दिनकर कुमार

गुवाहाटी के पंजाबारी इलाके के बताहघुली गांव की शालिनी छेत्री कुछ दिन पहले अपनी बकरियों के लिए घास लाने पास के अमचांग संरक्षित अभयारण्य में गई थी। रात घर लौटकर नहीं आई। तलाश करने पर उसका कुचला हुआ शव बरामद हुआ। गुवाहाटी के पूर्वी हिस्से में जंगली हाथियों के झुंड ने उसे कुचल कर मार डाला था। इस घटना के बाद गुवाहाटी से 310 किलोमीटर दूर गोहपुर में रोबिन मुर्मू नामक व्यक्ति भी इसी तरह हाथियों के झुंड से कुचले जाने के कारण मारा गया। भारत में सर्वाधिक जंगली हाथी असम में ही पाए जाते हैं। 2002 में उनकी तादाद 5246 थी जो 2011 में बढ़कर 5620 हो गई। राज्य का एक तिहाई इलाका वन क्षेत्र है, जहां हाथी और मनुष्य के बीच संघर्ष हाल के वर्षों में तेज होता गया है। 2006 से लेकर 2016 के बीच जंगली हाथियों ने कुल 785 लोगों के प्राण लिए हैं, जबकि 2001 से 2014 के दौरान 225 हाथियों की मौत शिकार ,जहर ,रेल से कटने ,करंट लगने आदि कारणों से हुई है। यह एक ऐसा संघर्ष है, जिसमें दोनों ही पक्षों को खामियाजा उठाना पड़ रहा है।

बीते दिसंबर में दो गर्भवती हथिनी और एक बच्चे समेत कुल आठ हाथियों की मौत ट्रेन से टकराने की वजह से हुई। इससे एक महीना पहले तेजपुर में पतंजली फूड मेगा पार्क के एक गड्ढे में गिरने से एक हथिनी की मौत हो गई थी। असम में तेजी से वनों का सफाया हो रहा है और हाथियों के विचरण क्षेत्र में बड़ी विकास परियोजनाओं को लागू किया जा रहा है। हाथियों के आक्रमण से फसल और जीवन गंवाने वाले ग्रामीण क्षुब्ध होकर हाथियों पर हमले कर रहे हैं। जंगल में पर्याप्त आहार उपलब्ध नहीं हो पाने की वजह से जंगली हाथी झुंड बनाकर गांवों की तरफ रुख करते हैं, जहां वे फसलों को तबाह करने के साथ ही लोगों पर हमले भी करते हैं। ग्रामीण अपनी फसल और जीवन की सुरक्षा के लिए ढोल पीटते हुए लाठी ,भाला ,बरछी और मशाल लेकर हाथियों को खदेड़ने की कोशिश करते हैं ,वहीं कई बार वे जहर और करंट का प्रयोग करते हुए हाथियों की जान भी ले लेते हैं।

हाथी एक सामाजिक प्राणी है और झुंड बनाकर रहता है। यह प्राणी काफी संवेदनशील होता है। जानवरों में हाथी की याददाश्त काफी तेज मानी जाती है, यहां तक कि अपने झुंड़ के किसी सदस्य के मारे जाने पर अकसर हाथी गुस्से में आकर तबाही मचा देते हैं। अब जरूरत है ऐसे उपायों की जिनसे मनुष्य की हाथियों से मुठभेड़ को टाला जा सके। हाथियों के अकसर आबादी वाले इलाके में घुसने से जानमाल का बड़ा नुकसान भी होता है, पर इस घुसपैठ का कारण ढूंढ़ने के लिए, पहले यह सोचना होगा कि हाथी हमारे इलाकों में घुस आए हैं या फिर हम ही उनके इलाके में घुस गए हैं। ऊपरी असम के डिब्रूगढ़ जिले में लजाई कोलाखोवा इलाके में तीन हफ्ते की अवधि में चार हाथियों के शव खेतों से बरामद किए गए। वन विभाग के कर्मियों का मानना है कि इन हाथियों की जान ग्रामीणों ने करंट की मदद से ली है ,जबकि ग्रामीण इस आरोप को मानने के लिए तैयार नहीं हैं। ग्रामीण उलटे वन विभाग के कर्मियों पर आरोप लगाते हैं कि वे हाथियों के उपद्रव से ग्रामीणों का बचाव करने के लिए कोई कदम नहीं उठा रहे हैं । शाम होते ही पास के मंडेला और दिहिंग रिजर्व फारेस्ट से सैकड़ों हाथी निकल कर आते हैं और ग्रामीणों की फसल को तबाह कर देते हैं। ग्रामीण चाहकर भी उनको रोक नहीं पाते और उनके सारे उपाय निरर्थक साबित होते हैं।

जब हाथी गांवों में घुसकर किसानों के अनाज भंडार को नष्ट करना शुरू कर देते हैं ,तब ग्रामीणों की स्थिति और भी दयनीय हो जाती है। कालाखोवा पंचायत के तहत ऐसे ग्यारह गांव हैं, जहां के लोगों की फसल को जंगली हाथी तबाह करते रहे हैं। यह स्वाभाविक है कि जब किसानों की साल भर की मेहनत तबाह हो जाती है और उनके सामने फाकाकशी की नौबत आ जाती है,तब वे गुस्से में बदला लेने पर उतारू हो जाते हैं। ऐसे में कुछ किसान अपने खेत में बांस के खंभे में बिजली के नंगे तार को जोड़कर खड़ा कर देते हैं और तार के संपर्क में आते ही करंट लगने से हाथी की मौत हो जाती है। जब तक वन कर्मी या पुलिस कर्मी गांव में पहुंचते हैं तब तक बांस के खंभे और बिजली के तार को हटा दिया जाता है और हाथी की मौत पर अनभिज्ञता जाहिर की जाती है। असल में किसानों का अवलंबन अनाज ही होता है और जब हाथी उनके अनाज को नष्ट कर देते हैं और सरकार की तरफ से उनको कोई मुआवजा नहीं दिया जाता तो वे अपने स्तर पर ही जंगली हाथियों से निपटने का रास्ता चुनते हैं।

असल में निचले स्तर पर भ्रष्टाचार व्याप्त होने की वजह से सरकारी योजनाओं के जरिए मनुष्य और हाथी के संघर्ष को नियंत्रित कर पाना संभव नहीं हो पाया है। 1995 से ही उक्त इलाके में हाथियों का उपद्रव शुरू हो गया था, जब मेदेला और दिहिंगमुख रिजर्व फारेस्ट से निकलकर साठ-सत्तर हाथियों का झुंड ब्रह्मपुत्र के कछार वाले इलाके में उपद्रव करता था। फिर हाथियों ने गांवों में घुसकर उपद्रव करना शुरू कर दिया।
25 अक्तूबर 2010 को कोथालबम गांव में हाथियों के झुंड ने 34 घरों को उजाड़ दिया था। वहीं मधुपुर,लजाई और कोलाखोवा में हजारों बीघा की फसल को नष्ट कर दिया था। वन विभाग की तरफ से किसानों को पटाखे और केरोसिन टॉर्च लाइट मुहैया करवाई गई ताकि वे उन चीजों की मदद से हाथियों के झुंड को खदेड़ सकें। डिब्रूगढ़ फारेस्ट डिवीजन को राज्य सरकार और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से मदद के रूप में भारी रकम मिली और अगर रकम का सदुपयोग किया गया होता तो इस समस्या का स्थायी निदान निकल चुका होता।

इस समस्या को हल करने के लिए यूएस फिश एंड वाइल्डलाइफ सर्विसेज,मिशिंग स्वशासी परिषद् और सोनोवाल कछारी स्वशासी परिषद् की तरफ से वित्तीय मदद मुहैया कराई गई। इस तरह करोड़ों रुपए की जो मदद मुहैया कराई गई ,उसकी बंदरबांट भ्रष्ट अफसरों, ठेकेदारों और आपूर्तिकर्ताओं ने कर ली। यही वजह है कि आज तक इस समस्या का ठोस हल मुमकिन नहीं हो पाया। यूएस फिश एंड वाइल्डलाइफ ने जो धन मुहैया कराया था उससे सर्वाधिक प्रभावित ग्रामीण इलाकों में बिजली की बाड़ लगाने की योजना थी। भ्रष्टाचार के चलते यह काम सही तरीके से पूरा नहीं हो पाया और अंत में यह योजना नाकाम साबित हुई।

माना जाता है कि हाथी काफी समझदार होते हैं। वे जब लकड़ी या बांस के खंभे पर बिजली के तार को देखते हैं तो सूंड की सहायता से पेड़ की टहनी तोड़ कर उसके ऊपर फेंक कर गिरा देते हैं। लोगों का कहना है कि जब तक भ्रष्टाचार का बोलबाला रहेगा,तब तक इस समस्या का निदान मुमकिन नहीं हो पाएगा। वन्य जीवों की सुरक्षा के लिए काम कर रहे संगठनों का मानना है कि आम लोगों को पता नहीं है कि जंगली हाथियों के झुंड से किस तरह निपटा जाए। इसके अलावा लोगों में गुस्सा भी ज्यादा है । फसल की तबाही होने पर भी समय पर उनको मुआवजा नहीं मिल पा रहा है। राज्य के वन विभाग का दावा है कि वह हाथियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कई कारगर कदम उठा रहा है। उसने 29 हाथी गलियारों में नियमित गश्त की व्यवस्था की है। ये गलियारे रेल पटरियों के करीब हैं, जहां अक्सर रेलगाड़ी से टकरा कर हाथियों की मौत होती है। इसी तरह, राज्य के सोनितपुर जिले में मनुष्यों और हाथियों के बीच मुठभेड़ बढ़ता ही गया है। इस जिले में एक दशक में हाथियों के हमले में 245 लोग मारे गए ,जबकि इसी अवधि में 146 हाथियों की मौत हुई। इसकी वजह यही है कि इस जिले में 65 फीसद जंगल का सफाया हो चुका है और हाथियों को मानव बस्तियों की तरफ आना पड़ रहा है। जंगली हाथियों को भगाने के लिए पालतू हाथियों की मदद भी ली जाती है, मगर ऐसे हाथियों की तादाद कम है और विशेषज्ञ जंगली हाथियों को पकड़कर पालतू बनाने और उनका उपयोग जंगली हाथियों को खेतों से खदेड़ने की सलाह देते रहे हैं।