्य की कमाई को ध्यान में रख कर। देशहित को सर्वोपरि मानने का दावा करने वाले लिएंडर पेस को भी 2014 में ध्यान आया कि एशियाई खेलों की बजाय क्वालालंपुर और तोक्यो में खेलना उनके लिए ज्यादा जरूरी है क्योंकि वह कमाने के सवाल से जुड़ा है। पेस 25 साल से खेल रहे हैं। ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंट की 17 डबल्स स्पर्धाएं वे भले ही जीत चुके हों लेकिन विश्व स्तर पर उनकी रैकिंग लगातार गिर रही है। फिर भी वे हर साल कई करोड़ कमा लेते हैं। ऐसे में एशियाई खेलों में वे अपनी ऊर्जा क्यों खपाते? राष्ट्रीय प्रतियोगिता में खेलना तो वक्त की बरबादी ही ठहरी।
इंचियोन एशियाई खेलों में हिस्सा लेने पर सानिया मिर्जा आखिरी वक्त राजी हो गर्इं तो इसलिए कि उस साल अमेरिकी ओपन में महिला डबल्स का खिताब जीतने से जो रकम मिली सो अलग, तेलंगाना सरकार ने भी उन्हें एक करोड़ थमा दिए। एशियाई खेलों में जीततीं तो कुछ करोड़ और मिल जाते। लेकिन जो नहीं गए उनकी यह दलील समझ से परे है कि अगर वे बिना इनाम वाले टूर्नामेंट में खेले तो उनका करिअॅर चौपट हो जाएगा। दस-बीस साल पहले उन्होंने यह दलील दी होती तो बात समझ में आती। तब क्रिकेट के अलावा अन्य किसी खेल के खिलाड़ी को बड़ी सफलता के बाद भी खास आर्थिक प्रोत्साहन नहीं मिल पाता था। अब तो सामान्य सफलता भी हर खेल के खिलाड़ियों को मालामाल कर रही है। लिएंडर पेस, महेश भूपति और सानिया मिर्जा जैसे टेनिस खिलाड़ियों की संपत्ति ही 30-40 करोड़ रुपए मानी जाती है।
खेल अब बेहतर करिअॅर बन गया है तो सिर्फ इसलिए कि किसी भी प्रोफेशनल कोर्स में दक्षता पाने के लिए सालों मशक्कत करने के बाद भी जीवन भर में कोई व्यक्ति इतना नहीं कमा सकता जितना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता पाने वाले खिलाड़ी पांच सात साल में कमा लेते हैं। स्थितियां पिछले कुछ सालों में ज्यादा सुखद हुई हैं। पहले तो हालत यह थी कि खिलाड़ियों को कोई नहीं पूछता था। 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक में कुश्ती में भारत को पहला व्यक्तिगत् पदक दिलाने वाले केडी जाधव को सड़क पर ठेला चला कर अपना गुजारा करना पड़ा। सड़क पर हुए हादसे में उनकी मौत हो गई। हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले ध्यानचंद ताउम्र मुफलिसी में रहे। ठीक से अपना इलाज भी नहीं करा पाए। आज भारतीय खेलों में बेशुमार पैसा आ गया है। बात सिर्फ क्रिकेट और लॉन टेनिस तक ही सीमित नहीं है। क्रिकेट में बरस रहा पैसा कई खेलों में खिलाड़ियों को मालामाल करने का रास्ता दिखा रहा है। एक महीने से भी कम समय की हॉकी इंडिया लीग में खेलने वाले खिलाड़ियों को 15 से 60 लाख रुपए तक मिल जाते हैं।
फुटबॉल, कुश्ती और बैडमिंटन में भी यही स्थिति हो गई है। एशियाई खेलों तक में मिली सफलता खिलाड़ी को करोड़पति बना देती है। फिर भी स्टार खिलाड़ियों की ज्यादा पैसा कमाने की ललक बढ़ रही है। विश्व क्रिकेट के अस्सी फीसद राजस्व का स्रोत होने की वजह से पिछले कुछ सालों में भारत में क्रिकेटरों पर पैसा बरसने लगा है। इंडियन प्रीमियर लीग ने बीसियों खिलाड़ियों को करोड़पति बना दिया है। विज्ञापन की दुनिया ने इनमें से कुछ को अरबपति बना दिया और कुछ को कतार में आगे बढ़ा दिया है। सचिन तेंदुलकर पहले अरबपति खिलाड़ी बने थे, कप्तान महेंद्र सिंह धोनी उनसे आगे निकल गए। अब विराट कोहली दोनों को कमाई के मामले में लांघ गए हैं। लेकिन इसी के साथ घरेलू क्रिकेट प्रतियोगिताओं की उपेक्षा करने की स्टार खिलाड़ियों की प्रवृत्ति बढ़ रही है।
क रीब आठ दशक पहले चंदे से जुटाई गई रकम के सहारे पानी के जहाज से कष्टपूर्ण सफर कर 1932 में जब भारतीय क्रिकेट टीम पहली बार इंग्लैंड गई थी तब ज्यादातर खिलाड़ियों के पास कंपकपाती ठंड से बचने के लिए पर्याप्त कपड़े भी नहीं थे। छह दशक तक क्रिकेटरों को रोजी रोटी के लिए छोटी मोटी नौकरी करनी पड़ती थी। एक टैस्ट खेलने के लिए ढाई सौ रुपए और मैच स्थल तक जाने के लिए ट्रेन का सेकेंड क्लास। यह था उस समय के क्रिकेटरों को मिलने वाली सुविधाओं का आलम। वह आधार ऐसा था जिसमें खिलाड़ियों को आसानी से ललचाया जा सकता था। लेकिन बीसवीं सदी के आखिरी सालों तक कोई ऐसा प्रसंग सामने नहीं आया कि किसी खिलाड़ी ने पैसा लेकर खराब प्रदर्शन किया हो। शारजाह में करीब डेढ़ दशक तक चले तमाशाई क्रिकेट में फिक्सिंग के आरोप जरूर लगे लेकिन वह माफिया और सट्टेबाजों का मिलाजुला खेल था और इसमें कभी किसी भारतीय खिलाड़ी का नाम नहीं आया। शुरुआती दौर का एक किस्सा नवाब पटौदी ने बताया।
1969-70 में बिल लारी के नेतृत्व में आई ऑस्ट्रेलियाई टीम के मुकाबले नवाब पटौदी भारतीय टीम के कप्तान थे। दिल्ली टैस्ट में भारतीय जीत के नायक रहे अजित वाडेकर। तब मैन आफ द मैच को पांच हजार रुपए दिए जाते थे। नवाब पटौदी ने नियम बना दिया था कि इस तरह मिली पुरस्कार राशि को सभी खिलाड़ियों में बांटा जाएगा। दिल्ली टैस्ट में वाडेकर को पुरस्कार राशि के अलावा वेस्टन का ब्लैक एंड व्हाइट टीवी सेट भी मिला जो उन दिनों बहुत बड़ी लग्जरी माना जाता था। वाडेकर के घर में टीवी नहीं था। उन्होंने सकुचाते हुए नवाब पटौदी से पूछा कि क्या वे टीवी रख सकते हैं? खिलाड़ियों की बैठक बुलाई गई और आमराय से तय हुआ कि वाडेकर की इच्छा पूरी की जाए। लेकिन उस दौर में खिलाड़ियों की देश के लिए खेलने की प्रतिबद्धता कभी कम नहीं हुई। आज के क्रिकेट करोड़पति हैं। फाइव स्टार होटलों में ठहरते है। विशेष विमान से यात्रा करते हैं।
खुद नौकरी करने की बात तो दूर रही आज क्रिकेटर दूसरों को रोजगार मुहैया करा रहे हैं। एनडोर्समेंट के 45 फीसद बाजार पर क्रिकेटर हावी हैं। पहले के क्रिकेटरों की निष्ठा समर्पण भाव की मिसाल दी जाती थी। आज के सभी क्रिकेटरों को ‘बेईमान’ की कतार में खड़ा नहीं किया जा सकता लेकिन आज क्रिकेट की पूरी व्यवस्था पर संशय के ऐसे बादल छा गए हैं कि हर मैच फिक्स लगता है। हर फैसला पूर्व नियोजित दिखता है और खिलाड़ी किन्हीं और की उंगलियों की डोर में बंधी कठपुतलियों की तरह आचार-व्यवहार करते नजर आते हैं। माफिया और सट्टेबाजों ने क्रिकेट को इतनी बुरी तरह जकड़ लिया है कि हर खिलाड़ी व हर मैच किसी न किसी के लालच से बंधे होने का आभास देता है।
2013 में इंडियन प्रीमियर लीग में जो खुलासा हुआ उससे इस बात की पुष्टि हो गई। एक पखवाड़े से ज्यादा के घटनाक्रम ने तो यही दिखाया कि भारतीय क्रिकेट में सही या गलत तरीके से पैसा समेटने की अंधी होड़ मची हुई है। क्रिकेटर हों या प्रशासक, सभी जीभ लपलपाते हुए इस होड़ का हिस्सा बनने में नैतिकता को ताक पर रख चुके हैं। पैसा और उससे जुड़ा ग्लैमर और मान-सम्मान सभी का पहला लक्ष्य बन गया है। 2013 में आईपीएल ने क्रिकेट में काले धन, हवाला के लेन-देन और माफिया की दखलंदाजी की परत पर परत खोल दी। अक्सर यह माना जाता है कि आर्थिक विपन्नता लालच को बढ़ावा देती है। लेकिन पिछले डेढ़ दशक में भारतीय क्रिकेट जितना मालामाल हुआ है, खेल की पवित्रता को बेच डालने के सबसे ज्यादा धब्बे भी उस पर लगे हैं। खिलाड़ियों को आर्थिक लाभ पहुंचाने के कई नए रास्ते खुल गए हैं। कॉरपोरेट की बढ़ती रुचि ने खेलों को मनोरंजन का जरिया बना दिया है। आईपीएल की तर्ज पर हर खेल की लीग शुरू हो गई है। इससे खिलाड़ियों की आर्थिक स्थिति काफी सुधरी है। एक सीजन के लिए खिलाड़ियों को औसतन 15 लाख से 50 लाख रुपए तक आसानी से मिल जाते हैं। प्रो कबड्डी लीग में पहली बार खिलाड़ियों को फाइव स्टार होटलों में ठहरने और महंगी गाड़ियों में घूमने का मौका मिला।
