सुभाष चंद्र लखेड़ा
यों भूख शांत करने के लिए हमारे देश में चिवड़ा और सत्तू जैसे तुरंता आहार सैकड़ों वर्षों से प्रचलन में हैं, लेकिन आधुनिक तुरंता आहार यानी ‘फास्ट फूड’ में रेस्तरां या परचून की दूकानों में पैकेटों या डिब्बाबंद ऐसे आहार शामिल हैं, जिन्हें पहले से पकाई या तपाई हुई खाद्य सामग्री से तैयार किया जाता है। दरअसल, आहार के हिसाब से किसी भी मनुष्य की स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए उसके द्वारा खाए जाने वाले खाद्य पदार्थों में छियालीस पोषाहारों का होना बहुत जरूरी है। पोषण विज्ञान में इन छियालीस पोषाहारों को ‘अनिवार्य पोषाहार’ कहा जाता है। किसी भी अनिवार्य पोषाहार का मतलब आहार में मौजूद उस पोषाहार से है, जो शरीर को भोजन से मिलना चाहिए। हमारे लिए पानी, तेरह विटामिन, लिनोलीइक अम्ल, आठ या नौ एमिनो अम्ल, इक्कीस खनिज तथा ग्लूकोज अनिवार्य पोषाहार हैं। इनमें से किसी का भी अभाव हमारे शरीर के लिए नुकसानदेह हो सकता है। चिंता की बात यह है कि आजकल प्रचलित फास्ट फूड में इनमें से अधिकांश पोषाहारों की कमी होती है। सही शारीरिक विकास के लिए आहार में कार्बोहाइड्रेट, वसा और प्रोटीन उचित अनुपात में होने चाहिए। बाजार में फास्ट फूड के नाम पर जो चीजें सहज उपलब्ध हैं, उनमें कार्बोहाइड्रेट और वसा तो होती है, लेकिन प्रोटीन पर्याप्त मात्रा में नहीं रहता। यही नहीं, उनमें पड़ने वाले कृत्रिम नमक और प्रिजर्वेटिव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं। प्रोटीन की कमी के कारण बच्चों और किशोरों के सहज शारीरिक विकास में विसंगतियां आती हैं।
हमारे देश में फास्ट फूड से सामान्य लोगों का परिचय 1982 में तब हुआ, जब दो मिनट में तैयार होने वाले नूडल्स बाजार में आए। धीरे-धीरे इस सूची में फ्रेंच फ्राई, चाउमिन, बर्गर, पित्जा, पास्ता, बफलो विंग, ब्रेडस्टिक और गार्लिक ब्रेड आदि शामिल होते गए। आजकल बच्चों और किशोरों में फास्ट फूड के प्रति तेजी से लगाव बढ़ रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार महानगरों में साठ फीसद बच्चों को फास्ट फूड का चस्का लगा हुआ है। वजह चाहे समय की कमी हो या कुछ और, जब हम परंपरागत रूप से तैयार किए जाने वाले आहार को छोड़ कर फास्ट फूड को अपना लेते हैं तो हमें यह मान लेना चाहिए कि हम स्वास्थ्य की उपेक्षा कर रहे हैं। चिकित्सकों और आहार विशेषज्ञों के अनुसार पहले जो रोग लोगों को बड़ी उम्र में होते थे, आजकल फास्ट फूड और प्रदूषण जैसे कारणों से वही रोग बच्चों, किशोरों और युवाओं को होने लगे हैं। अब छोटे शहरों-कस्बों में भी तेजी से फैलती ‘फास्ट फूड और फास्ट लाइफ’ संस्कृति हमें बीमारियों का शिकार बना रही है। महानगरों तथा छोटे-बड़े शहरों में फास्ट फूड कंपनियों के आंधाधुंध तरीके से फैलते जाल के कारण पनप रही ‘फास्ट फूड संस्कृति’ की वजह से इन बीमारियों का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है। युवा पीढ़ी में चीज-बर्गर, पित्जा, चॉकलेट, आइस्क्रीम तथा चाउमीन, छोले-भटूरे जैसे अनेक आहारों के प्रति बढ़ता लगाव उनकी सेहत को चौपट कर रहा है।
दरअसल, बाजार में मिलने वाले सभी फास्ट फूड में कुछ ऐसे रसायन होते हैं, जिनकी वजह से हमारे शरीर में बुरे कोलेस्ट्रॉल का स्तर और मधुमेह होने का खतरा बढ़ता है; शरीर की प्रतिरोधक क्षमता में कमी आती है और डीएनए को नुकसान पहुंचता है। वैज्ञानिक अध्ययनों से यह साबित हो चुका है कि जो व्यक्ति जितना अधिक वजन का होगा, उसे उच्च रक्तचाप, मधुमेह और उच्च रक्त कॉलेस्ट्राल की समस्याएं उतनी ही अधिक होंगी। मौजूदा समय में आनन-फानन में तैयार होने वाले फास्ट फूड, वसायुक्त खाद्य पदार्थों, अत्यधिक मीठी वस्तुओं और डिब्बाबंद खाद्य सामग्री के प्रयोग के कारण लोगों के शरीर में बुरे कोलेस्ट्रॉल की मात्रा बढ़ रही है। कोलेस्ट्रॉल बढ़ने से हृदय को ऑक्सीजन समृद्ध रक्त पहुंचाने वाली धमनियों में अवरोध पैदा हो जाता है, जिससे हृदय की मांसपेशियों को पर्याप्त मात्रा में आॅक्सीजन नहीं मिल पाती है। आज के समय में फास्ट फूड के बढ़ते चलन के अलावा महानगरीय बिलासितापूर्ण रहन-सहन, गलत खानपान, धूम्रपान, शराब सेवन, व्यायाम से बचने की प्रवृत्ति तथा मानसिक तनाव और अन्य मानसिक परेशानियों के कारण भी दिल की बीमारियों से ग्रस्त लोगों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। फास्ट फूड बनाने के लिए अधिक मात्रा में वसा तथा कार्बोहाइड्रेट का इस्तेमाल होता है। ये दोनों हमारे हृदय को नुकसान पहुंचाते हैं। इसके अलावा, फास्ट फूड में अधिक नमक होने के कारण सोडियम का अंश भी बहुत अधिक होता है। यह रक्तदाब तथा हृदय रोग की आशंका को बढ़ाता है। दुनिया के विभिन्न देशों के स्वास्थ्य संगठनों द्वारा चेतावनी दिए जाने के बावजूद आज भी फास्ट फूड बनाने वाली कंपनियां धड़ल्ले से अपने उत्पाद तैयार करने में संश्लेषित रसायनों, ट्रांस-फैट्स, चीनी की ऊंची मात्रा, मिठास पैदा करने वाले कृत्रिम रसायनों, हाई-फ्रक्टोज कॉर्न सिरप और कतिपय पेट्रो-रसायनों का इस्तेमाल कर रही हैं। उनके द्वारा तैयार किए जाने वाले कुछ आहारों और पेयों में टर्शियरी ब्यूटिल हाइड्रोक्विनोन का इस्तेमाल बतौर परिरक्षक यानी प्रिजर्वेटिव किया जाता है। गौरतलब है कि अगर इस रसायन की सिर्फ एक ग्राम मात्रा हमारे शरीर में पहुंच जाए तो हम मितली, वमन, घुटन और चक्कर आना जैसे लक्षणों से पीड़ित हो सकते हैं। फास्ट फूड में पाए जाने वाले एक दूसरे रसायन ‘मोनोसोडियम ग्लूटामेट’ के सेवन से भी सिरदर्द, मितली, सीने के दर्द और कमजोरी के मामले सामने आए हैं। इस रसायन के सेवन से भूख महसूस करने की इच्छा में बढ़ोतरी होती है। फलस्वरूप, बहुत सारा ‘फास्ट फूड’ खाने के बावजूद भूख शांत नहीं होती है और हम जरूरत से अधिक खा जाते हैं।
फास्ट फूड बनाने में इस्तेमाल किया जाने वाले रसायन डाइमेथिल पोली सिलोक्सेन, सोडियम फॉस्फेट और अन्य दूसरे संश्लेषित रसायन भी हमारे लिए नुकसानदेह होते हैं। प्राकृतिक रूप से दूध में मौजूद केसीन प्रोटीन को ‘फास्ट फूड का निकोटिन’ कहा जाता है। दरअसल, फास्ट फूड बनाने के लिए जिस केसीन का इस्तेमाल किया जाता है, उसे बनाने के लिए कैल्सियम हाइड्रोजन फॉस्फेट रसायन का इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह से बनाए जाने वाले केसीन का हमारे दिमाग पर नशीला प्रभाव पड़ता है। फलस्वरूप, हम उन फास्ट फूड को खाने के आदी हो जाते हैं, भले ही वे हमारे शरीर के लिए नुकसानदेह हों। वास्तव में अधिकतर फास्ट फूड उत्पादों में ऐसे रसायन मिलाए जाते हैं, जो उनके स्वाद को बढ़ा कर बच्चों को अपने मकड़जाल में फंसा लेते हैं। साथ ही हमें अपने बच्चों को यह भी समझाना होगा कि चिप्स, कुकीज, कैंडी बार, मफिन्स, फ्राइड फूड्स जैसे आहारों में हाइड्रोजन कृत तेल और ट्रांस-फैट्स होते हैं और इनका हमारे स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। कभी-कभार फास्ट फूड के सेवन से कोई इनके मकड़जाल में नहीं फंसता, लेकिन अगर किसी वजह से कोई इनका निरंतर सेवन करता है, तो फिर वह इनका आदी हो जाता है। इनकी लत लगने के बाद विशेषकर बच्चे और किशोर घरों में बनने वाले परंपरागत भोजन को देख कर नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं। दरअसल, अपनी व्यस्तताओं के चलते पहले तो अधिकतर अभिभावक खुद ही अपने बच्चों को फास्ट फूड के तहत आने वाले आहार देते हैं और फिर जब बच्चों और किशोरों के स्वास्थ्य पर उनका बुरा प्रभाव दिखने लगता है, तब वे अपनी गलती पर पछताते नजर आते हैं। यहां यह तथ्य उल्लेखनीय है कि चिकित्सकों के अनुसार तकरीबन साठ फीसद बीमारियां बच्चों को उनके गलत खानपान की वजह से होती हैं।

