अशोक शाह
देह दोहरी हो रही
थकी दोपहर-सी
देह हो रही
देखो वृक्ष के वक्ष पर
थकी गिलहरी सो रही
देह दोहरी हो रही
शिराओं में रक्त लुढ़कता
खाली पिंजरे में चूजा फुदकता
हिलती आत्मा इधर उधर
लग जाए दाग न कहीं अमर
पूछो नहीं बात बस कस दो गात
प्राणवायु कम-सी हो रही
दुनिया देखो मोर हो रही
दिल छोड़ गोर अगोर रही
आया समय चीथड़ा चीथड़ा
बाहर भीतर उथला पुथला
तन कर शब्द जो तान हुए
कर्कष लगते आन हुए
बांध दो तन गगन स्तंभ से
शून्य शिखर से शाम ढल रही
अब तक थी जो गरज रही
मुंह ढांप कर सो रही
उठी तरंग ही गिर रही
हर रचना विलीन हो रही
देह दोहरी हो रही
वृद्धाश्रम
वृद्धाश्रम जिंदगी का यतीमखाना है
अपनी ही बनाई दुनिया में
अपनों से ही हारी हुई जिंदगी ने पनाह ली है यहां
जैसे जमाने की मधुर संगीत से छिटक के कुछ धुनें
सितार के तार से अलग हो गई हों
सुबह की तरुणाई की अधूरी यादें
शाम की गोधूलि में थक के कुछ लम्हें चुन रही हैं
दिन खत्म है यहां
आखिरी भभक के ठीक बाद
बुझने से पहले दीये जैसे ताखे पर रख दिए हों
पूछें किससे, कहकहे लगाते किन लफ्जों के
ये गिरे हुए नुक्ते हैं
उस जबान में कहां बची होगी तहजीब
बिना अदब और मानी के कैसे चला रही है काम
किस सभ्यता ने इतनी बेदर्दी से
जिंदगी के छिलके उतारा है
जैसे किसी अभिशाप ने फलीभूत होने की जल्दबाजी में
केचुल छोड़ दिया हो
शोर मत करो, न करो सवाल
गलती से भी रख दिया जो किसी कंधे पर हाथ
वह सूखे पत्ते की तरह खड़खड़ा जाता है
हल्के भार से दब कर चूर-चूर होता है
कभी रहे होंगे किसी हरे वृक्ष का गर्व
वे उस बीते कल के सूखे पत्ते हैं
जिसे बड़ी बेवफाई और बेमानी से जीया गया होगा
कितनी क्रूरता और हिंसा भरी है आज दिलों में
पेट भरते ही इन्हें जूठन की तरह फेंक दिया गया
वृद्धावस्था जिंदगी का हाशिया हो चला है
बेबाक टिप्पणियां अकेली पड़ गई हैं
इन विरानियों को हमने बुना है
जीने के इस तरीके को हमने ही चुना है
पर इसे एक बार बदल के भी देखा जा सकता है।
