दिल्ली में स्थित दो बड़े विश्वविद्यालयों में विद्यार्थी पोस्टर लगाते हैं, लेकिन दोनों विश्वविद्यालयों में इनके लगाने का तरीका और उद्देश्य बिल्कुल अलग-अलग हैं। 2017 के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) छात्र संघ चुनाव में मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका निभाने वाले और मीडिया अध्ययन में पीएचडी कर रहे भगत सिंह ने बताया कि जेएनयू और डीयू में लगने वाले पोस्टरों का उद्देश्य बिल्कुल जुदा होता है। उन्होंने बताया कि जेएनयू में पोस्टर लगाने का सबसे बड़ा आधार विचारधारा होती है। विद्यार्थी यहां अपने विचारों को दूसरों तक पहुंचाने के लिए इनका इस्तेमाल करते हैं। वहीं, डीयू के पोस्टर व्यक्ति को प्रमुखता से दर्शाते हैं और इनका उद्देश्य समर्थन जुटाने तक ही सीमित रहता है। यही बातें इन दोनों विश्वविद्यालयों की छात्र राजनीति और छात्र संघ चुनावों में भी नजर आती हैं। इसके अलावा जेएनयू के पोस्टर पूरे साल दीवारों में लगे रहे हैं और लोगों को वैचारिक रूप से समृद्ध करते हैं। वहीं, डीयू की दीवारों पर छात्र संघ चुनाव के दौरान ही पोस्टर नजर आते हैं।
भगत बताते हैं कि दीवारों के पोस्टरों के माध्यम से अकेला व्यक्ति भी वार्तालाप कर सकता है। ये गरीबों की किताब होती हैं। उन्होंने कहा कि जब वे जेएनयू आए तो दीवारों पर लगे ये पोस्टर पहले तो अजीब लगे, लेकिन जल्द ही इनका महत्त्व समझ आने लगा। जेएनयू के पोस्टरों में सिर्फ राजनीतिक विज्ञापन और नारे नहीं, बल्कि पूरी वैचारिकी होती है। राजनीति का मतलब सत्ता और जनता का हस्तक्षेप होता है और जेएनयू के पोस्टर समाज और राजनीति में छात्रों का वैचारिक दखल है। जेएनयू के विद्यार्थी दीवारों को गरीबों की किताब बताते हैं।
ब्लॉग में संजोए छह सौ पोस्टर
भगत सिंह बताते हैं कि 2017 में जब वे जेएनयू छात्र संघ के लिए चुनाव आयुक्त बने थे तो विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से कहा गया था कि आप जेएनयू की दीवारों पर लगे पोस्टरों को चुनाव के दौरान हटाते क्यों नहीं हैं? उन्होंने बताया कि जब उन्होंने यह बात छात्र संगठनों के सामने रखी, तो सभी छात्र संगठनों ने एक सुर से इस मांग को खारिज किया। भगत ने कहा कि उन्हें उसी समय यह आभास हो गया था कि जल्द ही जेएनयू की दीवारों पर लगे पोस्टर इतिहास हो जाएंगे। इसलिए उन्होंने इन्हें संजोने का निर्णय किया। 2017 के अंत में मैंने दीवारों पर लगे करीब छह सौ पोस्टरों की फोटो खींची। उन्होंने बताया कि वे जल्द ही ब्लॉग के रूप में इन फोटो को लोगों को सामने रखने वाले हैं। आने वाली पीढ़ी इन तस्वीरों के माध्यम से जान सकेगी कि जेएनयू कभी ऐसा भी दिखता था।
समसामयिक मुद्दों की होती है बात
जेएनयू के विद्यार्थी और शिक्षक रहे प्रोफेसर आनंद कुमार ने बताया कि दीवारों पर पोस्टर लगाने की परंपरा विश्वविद्यालय के शुरुआती सालों से ही है। उन्होंने बताया कि हमारे युवा बुद्धिजीवी इन पोस्टर और कार्टून के माध्यम से समसामयिक प्रश्न उठाते हैं। विद्यार्थी इन दीवारों पर पोस्टरों के माध्यम से प्रमुख विचारकों, मुद्दों और आंदोलनों की बातों को लोगों के सामने रखते हैं। इन पोस्टरों में अश्लीलता, हिंसा, जातिवाद, सांप्रदायिकता या राष्ट्रविरोधी विचारों को जगह नहीं मिलती। उन्होंने कहा कि एक मायने में तो ये पोस्टर विश्वविद्यालय की शोभा हैं। अगर कोई व्यक्ति इन पोस्टरों को गंदगी से जोड़ता है, तो मुझे उसकी सोच और निर्णय पर चिंता होती है। प्रोफेसर कुमार ने कहा कि इन दीवारों से हमें ज्ञान और चेतना मिलती है। इनसे आतंकित होने की कोई जरूरत नहीं है।
पचास साल की परंपरा
जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष एन. साई बालाजी ने कहा कि दीवारें गरीबों की किताबें होने के साथ समाज का आईना होती हैं। जेएनयू के विद्यार्थी किताबों के साथ इन दीवारों से भी अपनी पढ़ाई करते हैं। उन्होंने कहा कि पचास साल से जारी जेएनयू की इस परंपरा को एक झटके में कैसे खत्म किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि इन दीवारों पर कई विद्यार्थियों ने अपनी एमफिल-पीएचडी की है और जेएनयू प्रशासन उन्हीं दीवारों को सूना करने पर आमादा है।
विवादों में भी रहे हैं पोस्टर
जेएनयू की दीवारों पर लगने वाले पोस्टरों पर कई बार बड़े विवाद भी हुए हैं। 2006 में डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स यूनियन (डीएसयू) ने संसद का एक ऐसा पोस्टर लगाया कि पूरे देश में विवाद हो गया। दरअसल, इस पोस्टर में संसद के ऊपर तीन सूअरों को दिखाया गया था और उसे ‘सूअर बाड़ा’ नाम दिया गया। इसे लेकर पहले जेएनयू परिसर में और फिर देश में विवाद हो गया। भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (एनएसयूआइ) के साथ अन्य छात्र संगठनों ने भी इसका विरोध किया। इस पोस्टर को जेएनयू प्रशासन के हस्तक्षेप के बाद हटा लिया गया। इसी संगठन ने 2017 में जेएनयू कश्मीर और फलस्तीन की आजादी की मांग को लेकर एक पोस्टर लगाया। पोस्टर पर ‘कश्मीर के लिए आजादी, मुक्त फलस्तीन… आत्मनिर्णय का अधिकार जिंदाबाद’ लिखा हुआ था। इस पोस्टर के लगने के बाद पहले जेएनयू परिसर में और फिर देश में बवाल हुआ। जल्द ही इस पोस्टर को भी जेएनयू प्रशासन के आदेश के बाद हटा लिया गया।
लोधी कॉलोनी में रंगाई, जेएनयू में सफाई
जेएनयू के विद्यार्थियों का कहना है कि हमारी सरकारें भी दो मानदंड अपनाती हैं। एक ओर ‘स्वच्छ भारत’ अभियान के तहत शहर के विभिन्न इलाकों को रंगाई करके सुंदर बनाया जा रहा है। वहीं, उसी अभियान के नाम पर जेएनयू की दीवारों पर लगे पोस्टरों को उतारा जा रहा है। पीएचडी के एक छात्र ने बताया कि इस बार प्रधानमंत्री ने अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में भी दीवारों पर हो रही पेंटिंग की बात की। उन्होंने विशेष रूप से लोधी कॉलोनी की दीवारों पर हो रही पेंटिंग को सराहा और इन्हें बनाने वाले कलाकारों की प्रशंसा भी की। छात्र सवाल उठाते हैं कि एक ही अभियान के तहत दो तरह के निर्णय कैसे लिए जा सकते हैं?
