माउथ आर्गन

कोई तो धरो
कोई तो बढ़ो
तट पर बैठे तुम सभी देख रहे हो मेरा मुंह
समुद्र नहीं देखा है कभी?
कबसे दौड़-दौड़ कर आ रही हूं तुम्हारे पास
कोई तो मेरी सुनो, बारिश आने वाली है
और बाहर पड़ी है टॉलस्टाय की अन्ना कैरेनिना,
गोर्की की मां
मुझे घर जाना है
मुझे रांधना है, कब से रांधा नहीं इडिअप्पम, पुट, पतरी
मोहिनीअट््टम में कब से लोगों ने नहीं देखा मुझे
कब से नाचा नहीं तिरुवादिरा के कोरस में।

मैं एक पटरी थामे हुए हूं
मेरी नाव के कई टुकड़े कर गई शैतानी ताकत
छीन ले गई पाल और पतवार
पास में कुछ नहीं बचा माउथआर्गन के सिवाय।

निस्तब्ध रात में सींखचे के बाहर
रह-रह कर बलसम्मा की गूंज रही है आवाज
वार्डन शारदा सोचती है कि
आरोप बड़ा है सभी कह रहे
नहीं देंगे साथ
लेकिन यूं ही तो नहीं पहुंचे होंगे भरी सभा में…
ऊंची गर्दन पर बलसम्मा के हाथ।
बलसम्मा को नहीं आ रही है नींद
किसी भी करवट नहीं पड़ रहा है कल
वह उठ कर देखती है घड़ी, बाहर आ जाती है
निकल कर।

बलसम्मा को ले जाया जा रहा है
एक जगह से दूसरी जगह
दबी हुई दूब के ऊपर से पत्थर को हटाती
सैल्यूट करती है शारदा
मुस्कराती बलसम्मा आकर बैठ जाती है पुलिस शान में
जेब से निकाल बजाने लगती है माउथ आर्गन
स्वरों के लिए मुक्तता की रूमाल भर उम्मीद।

अनुपस्थिति की उपस्थिति

दृश्य में वे नहीं हैं
उनकी रहन कमरे में कर रही है वास
सुबह-शाम बदली जा रही हैं बिछावन की चादरें
मसहरी उठाई, गिराई जा रही है
सिरहाने पानी रखा जा रहा है
किताबों को दिखाई जा रही है धूप।

दृश्य में कोई नहीं है
अदृश्य में रचना का दृश्य है
हां, उसी के सान्निध्य में बैठे हैं यहां कुछ लोग
उनके मौन में कमरे की रहन का वक्तव्य हो रहा है
लिपिबद्ध।

दृश्य में कोई नहीं है
दृश्य में जो नहीं है, उसे मैं बांचता हूं-
अनुपस्थिति की उपस्थिति में उतर कर। ०