शिखर चंद जैन
मीनू मकड़ी आज सुबह से बहुत खुश थी। आज उसे एक नया घर मिल गया था। उसने यह खुशखबरी टीलू ततैये के माध्यम से अपनी दो करीबी दोस्तों जूसी और मौली मकड़ी तक पहुंचा दी। जूली और मौली जानती थीं कि मीनू बहुत दिनों से एक अच्छा घर ढूंढ़ रही थी। इसलिए जब टीलू ततैये ने उन्हें यह समाचार सुनाया तो वे बहुत खुश हुईं। जूली उसी वक्त मीनू मकड़ी के नए घर की तरफ निकल पड़ी। उसने सोचा, ‘चलो मीनू को नए घर में सेट होने में जरा मदद करवा देती हूं।’ जूली पहुंची तो मीनू ने अपने नए घर में उसका स्वागत किया। दोनों सहेलियों ने काफी देर तक इधर-उधर की बातें की। फिर मीनू बोली, सॉरी जूली! अभी तो मेरे घर में तुम्हें नाश्ता करवाने के लिए कुछ भी नहीं। यहां एक भी कीड़ा-मकोड़ा नजर नहीं आ रहा। थकी हुई होने के कारण अभी तक जाल भी नहीं बुन पाई मैं।’ जूली बोली, ‘अरे यार! ये सब टेंशन छोड़। अपने बीच कोई फॉर्मेलिटी वाली बात थोड़ी है। अच्छा सुन, तू इतनी थकी हुई है… आज शाम डिनर मेरे घर में कर लेना। अभी सोकर फ्रेश हो जाओ। लेकिन भूल मत जाना भुलक्कड़ राम!’ जूली जानती थी कि मीनू एक नंबर की भुलक्कड़ है।
मीनू बोली, ‘एक काम कर, मैं एक मजबूत धागा बुनती हूं, उसका एक छोर पकड़ कर तू ले जा। शाम को डिनर रेडी होते ही इस धागे को पकड़ कर हिलाना, इसे मैं अपने पैरों में मजबूती से लपेट कर रखूंगी। इतनी मजबूती से बांधूंगी कि मैं खुद भी इससे न निकल पाऊं। तू धागा हिलाएगी तो मैं आ जाऊंगी।’ कह कर मीनू खिलखिला कर हंस पड़ी। जूली धागे का एक छोर लेकर अपने घर चली गई। इधर जूली निकली ही थी कि मीनू की दूसरी सहेली मौली भी उसका नया घर देखने और मदद करवाने के लिए आ गई। मौली ने मीनू के नए घर की खूब तारीफ की। सामान लगवाने में भी उसकी काफी मदद की। इस बीच दोनों सहेलियों ने खूब गप भी लड़ाई। काम करते-करते काफी देर हो गई, तो मौली बोली, ‘यार मीनू! अब मुझे निकलना होगा। आज मेरे बच्चों का बर्थडे है। इसलिए मैंने शाम को बहुत से मकड़े-मकड़ियों और अन्य दोस्तों को डिनर पर बुलाया है। काफी तैयारी करनी है।’ मीनू ने कहा, ‘अरे, फिर यहां आकर टाइम वेस्ट करने की क्या जरूरत थी। चल फटाफट निकल और अपने मेहमानों के स्वागत की तैयारी कर।’मौली बोली, ‘कोई बात नहीं यार! कर लूंगी मैं। मेरे बच्चे भी बड़े होशियार हैं, काफी काम करवा देते हैं। और मेरा मिस्टर कोकू मकड़ा भी बहुत मेहनती है। कोई दिक्कत नहीं होगी। तू एक काम कर, तू भी आ जाना। इतनी थक गई है, वहीं मस्ती करेंगे। तू खाना खाकर मेरे ही घर सो जाना और कल सुबह आ जाना।’
मीनू बोली, ‘अरे जरूर, लेकिन तूझे तो पता ही है कि मैं कितनी भुलक्कड़ हूं। एक काम कर तू एक मजबूत धागा बुन और कस कर मेरे पैरों में बांध जा। जैसे ही पार्टी शुरू होने वाली हो, इस धागे से पकड़ कर हल्के से खींचना। मुझे याद आ जाएगा और मैं चल दूंगी।’ वह जूली का न्योता भूल चुकी थी। मौली बोली, ‘वाह क्या आइडिया है। तू भुलक्कड़ जरूर है, लेकिन बहुत होशियार है।’ उसने बेहद मजबूत धागा बुना और उसके पैरों में लपेट दिया। धागे का दूसरा छोर लेकर वह अपने घर चल पड़ी। मौली का घर जूली के घर से बिल्कुल विपरित दिशा में था। मीनू थकी-हारी थी। सहेली के जाते ही उसे जोरदार नींद आ गई। मीनू गहरी नींद में थी, तभी उसे लगा कि उसे कोई हिला रहा है। उसने देखा कि उसके पैरों में बंधा धागा हिल रहा है। उसे याद आ गया कि जूली के घर डिनर पर जाना है। लगता है जूली का डिनर तैयार हो गया। उसने जूली के घर जाने की तैयारी शुरू कर दी। तभी उसके दूसरे पैर में बंधा एक और धागा हिलने लगा। मीनू सोच में पड़ गई। तभी उसे याद आया कि उसने तो मौली का डिनर का न्योता भी स्वीकार कर रखा है। अब वह उलझन में पड़ गई। दोनों सहेलियों के घर विपरित दिशा में थे। दोनों के यहां तो जाना संभव नहीं था। ज्यों-ज्यों समय बीत रहा था, उसकी सहेलियां उतावली हो रही थीं। उन्हें मीनू के भुलक्कड़ स्वभाव का पता था। इसलिए वे धागे को हिलाने की बजाय जोर-जोर से खींचने लगीं ताकि उसे खींच कर अपने घर तक पहुंचा सकें।
दो विपरीत दिशाओं से धागा खींचने से मीनू मकड़ी की हालत खराब हो गई। उसने अपने पैर छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन धागे बेहद मजबूत थे और बहुत मजबूती से बंधे हुए थे। तमाम कोशिशों के बावजूद वह खुद को छुड़ा न पाई। दर्द से कराहते हुए वह रोने लगी। भूलने की आदत इतनी मंहगी पड़ जाएगी उसने कभी सोचा भी नहीं था। धागा मजबूत था और मीनू की टांगें कमजोर थीं। धागों से बंधी उसकी टांगे टूट कर अलग हो गर्इं और वह घायल होकर बेहोश हो गई। देर रात दोनों सहेलियां चिंतित होकर उसके घर आर्इं। उसकी हालत देख कर वे सारा माजरा समझ गईं। उन्होंने उसका इलाज किया। हफ्ते भर तक तीमारदारी की तब जाकर मीनू ठीक हुई। लेकिन उसने सौंगंध खा ली थी कि अब वह अपनी भूलने की आदत से छुटकारा पा लेगी।
