आनंद शुक्ल

भारत की संश्लिष्ट भाषिक और सामाजिक संरचना के कारण विद्वानों ने सभी भाषिक सामाजिक इकाइयों के मूल में विद्यमान एकता के कारण इसे एक ‘भाषिक क्षेत्र’ की संज्ञा से अभिहित किया है। भारत की सभी प्रमुख भाषाओं में भाषिक स्तर पर समानता भारतीय भाषाओं के अंतर्संबंधों की व्याख्या करती है। भारतीय भाषाओं की इस मूलभूत एकता का कारण देश की सांस्कृतिक एकता है। धर्म, दर्शन, साहित्य, कला तथा संस्कार की एकता भाषाई एकता को सुदृढ़ करती है। इस परिकल्पना और विचार को स्थापित करने में हिंदी तथा उर्दू की केंद्रीय भूमिका रही है। दोनों भाषाओं का मूलाधार एक है, जिसे हिंदवी, हिंदुई या हिंदी कहा गया है। भाषाई मूल की एकता के कारण दोनों भाषाओं में समानता और सामंजस्य के तत्त्व अधिक रहे हैं, जबकि भिन्नता और बिखराव के कम। परिनिष्ठित साहित्य और लिपि के स्तर पर अलगाव के बावजूद बोलचाल के स्तर पर, बाजार की भाषा के रूप में, लोकप्रिय साहित्य, रंगमंच, सिनेमा और अन्य कला माध्यमों की भाषा के रूप में हिंदी और उर्दू में भेद कर पाना आसान नहीं रहा है। आम जन की भाषा जिसे ‘हिंदुस्तानी’ कहा गया है, उसमें हिंदी और उर्दू की साझा भागीदारी रही है।

हिंदी और उर्दू के आरंभिक भाषाई और साहित्यिक अंतर को विभाजक और परस्पर विरोधी बनाने का काम उन्नीसवीं-बीसबीं शताब्दी में धर्म और राजनीति ने बड़े पैमाने पर किया। इस अभियान का आरंभ ब्रिटिश शासकों ने अपने साम्राज्यवादी हितों की रक्षा के लिए किया। उन्होंने धार्मिक आधार पर भाषाई विभाजनवादी विचार को विकसित किया और उसे अपनी भेदभावपूर्ण भाषा नीति का आधार बनाया। आधुनिक भारतीय इतिहास का यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष है कि ब्रिटिश शासकों के इस कुत्सित अभियान में दोनों समुदायों के हिमायती संगठनों और नेताओं ने संकीर्ण मानसिकता का परिचय देते हुए वर्गीय हितों की रक्षा के नाम पर सहयोग किया। इसका परिमाण यह हुआ कि दोनों भाषाओं की अलग-अलग धार्मिक पहचान बन गई।

भारत विभाजन की त्रासदी ने हिंदी और उर्दू के बीच की खाई को और गहरा तथा चौड़ा कर दिया। इसने हिंदी और उर्दू के पारस्परिक संबंधों को बाधित किया तथा कालांतर में उर्दू को मुसलमान अल्पसंख्यकों की भाषा तक सीमित करने की साजिश की गई। आजादी के बाद के दशकों में धर्म और राजनीति के अलमबरदारों ने निहित स्वार्थों के लिए भाषाई विवाद को जिंदा बनाए रखा है। इस प्रवृत्ति ने न केवल दोनों भाषाओं को नुकसान पहुंचाया, बल्कि साझा संस्कृति के विकास को अवरुद्ध भी किया है। वर्तमान दौर में हिंदी का संघर्ष अपने को स्थापित रखने का है तो उर्दू के सामने अपनी पहचान बनाए रखने के संकट से उबरना है।

विगत दो शताब्दियों से अधिक समय से हिंदी-उर्दू संबंधों का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि इनके मध्य वाद-विवाद के बावजूद निरंतर संवाद की प्रक्रिया भी चलती रही है। राजनीतिक स्तर पर दोनों के बीच कितना भी अलगाव रहा हो, साहित्यिक और सांस्कृतिक स्तर पर दोनों के मध्य गहरे संबंध रहे हैं। लोक के स्तर पर दोनों भाषाओं के आम प्रचलन में फर्क कर पाना आसान नहीं रहा है। हिंदी-उर्दू के साझा अस्तित्व, अंतरंगता और सहयात्रा को दोनों भाषाओं के रचनाकारों ने खुले मन से स्वीकार किया, सराहा और अपनाया है।

उन्नीसवीं शताब्दी उत्तरार्द्ध में भारतेंदु हरिश्चंद्र ने हंटर शिक्षा आयोग के समक्ष प्रस्तुत लिखित वक्तव्य में स्वयं को संस्कृत, हिंदी और उर्दू का कवि कहा था। हिंदी और उर्दू के प्रतिष्ठित गद्यकार बालकृष्ण भट्ट और मुहम्मद हुसैन आजाद दोनों ही हिंदी और उर्दू को अलग-अलग भाषा मानने के पक्ष में नहीं थे। भट्ट ने उर्दू को ‘हिंदी का रूपांतर’ कहा, तो आजाद ने स्वीकार किया कि ‘हमारी उर्दू भाषा ब्रजभाषा से निकली है’। मौलाना हाली की मशहूर कृति ‘मुसद्दस’ का प्रभाव हिंदी के राष्ट्रीय काव्य के रूप में प्रतिष्ठित’ भारती भारती’ पर पड़ा, जिसे मैथिलीशरण गुप्त ने खुले मन से स्वीकार किया था। अकबर इलाहाबादी ने हिंदी-उर्दू विवाद के पक्षकारों और प्रेस पर करारा व्यंग्य करते हुए इस विवाद को एक मामूली पारिवारिक कलह से अधिक महत्त्व नहीं दिया था।

प्रेमचंद का मानना था कि ‘उर्दू-हिंदी का झगड़ा तो थोड़े से शिक्षितों तक ही महदूद है। अन्य प्रांतों के मुसलमान उर्दू के भक्त नहीं और न हिंदी के विरोधी हैं। वे जिस प्रांत में रहते हैं उसी की भाषा का व्यवहार करते हैं।’ इसी तरह मानवतावाद और सामाजिक समरसता का संदेश देते हुए प्रसाद, पंत, निराला, महादेवी आदि ने अपनी रचनाओं के माध्यम से राष्ट्रीय एकत्व की भावना को बल प्रदान किया था। हिंदी में छायावादोत्तर काल हिंदी और उर्दू की आपसी आवाजाही का अन्यतम उदाहरण है।

स्वाधीनता आंदोलन में प्रत्येक भारतीय समुदाय बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहा था। प्रख्यात शायर इकबाल का कौमी तराना ‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तान हमारा’ हर एक की जुबां पर था। इकबाल ने उदारवादी दृष्टिकोण का परिचय देते हुए हिंदू आस्था के केंद्र राम को ‘इमाम-ए-हिंद’ कहा था। इसी तरह हसरत मोहानी के बारे में प्रसिद्ध था कि वह प्रत्येक हज यात्रा के बाद मथुरा में कृष्ण के दर्शन के लिए अवश्य जाते थे, जिससे उनकी हज यात्रा मुकम्मल हो सके। प्रतिष्ठित पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी सांप्रदायिक विवाद को सुलझाने की प्रक्रिया में ही शहीद हुए थे। इस प्रकार धर्म और राजनीति के सरोकारों से दूर रह कर इन रचनाकारों ने मानवीय संबंधों को तरजीह दी थी।

आजादी के बाद बदले परिदृश्य में हिंदी-उर्दू के तमाम रचनाकारों ने साझा विरासत और सह अस्तित्व की निरंतरता को बनाए रखने का प्रयास किया है। इस दौर की कविता ने धर्म, जाति, संप्रदाय, क्षेत्र और भाषा के स्तर पर निर्मित की गई संकीर्णताओं और अलगाव का खुल कर विरोध किया है। रंगमंच, सिनेमा और अन्य कला माध्यमों में हिंदी-उर्दू की साझा परंपरा रही है। पारसी थियेटर से आरंभ कर इप्टा, पृथ्वी थियेटर और वर्तमान रंग मंडलियों तक रंगमंच की भाषा मिली-जुली रही है। आज के दौर में हिंदी और उर्दू के साझा रंगमंच हैं, इन दोनों भाषाओं के नाटकों को लिखने वाले, अभिनय करने वाले, देखने वाले लोगों का दायरा भी कमोबेश एक ही है। हिंदी सिनेमा, कवि सम्मेलनों, मुशायरों आदि ने मिली-जुली संस्कृति को निरंतर विकसित किया है।

समकालीन दौर के अनगिनत रचनाकार साझा संस्कृति की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। प्रतिष्ठित आलोचक नामवर सिंह का मानना है कि ‘हिंदी और उर्दू के लेखक दोस्त नहीं कहूंगा, बल्कि हमराही हैं क्योंकि दोनों ही भाषाओं के साहित्य के सरोकार एक से हैं।’
बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक से भारतीय राजनीति, अर्थव्यवस्था, समाज और संस्कृति के क्षेत्र में जो परिवर्तन आए हैं, उन्होंने सामाजिक सद्भाव तथा सांस्कृतिक समन्वय की प्रक्रिया को गहरे स्तर पर प्रभावित किया है। राजनीतिक अस्थिरता, क्षेत्रवाद, भाषावाद, जातिवाद और सांप्रदायिकता के उभार, लोकतांत्रिक और नैतिक मूल्यों के विघटन ने राष्ट्रीय विकास तथा एकत्व की भावना को आहत किया है। नव-उपनिवेशवाद और बाजारवाद की ताकतें अपने अपने उद्देश्यों को आगे रख कर भाषा, साहित्य और संस्कृति के विरूपण के अभियान में लगी हैं। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान अर्जित धर्मनिरपेक्षता और जनवाद के मूल्य ढह रहे हैं, वैश्वीकरण और उदारवाद के नाम पर हमारी स्थानीय सांस्कृतिक विशेषताएं नष्ट की जा रही हैं, केवल हिंदी और उर्दू नहीं, हमारी तमाम भारतीय भाषाओं के सौंदर्य को उपेक्षा की दृष्टि से देखा जा रहा है, हमारी सामाजिक और साहित्यिक परंपराओं के मूलोच्छेद की साजिशें बुनी जा रही हैं। हिंदुस्तान का अंगे्रजीदां और सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से संपन्न तबका भी गाहे-बगाहे इन ताकतों के अभियान में शामिल जरूर है।

इसके लिए भारतीय भाषाओं तथा स्थानीय बोलियों के सहअस्तित्व, अंतरनिर्भरता और अंतरंगता के आधार पर विकसित होने वाले सामाजिक संबंधों और सांस्कृतिक समन्वय को ठोस आकार प्रदान करने की आवश्यकता है। इस संदर्भ में अपने विस्तृत साझा भाषाई क्षेत्र, समृद्ध साहित्यिक-सांस्कृतिक परंपरा तथा प्रतिकूलताओं से संघर्ष की उत्कट क्षमता रखने वाले विशाल जन-समुदाय की भाषा के रूप में हिंदी-उर्दू के पारस्परिक संबंधों, आदान-प्रदान की प्रवृत्तियों तथा सहयोग और सहकार की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है। हिंदी-उर्दू की साझा विरासत से जुड़ने के लिए दोनों भाषाओं के संबंध में गढ़े गए भ्रमों को तोड़ना होगा।