मूलचंद बोहरा
कविता: सूरज बाबा
सूरज बाबा अभी न जागो
थोड़ा तो सुस्ताने दो
छुट्टी अभी शुरू हुई है
थोड़ा तो निंदियाने दो।
गरम-गरम किरणें बरसा कर
क्यों मीठी नींद जगाते हो
झीने-भीने मौसम में
क्यों तपते तीर चलाते हो
हम भी सोएं तुम भी सोओ
छुट्टी-छुट्टी, मस्ती-मस्ती
कुछ तो मौज मनाओ।
अरे! ढीठ हो कैसे?
मनमानी ही करते हो
लाल लाल आंखों से
झुलसा कर रख देते हो।
अब न होगा रोना-धोना
बाबा की बलिहारी का
तुम तपोगे, हम तपेंगे
देखें, ज्यादा कौन तपेगा?
अब चाहो तो लू बरसा लो
या बरसा लो अंगारे
हम न झुकेंगे, हम न रुकेंगे
चाहे जितना जोर लगा लो।
सूरज बाबा, अच्छे हो
समझ हमें अब आया है
अपना काम, अपनी चाल
करते रहना, चलते रहना
सबक यही अब भाया है।
शब्द भेद: कुछ शब्द एक जैसे लगते हैं। इस तरह उन्हें लिखने में अक्सर गड़बड़ी हो जाती है। इससे बचने के लिए आइए उनके अर्थ जानते हुए उनका अंतर समझते हैं।
अवशिष्ट / अपशिष्ट
संस्कृत में दो उपसर्ग हैं- अव और अप। अव उपसर्ग बचे हुए के अर्थ में भी लगता है। इस तरह अवशिष्ट का अर्थ है बचा हुआ, शेष। जबकि अप उपसर्ग बुरे के अर्थ में लगता है। इस तरह अपशिष्ट का अर्थ है कचरा।
मध्यम / माध्यम / मद्धिम
बीच की अवस्था को मध्यम यानी जिसे अंग्रेजी में मिडिल कहते हैं। जबकि माध्यम का अर्थ होता है जरिया। राजेश के माध्यम से पत्र भिजवाया। जबकि मद्धिम का अर्थ है धीमा। जैसे मद्धिम आंच, मद्धिम चाल।

