बिलासपुर की युवा रंगकर्मी रचिता टंडन के लिए रायपुर जैसे उनींदे से शहर में समीरा मखमलबाफ की ईरानी फिल्म ‘ब्लैकबोर्ड’ को देखना किसी सुखद आश्चर्य से कम नहीं था। रायपुर के फिल्मकार मनोज वर्मा को हैरत हो रही थी कि ढाई सौ भी अधिक फिल्में बनाने के बाद भी यहां से बाहर किसी को पता भी नहीं कि छत्तीसगढ़ में भी एक फिल्म उद्योग है। अभिनेत्री अनुराधा दुबे के लिए यह सब किसी सपने की तरह था। जब से छत्तीसगढ़ नया राज्य बना है तब से यह पहली बार हो रहा था कि सिनेमा को लेकर कोई आयोजन हुआ।
बात हो रही है दूसरे रायपुर इंटरनेशनल फिल्म समारोह और फिल्म एप्रेशिएशन कोर्स की। यह आयोजन पिछले पखवाड़े नौ से सोलह अप्रैल को रायपुर में संपन्न हुआ। इस आयोजित करने में छत्तीसगढ़ फिल्म एवं विजुअल आर्ट सोसायटी, भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान पुणे, फिल्म समारोह निदेशालय भारत सरकार और संस्कृति विभाग छत्तीसगढ़ का योगदान रहा। इसमें गुरु घासीदास संग्रहालय के मुक्ताकाश मंच पर श्याम बेनेगर की फिल्म ‘ नेताजी सुभाषचंद्र बोस-द फॉरगाटन हीरो’ दिखाई गई तो लोगों ने हीरो सचिन खेड़ेकर से काफी देर तक सवाल-जवाब किए। यही नजारा केतन मेहता के साथ देखा गया। परेश रावल की मुख्य भूमिकावाली उनकी फिल्म ‘सरदार’ देखने के बाद दर्शकों ने उन्हें घेर कर सवाल पूछे। केतन मेहता और दीपा साही की फिल्मों के पुनरावलोकन में ‘रंग रसिया’,‘माया मेमसाब’ और ‘मिर्च मसाला’ का प्रदर्शन किया गया। चौदह अप्रैल को आंबेडकर जयंती पर जब्बार पटेल की फिल्म ‘डॉ बाबासाहेब आंबेडकर’ का प्रदर्शन दर्शकों को लुभा गया।
छत्तीसगढ़ से सिनेमा का बहुत पुराना रिश्ता रहा है। यहां के सत्यदेव दुबे, हबीब तनवीर और किशोर साहू पर राज्य के लोग गर्व करते हैं। सत्यजीत राय ने जब प्रेमचंद की ‘सद्गति’ पर इसी नाम से फिल्म बनाने का फैसला किया तो वे शूटिंग के लिए छत्तीसगढ़ ही गए। ओमपुरी ने बताया कि जब वे रात के नौ बजे रेलगाड़ी से रायपुर स्टेशन पहुंचे तो उन्हें लेने सत्यजीत राय खुद स्टेशन आए थे। ‘राजनीति’ ‘अपहरण’ ‘गंगाजल’ जैसी कई हिट फिल्में बनाने के बाद भी लोग प्रकाश झा को ‘दामुल’ का ही फिल्मकार मानते हैं जो शैवाल की कहानी पर अस्सी के दशक में बनी थी। प्रकाश झा ने आश्चर्य प्रकट किया कि अभी तक उन्होंने छत्तीसगढ़ में फिल्म बनाने की क्यों नहीं सोची? ‘दामुल’ के प्रदर्शन के बाद उन्होंने वादा किया कि वे यहां फिर आएंगे।
रायपुर जैसे छोटे शहर के फिल्म प्रेमियों ने शायद पहली बार जाना कि फिल्मी सितारों को जमा करके रसमंजरी कार्यक्रम करने और एक गंभीर आयोजन में क्या फर्क होता है। बारह बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार पानेवाले कन्नड़ के फिल्मकार गिरीश कासरावल्ली की रायपुर में उपस्थिति ही अपने आप में एक संदेश था। उनकी फिल्मों पर एक पूरा दिन और फोकस रहा।
‘हंस’ के संपादक चिंतक संजय सहाय भी इस आयोजन में शामिल हुए। इसे लेकर उनकी प्रतिक्रिया थी, ‘किसी के लिए पहले तो यह विश्वास करना ही कठिन है कि रायपुर में अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल जैसा कुछ संभव है। लेकिन यहां आकर पता चला कि इसके लिए यह सबसे सही जगह है। यहां के लोगों में सिनेमा को लेकर गंभीर किस्म की जिज्ञासा बची हुई है।’ साहित्य और सिनेमा पर सहाय की ‘कक्षा’ में बड़ी भागीदारी नौजवानों की थी। उन्होंने कहा कि दुनिया की अधिकतर महान फिल्में साहित्य पर बनी हैं, पर यह जरूरी नहीं कि साहित्य के बिना अच्छा सिनेमा बन ही नहीं सकता। आरसन वेल्स, अकीरा कुरोसावा, सत्यजीत राय, श्याम बेनेगल, डेविड लीन फ्रांसिस फोर्ड, कपोला गुरुदत्त से लेकर अनुराग कश्यप, परेश कामदार तक ने साहित्य पर फिल्में बनाई हैं।
इस समारोह ने छत्तीसगढ़ में सिनेमा के लिए दो बड़े रास्ते खोले हैं। पहला यह कि कैसे किसी छत्तीसगढ़ी फिल्म को नेशनल फिल्म अवार्ड मिले और कैसे यहां की फिल्में भी गोवा फेस्टिवल के इंडियन पैनोरमा में और दुनिया भर के फिल्मोत्सवों में दिखाई जाएं। भारत के अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह गोवा और भारत सरकार के फिल्म समारोह निदेशालय के उपनिदेशक रिजवान अहमद की ‘कक्षा’ में इन्ही मुद्दों पर चर्चा हुई।
आयोजन में एक चर्चा के दौरान मुंबई के कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा ने बताया कि फिल्मों में काम कैसे मिलता है और इस विषय में क्या भ्रम फैलाए गए हैं। हजारों नौजवान यही पूछते हैं कि उन्हें फिल्मों में अभिनय का अवसर कैसे मिल सकता है। समारोह के सहायक निदेशक योग मिश्रा ने चर्चाओं को आयोजन की उपलब्धि बताया।
रंगमंच और सिनेमा के कलाकार पीयूष मिश्रा की हॉलीवुड की फिल्म ‘द प्लेबैक सिंगर’ को थोड़ी कम तवज्जो मिली। लेकिन जब हारमोनियम के साथ वे मंच पर उतरे और स्वलिखित गाने गाना शुरू किया तो दर्शक झूमने लगे। यशपाल शर्मा लगभग दो सौ से भी अधिक फिल्मों में काम कर चुके हैं। इन दिनों उनका सारा ध्यान रंगमंच और हरियाणवी सिनेमा पर है। हरियाणवी की राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म ‘ पगड़ी-द ऑनर’ को भी दर्शकों ने सराहा। परेश कामदार की ‘जॉनी जॉनी यस पापा’ में यशपाल का काम लोगों को काफी पसंद आया। उनका सर्वश्रेष्ठ काम तो शैवाल लिखित और स्वर्गीय राजन कोठारी निर्देशित ‘दास कैपिटल’ में दिखाई दिया।
यह संयोग ही रहा कि तीन आप्रवासी फिल्मकार अपनी फिल्मों के साथ अपने खर्चे पर रायपुर पहुंचे। टोरंटो (कनाडा) के जय बजाज कई अंतरराष्ट्रीय फिल्मोत्सवों के सलाहकार हैं, जिसमें भारत का अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह गोवा भी एक है। उनकी फिल्म ‘द मैन हू सेव्ड ताजमहल’ पर्यावरणविद एम सी मेहता पर वृत्तचित्र है। मास्को के सरफराज आलम की बांग्ला फिल्म ‘चोखेर पानी’ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सत्ता में आने से पहले सिंगूर और नंदीग्राम में घटित हिंसक घटनाओं की लोमहर्षक कहानियां पर आधारित है। इसे तबके भूमिगत नेता मानिक मंडल ने लिखा है। वेल्स -यू के नामी नेत्र सर्जन निखिल कौशिक की फिल्म ‘भविष्य-द फ्यूचर’ उन उत्साही डॉक्टरों के बारे में है जो बेहतर भविष्य की तलाश में विदेश तो चले गए पर बार बार स्वदेश आने का सपना देखते हैं।
बच्चों के लिए अलग से फिल्मों के प्रदर्शन भी किया गया। पद्मश्री नीला माधब पांडा की तीनों फिल्में-‘आई एम कलाम’, ‘जलपरी’ और ‘कौन कितने पानी में’ को सबने सराहा। ये सभी फिल्में किसी न किसी सामाजिक समस्या पर बनी हैं। श्याम टाकीज के साथ साथ भिलाई में बच्चों की फिल्मों का पूरा खंड प्रदर्शित किया गया। कार्यक्रम में चित्रकार तुषार बाघेला के निर्देशन में कई नौजवानों ने फिल्म निर्माण की कला और तकनीक सीखी । आज तकनीक के आसान और सस्ती होने के कारण कोई भी अपनी फिल्म बना सकता है।
आम जनता की रुचि को देखते हुए समारोह का एक विशेष केंद्र शहर के बीच बड़े तालाब के किनारे स्थित एकमात्र सिंगल स्क्रीन सिनेमा हॉल श्याम टॉकीज को बनाया गया था। यहां पर चुनी हुई छत्तीसगढ़ी फिल्मों के दो शो हर दिन रखे गए थे। बाकी के तीन शो में भारत सरकार के फिल्म समारोह निदेशालय और यूएफओ कंपनी के सहयोग से भारतीय पैनोरमा की बीस फिल्मों का पैकेज दिखाया गया जिसमें हिंदी सहित विभिन्न भारतीय भाषाओं से फिल्में चुनी गई थीं। रायपुर अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह के अध्यक्ष और संस्कृतिकर्मी सुभाष मिश्रा और उनकी पत्नी रचना मिश्रा की भूमिका प्रशंसनीय रही। छत्तीसगढ़ी फिल्म उद्योग आठ दिनों तक लगातार सिनेमा का उत्सव मनाने में लगा रहा, जिसे दर्शकों ने भरे पूरे मन से अपनाया।
